मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (शासनकाल: 1211–1236 ई.) दिल्ली सल्तनत के इल्बरी-तुर्क (गुलाम वंश) का वास्तविक संस्थापक था। राजस्थान के इतिहास, विशेषकर 13वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में मेवाड़, रणथंभौर, नागौर, जालौर और अजमेर के संदर्भ में इल्तुतमिश के सैन्य अभियान और प्रशासनिक नीतियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक: कुतुबुद्दीन […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (शासनकाल: 1211–1236 ई.) दिल्ली सल्तनत के इल्बरी-तुर्क (गुलाम वंश) का वास्तविक संस्थापक था। राजस्थान के इतिहास, विशेषकर 13वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में मेवाड़, रणथंभौर, नागौर, जालौर और अजमेर के संदर्भ में इल्तुतमिश के सैन्य अभियान और प्रशासनिक नीतियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
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दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक:
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कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद आरामशाह को अपदस्थ कर गद्दी पर बैठा।
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दिल्ली को सल्तनत की पहली बार राजधानी बनाया (ऐबक के समय राजधानी लाहौर थी)।
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1229 ई. में बगदाद के अब्बासी खलीफा अल-मुस्तंसिर बिल्लाह से ‘खिलअत’ (वैधानिक मान्यता पत्र) और ‘सुल्तान-ए-आज़म’ की उपाधि प्राप्त की।
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राजस्थान के प्रमुख राजवंशों के साथ सैन्य टकराव:
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मेवाड़ के साथ संघर्ष (भूताला का युद्ध – 1227 ई.): इल्तुतमिश ने मेवाड़ पर आक्रमण किया, परंतु मेवाड़ के गुहिल शासक रावल जैत्रसिंह (1213–1253 ई.) ने भूताला के मैदान (गोगुंदा/नागदा के निकट) में इल्तुतमिश की सेना को बुरी तरह पराजित किया। भागती हुई तुर्क सेना ने मेवाड़ की प्राचीन राजधानी नागदा को ध्वस्त कर दिया, जिसके बाद जैत्रसिंह ने चित्तौड़गढ़ को नई राजधानी बनाया।
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रणथंभौर अभियान (1226 ई.): चौहान शासक वीरनारायण को पराजित/षड्यंत्र से मारकर रणथंभौर दुर्ग पर अस्थायी अधिकार किया।
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नागौर व जालौर अभियान (1228 ई.): जालौर के चौहान शासक उदयसिंह को संधि के लिए विवश किया। नागौर को सल्तनत का प्रमुख प्रशासनिक व सूफी केंद्र बनाया।
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बयाना व अजमेर: 1234–35 ई. में बयाना (भरतपुर) और अजमेर पर पुनः केंद्रीय नियंत्रण स्थापित किया।
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प्रमुख प्रशासनिक व स्थापत्य उपलब्धियाँ:
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इक्ता प्रथा (Iqta System): राज्य को प्रशासनिक व राजस्व इकाइयों (इक्ताओं) में विभाजित किया।
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तुर्कान-ए-चिहालगानी (चालीसा दल): 40 विश्वासपात्र तुर्क दासों के दल का गठन।
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मुद्रा प्रणाली का जनक: शुद्ध अरबी शैली के सिक्के चलाए—चाँदी का ‘टका’ (175 ग्रेन) और तांबे का ‘जीतल’।
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कुतुबमीनार का निर्माण पूर्ण: कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा शुरू किए गए निर्माण को पूरा करवाया।
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नागौर में अतारकिन का दरवाजा (1230 ई.): सूफी संत शेख हमीदुद्दीन नागौरी की स्मृति/आदर में नागौर में ‘बुलंद दरवाजा / अतारकिन का दरवाजा’ बनवाया (जो आगे चलकर अकबर के फतेहपुर सीकरी के बुलंद दरवाजे का प्रेरणा स्रोत बना)।
