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गोगा नवमी/गोगामेड़ी मेला/गोगाजी की ओल्डी

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सत्यापित: 06 September 2026
मुख्य बिंदु: गोगा नवमी एवं संबंधित मेले (गोगामेड़ी, ददरेवा, गोगाजी की ओल्डी) 1. कब और कहाँ तिथि: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि (श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के ठीक अगले दिन)। समय: अगस्त–सितंबर। प्रमुख तीर्थ स्थल एवं मेले: गोगामेड़ी (धुरमेड़ी): तहसील नोहर, हनुमानगढ़ ज़िला। शीर्षमेड़ी: ददरेवा, चूरू ज़िला (गोगाजी की जन्मस्थली)। गोगाजी की ओल्डी: किलोरियों की ढाणी, […]
गोगा नवमी एवं संबंधित मेले (गोगामेड़ी, ददरेवा, गोगाजी की ओल्डी)

1. कब और कहाँ

  • तिथि: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि (श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के ठीक अगले दिन)।
  • समय: अगस्त–सितंबर।
  • प्रमुख तीर्थ स्थल एवं मेले:
    1. गोगामेड़ी (धुरमेड़ी): तहसील नोहर, हनुमानगढ़ ज़िला।
    2. शीर्षमेड़ी: ददरेवा, चूरू ज़िला (गोगाजी की जन्मस्थली)।
    3. गोगाजी की ओल्डी: किलोरियों की ढाणी, सांचौर ज़िला (पूर्व में जालौर)।

2. ऐतिहासिक व पौराणिक पृष्ठभूमि

  • परिचय एवं उपाधियाँ: गोगाजी राजस्थान के पंचपीरों में प्रमुख हैं। इन्हें ‘सांपों के देवता’, ‘गोगा पीर’, और ‘जाहरपीर’ कहा जाता है।
  • माता-पिता व गुरु: पिता जेवर सिंह चौहान, माता बाछल देवी। इनके आध्यात्मिक गुरु गोरखनाथ जी थे।
  • ‘जाहरपीर’ की उपाधि: गोगाजी ने अपनी गायों को मुक्त कराने और धर्म की रक्षा के लिए विदेशी आक्रांता महमूद गजनवी के साथ भीषण युद्ध किया। रणभूमि में गोगाजी का पराक्रम देखकर गजनवी ने कहा था— “यह तो साक्षात् ‘ज़ाहिर पीर’ (प्रकट देवता) है।”
  • शीर्षमेड़ी बनाम धुरमेड़ी की कथा:
    • युद्ध के दौरान अपने मौसेरे भाइयों (अर्जुन-सर्जन) और गजनवी की सेना से लड़ते हुए गोगाजी का सिर ददरेवा (चूरू) में गिरा, जिसे ‘शीर्षमेड़ी’ कहा जाता है।
    • सिर कटने के बाद भी उनका धड़ (कबंध) युद्ध करता रहा और अंततः जहाँ उनका धड़ गिरा, वह स्थान गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) कहलाया, जिसे ‘धुरमेड़ी’ कहते हैं।

3. प्रमुख मेले एवं स्थल विशेष

(क) गोगामेड़ी मेला (नोहर, हनुमानगढ़)

  • अवधि: यह मेला श्रावण पूर्णिमा से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा तक लगभग एक महीने चलता है (मुख्य दिन: भाद्रपद कृष्ण नवमी)।
  • वास्तुकला (मस्जिदनुमा स्वरूप): गोगामेड़ी मंदिर का निर्माण फ़िरोज़ शाह तुगलक ने करवाया था। इसकी बनावट मकबरे/मस्जिद जैसी है और प्रवेश द्वार पर अरबी भाषा में ‘बिस्मिल्लाह’ अंकित है।
  • आधुनिक स्वरूप: मंदिर के वर्तमान स्वरूप का पुनर्निर्माण बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह जी ने करवाया था।
  • सांप्रदायिक सौहार्द व पुजारी: इस मंदिर में एक महीने (भाद्रपद में) ‘चायल’ (मुस्लिम) पुजारी पूजा करते हैं, जबकि शेष 11 महीने हिंदू भोपे (मेघवाल/चौहान) पूजा करते हैं।
  • पशु मेला: यहाँ राज्य-स्तरीय श्री गोगामेड़ी पशु मेला भरता है, जहाँ राठी और हरियाणवी नस्ल के गोवंश व ऊंटों की भारी खरीद-बिक्री होती है।

(ख) गोगाजी की ओल्डी (सांचौर)

  • स्थान: किलोरियों की ढाणी, सांचौर।
  • अर्थ: राजस्थानी में ‘ओल्डी’ का अर्थ झोपड़ी या छोटा कच्चा आवास होता है।
  • इतिहास: इस मंदिर का निर्माण राजा राम कुम्हार ने करवाया था। जालोर और सांचौर क्षेत्र के श्रद्धालुओं के लिए यह प्रमुख आस्था का केंद्र है।

4. प्रमुख परंपराएँ एवं लोक अनुष्ठान

  • गोगा राखड़ी: वर्षा ऋतु के आगमन पर खेतों में हल जोतने से पहले किसान हल और हाली (हल चलाने वाले) दोनों को 9 गांठों वाली राखी बांधते हैं, जिसे ‘गोगा राखड़ी’ कहते हैं।
  • थान (पूजा स्थल): गोगाजी का थान आमतौर पर खेजड़ी वृक्ष के नीचे चबूतरे पर सर्प की आकृति के रूप में होता है। लोककहावत है:
    “गांव-गांव खेजड़ी, ने गांव-गांव गोगो।”
  • वाद्य यंत्र व नृत्य: इनके मेले में भक्त ‘डेरू’ (डमरू जैसा वाद्य) और ‘कांसी का कटोरा’ बजाते हुए सांकल नृत्य करते हैं और अपनी पीठ पर लोहे की सांकल मारते हैं।
  • नीली घोड़ी: गोगाजी की प्रिय घोड़ी का नाम ‘नीली घोड़ी’ (गोगा बप्पा) था।

5. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)

बिंदु विवरण
शीर्षमेड़ी vs धुरमेड़ी
• शीर्षमेड़ी: ददरेवा (चूरू) — जन्मस्थली व शीश गिरने का स्थान।
• धुरमेड़ी: गोगामेड़ी (नोहर, हनुमानगढ़) — समाधि स्थल व धड़ गिरने का स्थान।
गोगाजी की ओल्डी कहाँ है? सांचौर (किलोरियों की ढाणी) — निर्माता: राजाराम कुम्हार।
मंदिर निर्माण व वास्तुकला
मूल मक़बरेनुमा निर्माण: फ़िरोज़ शाह तुगलक (प्रवेश द्वार पर ‘बिस्मिल्लाह’)।
आधुनिक स्वरूप: महाराजा गंगा सिंह (बीकानेर)।
समकालीन आक्रांता महमूद गजनवी (उपाधि: ‘जाहरपीर’)।
गोगा राखड़ी में गांठें 9 गांठें (हल और हाली को बांधी जाती है)।
प्रमुख वाद्य यंत्र डेरू और मांदल (गोगाजी के गुणगान/भजनों में)।

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