मुख्य बिंदु: विजयादशमी / दशहरा एवं कोटा का राष्ट्रीय दशहरा मेला 1. कब और कहाँ तिथि: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि (शारदीय नवरात्र के ठीक अगले दिन)। समय: अक्टूबर (शरद ऋतु)। राजस्थान का प्रमुख मेला: राष्ट्रीय दशहरा मेला, कोटा (Dussehra Ground, Kota)। अवधि: विजयादशमी से शुरू होकर यह मेला लगभग 20 से 25 दिनों […]
विजयादशमी / दशहरा एवं कोटा का राष्ट्रीय दशहरा मेला
1. कब और कहाँ
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तिथि: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि (शारदीय नवरात्र के ठीक अगले दिन)।
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समय: अक्टूबर (शरद ऋतु)।
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राजस्थान का प्रमुख मेला: राष्ट्रीय दशहरा मेला, कोटा (Dussehra Ground, Kota)।
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अवधि: विजयादशमी से शुरू होकर यह मेला लगभग 20 से 25 दिनों तक चलता है।
2. पौराणिक व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
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अधर्म पर धर्म की विजय:
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भगवान श्रीराम द्वारा रावण वध: इसी पावन तिथि को भगवान श्रीराम ने 10 सिर वाले लंकापति रावण का संहार कर माता सीता को मुक्त कराया था।
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महिषासुरमर्दिनी स्वरूप: देवी दुर्गा ने 9 दिनों के लगातार युद्ध के बाद इसी दिन असुर महिषासुर का वध किया था, इसलिए इसे ‘विजयादशमी’ कहा जाता है।
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पांडवों का अज्ञातवास और शमी (खेजड़ी) वृक्ष:
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महाभारत के अनुसार, पांडवों ने एक वर्ष के अज्ञातवास के दौरान अपने गांडीव धनुष सहित सभी दिव्य अस्त्र-शस्त्र शमी (खेजड़ी) के वृक्ष के खोखल में छुपाए थे।
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अज्ञातवास पूरा होने पर विजयादशमी के दिन उन्होंने वृक्ष से शस्त्र पुनः निकाले, शमी वृक्ष की पूजा की और कौरवों पर विजय प्राप्त की।
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3. प्रमुख परंपराएँ एवं शकुन विचार (राजस्थान विशेष)
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खेजड़ी (शमी) वृक्ष का पूजन: इस दिन घर-घर और रियासती ठिकानों में खेजड़ी वृक्ष की विधिवत पूजा की जाती है।
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शस्त्र एवं अश्व पूजन (Aswa & Shastra Puja):
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पूर्व राजपूत रियासतों में इस दिन राजकीय शस्त्रागार के हथियारों और शाही घोड़ों (अश्वों) को सजाकर उनकी पूजा की जाती है।
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शासक विजय की कामना के साथ सीमा लांघने की रस्म (‘सीमोल्लंघन’) करते थे।
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लीलटांस पक्षी का दर्शन:
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विजयादशमी के दिन ‘लीलटांस’ (इंडियन रोलर / नीलकंठ) पक्षी का दिखना अत्यंत शुभ माना जाता है।
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लोकमान्यता है कि इस दिन लीलटांस के दर्शन होने से पूरे वर्ष भाग्य और विजय का साथ मिलता है।
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रावण का ससुराल (मंदोदरी का पीहर – मंडोर):
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मंडोर (जोधपुर) को रावण की पटरानी मंदोदरी का मायका माना जाता है।
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मंडोर में रावण की ‘चांवरी’ (विवाह वेदी) स्थित है। यहाँ के गोधरा/श्रीमाली दवे गोत्र के ब्राह्मण स्वयं को रावण का वंशज मानते हैं, अतः वे विजयादशमी को रावण दहन का उत्सव नहीं मनाते, बल्कि रावण की मृत्यु पर शोक (सूतक) मनाते हैं और पिंडदान करते हैं।
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4. कोटा के दशहरा मेले का इतिहास एवं स्वरूप
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शुरुआत (महाराव दुर्जनशाल):
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कोटा में पारंपरिक रूप से दशहरा दरबार और शोभायात्रा की शुरुआत 16वीं-17वीं शताब्दी में कोटा के हाड़ा शासक महाराव दुर्जनशाल सिंह (1723–1756 ई.) के शासनकाल में हुई थी।
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विशाल व आधुनिक मेले का रूप (महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय):
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सन 1899 ई. में कोटा के तत्कालीन शासक महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय ने इसे एक भव्य, सार्वजनिक और बहु-सांस्कृतिक लक्खी मेले का स्वरूप प्रदान किया।
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शाही सवारी (दशहरा जुलूस):
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गढ़ पैलेस (कोटा सिटी पैलेस) से भगवान लक्ष्मीनारायण जी की पालकी के साथ राजसी ठाठ-बाट, सजे-धजे हाथी-घोड़े, ऊंट और अखाड़ों के साथ विशाल जुलूस निकलता है, जो दशहरा मैदान पहुँचता है।
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विशालकाय पुतलों का दहन:
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यहाँ रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के 75 से 80 फीट ऊंचे आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक/आतिशबाजी से युक्त पुतले बनाए जाते हैं, जिनका दहन देखने देश भर से लाखों लोग आते हैं।
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5. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)
| बिंदु | विवरण |
| सीधा प्रतियोगी प्रश्न (RPSC / RSMSSB) | “राजस्थान में प्रसिद्ध दशहरा मेला कहाँ आयोजित होता है?” — कोटा। |
| कोटा दशहरा मेले को भव्य रूप देने वाले शासक | महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय (1899 ई.)। |
| पूजित वृक्ष | खेजड़ी / शमी वृक्ष (Prosopis cineraria)। |
| शुभ माना जाने वाला पक्षी |
लीलटांस (नीलकंठ / Indian Roller)।
(साहित्यिक संदर्भ: कन्हैयालाल सेठिया की प्रसिद्ध राजस्थानी काव्य कृति का नाम भी ‘लीलटांस’ है, जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था)।
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| रावण का मंदिर / ससुराल | मंडोर (जोधपुर) — रावण का ससुराल व मंदिर; यहाँ रावण दहन नहीं मनाया जाता। |
| भारत के अन्य दो प्रसिद्ध दशहरे |
1. मैसूर दशहरा (कर्नाटक): शाही अम्बा विलास पैलेस की जंबो सवारी।
2. कुल्लू दशहरा (हिमाचल प्रदेश): भगवान रघुनाथ जी की रथ यात्रा (यह दशमी से शुरू होकर सप्ताह भर चलता है)।
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