मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य राजस्थान के पुरालेखीय एवं राजनीतिक इतिहास में भीलवाड़ा जिले से प्राप्त बिजौलिया शिलालेख (1170 ईस्वी / विक्रम संवत 1226) चौहान वंश की उत्पत्ति, वंशावली, 12वीं सदी की धार्मिक-आर्थिक व्यवस्था और राजस्थान के प्राचीन भूगोल को जानने का सर्वाधिक प्रामाणिक एवं विस्तृत दस्तावेज है। तिथि एवं काल: 5 फरवरी 1170 […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
राजस्थान के पुरालेखीय एवं राजनीतिक इतिहास में भीलवाड़ा जिले से प्राप्त बिजौलिया शिलालेख (1170 ईस्वी / विक्रम संवत 1226) चौहान वंश की उत्पत्ति, वंशावली, 12वीं सदी की धार्मिक-आर्थिक व्यवस्था और राजस्थान के प्राचीन भूगोल को जानने का सर्वाधिक प्रामाणिक एवं विस्तृत दस्तावेज है।
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तिथि एवं काल: 5 फरवरी 1170 ईस्वी (फाल्गुन वदी तृतीया, विक्रम संवत 1226)।
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स्थान: बिजौलिया (प्राचीन नाम: विंध्यवल्ली), भीलवाड़ा में स्थित पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर के समीप एक विशाल पाषाण शिला (चट्टान) पर उत्कीर्ण।
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समकालीन चौहान शासक: अजमेर के चौहान नरेश सोमेश्वर (प्रतापलंकेश्वर)।
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उत्कीर्णन का प्रेरक / निर्माता: जैन दिगंबर श्रावक लोलाक (मंदिर निर्माण व तीर्थ जीर्णोद्धार की स्मृति में)।
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प्रशस्तिकार / रचयिता: जैन मुनि गुणभद्र।
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उत्कीर्णक (शिल्पी): कायस्थ केशव, कायस्थ छीछ तथा सूत्रधार गोविंद।
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भाषा एवं छंद संरचना: संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि (कुल 93 पद्य/श्लोक)।
2. चौहानों की ‘वत्सगोत्रीय विप्र’ उत्पत्ति का सिद्धांत
बिजौलिया शिलालेख चौहान राजवंश की उत्पत्ति के संबंध में एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य प्रस्तुत करता है, जिसे आधार बनाकर इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा ने अपना शोध प्रस्तुत किया:
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शिलालेख साक्ष्य: शिलालेख के 12वें श्लोक में चौहानों के आदिपुरुष सामन्तराज के संदर्भ में स्पष्ट उल्लेख है—“विप्रः श्रीवत्सगोत्रेऽभूदभूतपूर्वः स चाहमानः…”अर्थात् सांभर/सपादलक्ष के चौहान मूल रूप से वत्स गोत्र के ब्राह्मण (विप्र) थे।
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वासुदेव चौहान एवं सांभर झील (551 ईस्वी): इसमें उल्लेख है कि चौहान वंश के मूलपुरुष वासुदेव ने 551 ई. में शाकंभरी राज्य की नींव रखी और अपने इष्टदेव/विद्याधर के आशीर्वाद से सांभर (शाकंभरी) झील का निर्माण करवाया था।
3. भूमि अनुदान शब्दावली एवं आर्थिक-धार्मिक व्यवस्था
बिजौलिया अभिलेख तत्कालीन भूमि-दान और राजस्व व्यवस्था पर विस्तृत प्रकाश डालता है:
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‘डोहली’ (Dohli): मंदिर, साधुओं या ब्राह्मणों को दी जाने वाली कर-मुक्त पुण्य भूमि को ‘डोहली’ कहा गया है।
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सोमेश्वर द्वारा दान: चौहान शासक सोमेश्वर ने बिजौलिया के पार्श्वनाथ जैन मंदिर के पूजा-अर्चना एवं संचालन हेतु ‘रेवाणा’ गाँव डोहली (दान) में दिया था।
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अपरगांगेय व पृथ्वीराज द्वितीय के अनुदान: पृथ्वीराज द्वितीय द्वारा ‘मोरझरी’ गाँव दान देने का उल्लेख भी इस शिलालेख में मिलता है।
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जल एवं भूमि प्रकार: अभिलेख में सिंचित भूमि (पीवत), असिंचित भूमि (गोरवा) और भूमि माप की इकाइयों का विवरण प्राप्त होता है।
4. राजस्थान के प्राचीन भौगोलिक नाम (सर्वाधिक परीक्षा-उपयोगी सारणी)
बिजौलिया शिलालेख में राजस्थान और सीमावर्ती क्षेत्रों के तत्कालीन नगरों के जो प्राचीन नाम मिलते हैं, वे प्रतियोगी परीक्षाओं के पसंदीदा प्रश्न हैं:
| प्राचीन नाम (शिलालेख अनुसार) | वर्तमान नाम (वर्तमान जिला/क्षेत्र) |
| विंध्यवल्ली / विजयावल्ली | बिजौलिया (भीलवाड़ा) |
| अहिच्छत्रपुर | नागौर (चौहानों की प्रारंभिक राजधानी) |
| जाबालिपुर | जालौर |
| श्रीमाल | भीनमाल (जालौर) |
| नड्डुल | नाडोल (पाली) |
| शाकंभरी | सांभर (जयपुर ग्रामीण) |
| अजयमेरु | अजमेर |
| मंडलकर | मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) |
| नागह्रद | नागदा (उदयपुर) |
| ढिल्लिका | दिल्ली |
| उत्तमाद्रि | ऊपरमाल का पठार (चित्तौड़गढ़-भीलवाड़ा) |
5. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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बिजौलिया शिलालेख की तिथि: 1170 ई. (वि.सं. 1226)।
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रचयिता: गुणभद्र | उत्कीर्णक: कायस्थ केशव व सूत्रधार गोविंद।
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चौहान शासक जिसके काल का है: सोमेश्वर।
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चौहानों को बताया गया: ‘वत्सगोत्रीय विप्र’ (ब्राह्मण)।
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मंदिर को दी जाने वाली कर-मुक्त भूमि: ‘डोहली’।
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सोमेश्वर द्वारा दान में दिया गया गाँव: रेवाणा गाँव।