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2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
इल्तुतमिश के काल और राजस्थान के शासकों के साथ उसके टकराव का प्रामाणिक विवरण समकालीन फारसी तवारीखों, जैन संस्कृत ग्रंथों एवं शिलालेखों में मिलता है:
| ग्रंथ / स्रोत | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| हम्मीर मदमर्दन | जैन आचार्य जयसिंह सूरि | संस्कृत (ऐतिहासिक नाटक) | भूताला के युद्ध (1227 ई.) का सर्वप्रमुख स्रोत। इसमें इल्तुतमिश को ‘हम्मीर’ (अमीर) कहा गया है और जैत्रसिंह द्वारा उसके अहंकार को नष्ट करने का विस्तृत रूपकीय व ऐतिहासिक वर्णन है। |
| तबकात-ए-नासिरी | मिन्हाज-उस-सिराज (इल्तुतमिश का समकालीन दरबारी इतिहासकार) | फारसी | इल्तुतमिश के राज्यारोहण, 40 के दल, रणथंभौर विजय (1226 ई.), नागौर और ग्वालियर अभियानों का सबसे प्रामाणिक फारसी वृत्तांत। |
| चीरवा का शिलालेख (1273 ई.) | रत्नप्रभ सूरि / भुवनसिंह | संस्कृत (शिलालेख) | इल्तुतमिश के आक्रमण, नागदा के विध्वंस और रावल जैत्रसिंह के सेनापतियों (बालक-मदन व तलारक्ष योगराज) की वीरता की ऐतिहासिक पुष्टि। |
| तारीख-ए-फ़िरोज़शाही | जियाउद्दीन बरनी | फारसी | इल्तुतमिश की इक्ता प्रणाली और चालीसा दल के राजनीतिक प्रभाव का विश्लेषण। |
| वीर विनोद | कविराजा श्यामलदास | डिंगल मिश्रित हिंदी | इल्तुतमिश के मेवाड़ आक्रमण, नागदा विध्वंस और चित्तौड़ राजधानी बनने का शोधपरक विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ, नीतियाँ एवं प्रवृत्तियाँ
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साहित्यिक रूपक में ‘हम्मीर’ शब्द का प्रयोग: संस्कृत और प्राकृत साहित्य में दिल्ली के मुस्लिम सुल्तानों के लिए अरबी पदवी ‘अमीर’ (Amir-ul-Momineen) के अपभ्रंश रूप ‘हम्मीर’ का प्रयोग किया गया (जैसे हम्मीर मदमर्दन में इल्तुतमिश के लिए)।
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नागौर: सूफी साधना का प्रमुख केंद्र: इल्तुतमिश के काल में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के प्रमुख शिष्य शेख हमीदुद्दीन नागौरी (सुल्तान-उत-तारीकीन / संन्यासियों का सुल्तान) ने नागौर के सुवाल गाँव में रहकर ग्रामीण परिवेश में चिश्ती परंपरा का प्रसार किया।
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सामरिक सीमांत नीति: मंगोल आक्रांता चंगेज खाँ से सल्तनत की रक्षा करने के लिए इल्तुतमिश ने ख्वारिज्म शाह के पुत्र जलालुद्दीन मांगबर्नी को शरण देने से इनकार कर दिया, जिससे राजस्थान और उत्तर भारत मंगोल विध्वंस से बच गया।
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मुद्रा सुधार: सिक्कों पर टकसाल का नाम और स्वयं को खलीफा का नायब अंकित कराने वाला पहला सुल्तान था।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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दिल्ली को राजधानी बनाने वाला प्रथम सुल्तान: शम्सुद्दीन इल्तुतमिश।
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भूताला का युद्ध (1227 ई.): रावल जैत्रसिंह ने इल्तुतमिश को पराजित किया (उल्लेख: हम्मीर मदमर्दन में)।
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नागौर का ‘अतारकिन का दरवाजा’: निर्माता इल्तुतमिश (1230 ई.)।
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शुद्ध अरबी सिक्के: चाँदी का टका (175 ग्रेन) और तांबे का जीतल।
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चालीसा दल (तुर्कान-ए-चिहालगानी) व इक्ता प्रथा के संस्थापक: इल्तुतमिश।
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दरबारी इतिहासकार: मिन्हाज-उस-सिराज (तबकात-ए-नासिरी)।