मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य भूताला का युद्ध मध्यकालीन राजस्थान (विशेषकर मेवाड़) के इतिहास की एक अत्यंत निर्णायक और युगांतरकारी सैन्य घटना है। यह युद्ध 13वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में मेवाड़ के गुहिल शासक रावल जैत्रसिंह और दिल्ली सल्तनत के गुलाम वंश के सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के मध्य लड़ा गया था। समय/वर्ष: लगभग 1227 […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
भूताला का युद्ध मध्यकालीन राजस्थान (विशेषकर मेवाड़) के इतिहास की एक अत्यंत निर्णायक और युगांतरकारी सैन्य घटना है। यह युद्ध 13वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में मेवाड़ के गुहिल शासक रावल जैत्रसिंह और दिल्ली सल्तनत के गुलाम वंश के सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के मध्य लड़ा गया था।
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समय/वर्ष: लगभग 1227 ईस्वी (कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में 1222–1228 ई. के मध्य)।
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स्थान: भूताला का मैदान (वर्तमान में गोगुंदा और नागदा के निकट, जिला उदयपुर)।
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प्रमुख पक्ष व नेतृत्वकर्ता:
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मेवाड़ पक्ष: रावल जैत्रसिंह (1213–1253 ई.)। इनके दो वीर एवं प्रसिद्ध सेनापति बालक और मदन (बालक-मदन) थे, जिन्होंने अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन किया।
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दिल्ली सल्तनत पक्ष: सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (साहित्यिक स्रोतों में इसे ‘हम्मीर’ अथवा ‘सुरत्राण’ कहा गया है)।
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युद्ध का परिणाम:
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रावल जैत्रसिंह ने इल्तुतमिश की तुर्क सेना को बुरी तरह पराजित कर खदेड़ दिया।
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भागती हुई तुर्क सेना ने मेवाड़ की तत्कालीन राजधानी नागदा को तहस-नहस कर दिया और भारी लूटपाट व अग्निकांड किया।
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सामरिक प्रभाव (चित्तौड़गढ़ को राजधानी बनाना):
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नागदा के विध्वंस के कारण रावल जैत्रसिंह ने सुरक्षा व सामरिक दृष्टिकोण से मेवाड़ की राजधानी नागदा से स्थानांतरित कर चित्तौड़गढ़ को मेवाड़ की नई एवं स्थायी राजधानी बनाया।
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2. प्रमुख साहित्यिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
भूताला के युद्ध और रावल जैत्रसिंह की वीरता का सबसे प्रामाणिक विवरण समकालीन जैन साहित्य एवं संस्कृत ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलता है:
| ग्रंथ / स्रोत | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| हम्मीर मदमर्दन | जयसिंह सूरि (जैन आचार्य) | संस्कृत (नाटक) | भूताला के युद्ध का सर्वप्रमुख एवं प्रामाणिक समकालीन स्रोत। इसमें इल्तुतमिश को ‘हम्मीर’ (अमीर का अपभ्रंश) कहा गया है तथा जैत्रसिंह द्वारा उसके मद/अहंकार को चूर-चूर करने का विशद रूपकीय व ऐतिहासिक वर्णन है। |
| चीरवा का शिलालेख (1273 ई.) | रत्नप्रभ सूरि / भुवनसिंह | संस्कृत (शिलालेख) | रावल जैत्रसिंह द्वारा इल्तुतमिश (सुल्तान) के विरुद्ध लड़े गए युद्ध, नागदा के विध्वंस और स्थानीय सरदारों (जैसे तलारक्ष योगराज व मदन) की वीरता की पुष्टि। |
| विविध तीर्थ कल्प | जिनप्रभ सूरि | प्राकृत/संस्कृत | 13वीं सदी के आरंभ में तुर्क आक्रमणों और मेवाड़ की तत्कालीन स्थिति का उल्लेख। |
| आबू का अचलेश्वर शिलालेख (1285 ई.) | शुभचंद्र / वेदशर्मा | संस्कृत (शिलालेख) | जैत्रसिंह के शौर्य और मेवाड़ की सैन्य शक्ति का प्रशस्तिपरक आख्यान। |
| वीर विनोद | कविराजा श्यामलदास | डिंगल मिश्रित हिंदी | जैत्रसिंह के शासनकाल, इल्तुतमिश की पराजय और चित्तौड़ राजधानी बनने का प्रामाणिक विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ, प्रवृत्तियाँ एवं इतिहासविदों के मत
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इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा का मत:
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प्रख्यात इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘अर्ली चौहान डायनेस्टीज’ एवं अन्य संदर्भों में रावल जैत्रसिंह के शासनकाल को ‘मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्णकाल’ की संज्ञा दी है।
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जैत्रसिंह ने न केवल दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश को हराया, बल्कि मालवा, गुजरात और नाडोल के शासकों को भी पराजित कर मेवाड़ की संप्रभुता को अक्षुण्ण रखा।
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‘हम्मीर’ शब्द का प्रयोग: ‘हम्मीर मदमर्दन’ नाटक में ‘हम्मीर’ शब्द अमीर/सुल्तान (इल्तुतमिश) के लिए प्रयुक्त हुआ है, न कि रणथंभौर के हम्मीर देव चौहान या मेवाड़ के राणा हम्मीर के लिए। यह परीक्षा में प्रायः पूछा जाने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु है।
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सामरिक भूगोल में परिवर्तन: नागदा घाटी में स्थित होने के कारण सुरक्षात्मक दृष्टि से कमजोर था। भूताला के युद्ध के बाद चित्तौड़गढ़ (मेसा पठार) को राजधानी बनाकर मेवाड़ को सल्तनत काल के आक्रांताओं के विरुद्ध एक अभेद्य रक्षा-कवच प्रदान किया गया।
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संस्कृत रूपक नाट्य परंपरा: ‘हम्मीर मदमर्दन’ मध्यकालीन राजस्थान में रचित एक ऐसा दुर्लभ नाटक है जो विशुद्ध ऐतिहासिक घटना पर आधारित है और जिसमें तत्कालीन कूटनीति, गुप्तचर व्यवस्था व राजनीतिक गठबंधनों का सूक्ष्म अंकन है।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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युद्ध: भूताला का युद्ध (लगभग 1227 ई.)।
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प्रतिद्वंद्वी: रावल जैत्रसिंह बनाम इल्तुतमिश।
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विजेता: रावल जैत्रसिंह (सेनापति: बालक और मदन)।
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राजधानी परिवर्तन: नागदा से चित्तौड़गढ़।
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समकालीन प्रामाणिक ग्रंथ: हम्मीर मदमर्दन (रचनाकार: जयसिंह सूरि)।
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जैत्रसिंह के काल को ‘मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्णकाल’ किसने कहा: डॉ. दशरथ शर्मा।