प्रामाणिक अध्ययन नोट्स (Reference Archive)

बप्पा रावल (कालभोज)

लॉगिन
2 (आज: 0)
शेयर: WA TG FB 𝕏 सुधार सुझाएँ
सत्यापित: 27 August 2026
मुख्य बिंदु: महामहोपाध्याय डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा की सुप्रसिद्ध पुस्तक “उदयपुर राज्य का इतिहास (भाग-1)” में बप्पा रावल (कालभोज) के जीवन, उनकी पहचान और उनके ऐतिहासिक योगदान का प्रामाणिक व विस्तृत विश्लेषण दिया गया है। डॉ. ओझा के इस ग्रंथ के मुख्य ऐतिहासिक बिंदु: 1. नाम व पहचान का विवाद: ‘बप्पा’ बनाम ‘कालभोज’ डॉ. ओझा से पहले […]
महामहोपाध्याय डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा की सुप्रसिद्ध पुस्तक “उदयपुर राज्य का इतिहास (भाग-1)” में बप्पा रावल (कालभोज) के जीवन, उनकी पहचान और उनके ऐतिहासिक योगदान का प्रामाणिक व विस्तृत विश्लेषण दिया गया है।
डॉ. ओझा के इस ग्रंथ के मुख्य ऐतिहासिक बिंदु:

1. नाम व पहचान का विवाद: ‘बप्पा’ बनाम ‘कालभोज’

डॉ. ओझा से पहले कर्नल टॉड और कई भाट-चारण ग्रंथों में बप्पा रावल को गुहादित्य (गुहिल) का पुत्र या समकालीन मानकर भ्रम पैदा कर दिया गया था। डॉ. ओझा ने विभिन्न शिलालेखों (जैसे आटपुर/आहाड़ शिलालेख, रणकपुर प्रशस्ति और कुंभलगढ़ प्रशस्ति) का तुलनात्मक अध्ययन करके यह सिद्ध किया:
  • ‘कालभोज’ उनका वास्तविक नाम था।
  • ‘बप्पा’ (बापा) कोई नाम नहीं, बल्कि आदरसूचक उपाधि (Father figure / पूज्य) थी।
  • गुहिल वंश की वंशावली में कालभोज अपने पूर्वज राजा ‘महेन्द्र (द्वितीय)’ के पुत्र थे।

2. प्रारंभिक जीवन और नागदा का परिवेश

  • जब कालभोज (बप्पा) अल्पायु के थे, तब उनके पिता महेन्द्र द्वितीय की भीलों के साथ संघर्ष में मृत्यु हो गई।
  • उनकी माता उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले गईं और नागदा के पास ब्राह्मणों के संरक्षण में उनका लालन-पालन हुआ।
  • बचपन में बप्पा ब्राह्मणों की गायें चराने का कार्य करते थे।

3. हरित ऋषि और एकलिंगनाथ की कृपा

  • नागदा के जंगलों में बप्पा का संपर्क पाशुपत संप्रदाय के तपस्वी हरित ऋषि (हारीत राशि) से हुआ।
  • हरित ऋषि ने बप्पा के पराक्रम और सेवा-भाव से प्रसन्न होकर उन्हें शस्त्र-विद्या, धर्म और राजनीति की दीक्षा दी।
  • ऋषि के आशीर्वाद से ही बप्पा को मेवाड़ की भूमि का शासन प्राप्त हुआ। बप्पा ने नागदा के पास श्री एकलिंगजी (शिव) के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।
  • यहीं से यह परंपरा शुरू हुई कि मेवाड़ के वास्तविक शासक भगवान एकलिंगनाथ हैं और महाराणा स्वयं को उनका केवल ‘दीवान’ (संरक्षक/प्रतिनिधि) मानते हैं।

4. चित्तौड़ पर अधिकार (734 ई.)

  • उस समय चित्तौड़ पर मोरी (मौर्य) वंश के राजा ‘मान मोरी’ का शासन था (जो रिश्ते में बप्पा के ननिहाल पक्ष से संबंधित माने जाते हैं)।
  • जब विदेशी आक्रमणकारियों (म्लेच्छ/अरब सेनाओं) ने चित्तौड़ पर हमला किया, तब राजा मान मोरी के सामंतों ने साथ देने से मना कर दिया।
  • बप्पा रावल ने मोरी सेना का नेतृत्व करते हुए आक्रमणकारियों को बुरी तरह परास्त किया।
  • बाद में मान मोरी के सामंतों के दुर्व्यवहार और राजनीतिक परिस्थितियों के चलते बप्पा ने 734 ई. (लगभग वि. सं. 791) में चित्तौड़ का दुर्ग अपने अधिकार में ले लिया और एक शक्तिशाली राज्य की नींव रखी।

5. अरब आक्रमणकारियों का दमन (Battle of Rajasthan)

डॉ. ओझा ने स्पष्ट किया है कि 8वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अरबों ने सिंध से आगे बढ़कर पश्चिमी भारत (गुजरात, मारवाड़, चित्तौड़) पर कई बड़े हमले किए थे।
  • बप्पा रावल ने गुर्जर-प्रतिहार शासक नागभट्ट (प्रथम) और अन्य समकालीन राजाओं के साथ मिलकर अरबों की आक्रामक सेनाओं को पीछे खदेड़ दिया।
  • भारतीय परंपराओं के अनुसार, बप्पा की सेनाओं ने सिंध और सीमावर्ती क्षेत्रों तक आक्रमणकारियों का पीछा किया था, जिससे कई दशकों तक भारत की पश्चिमी सीमा सुरक्षित रही।

6. सोने के सिक्के (Numismatic Evidence)

  • डॉ. ओझा ने बप्पा रावल के समय का एक प्राचीन सोने का सिक्का (65 ग्रेन का) खोजा था।
  • इस सिक्के पर अग्रभाग में शिवलिंग, नंदी, त्रिशूल और दंडवत करते हुए एक पुरुष की आकृति तथा पृष्ठभाग पर कामधेनु, सूर्य और नदी (मछली) का अंकन मिलता है।
  • यह सिक्का इस बात का ठोस पुरातात्विक प्रमाण है कि बप्पा रावल एक संप्रभु और स्वतंत्र प्रतापी हिंदू शासक थे।

7. संन्यास और अंतिम समय

  • पुस्तक के अनुसार, अपने शासनकाल के अंतिम दिनों में बप्पा रावल ने राजपाट अपने पुत्र (खुमाण प्रथम) को सौंप दिया और स्वयं संन्यास लेकर एकलिंगजी के निकट तपस्या में लीन हो गए।
  • नागदा के पास आज भी ‘बप्पा रावल की समाधि’ स्थित है।

निष्कर्ष (डॉ. ओझा का दृष्टिकोण):

डॉ. जी. एच. ओझा ने निष्कर्ष निकाला कि बप्पा रावल कोई काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि 8वीं शताब्दी के ऐतिहासिक शासक ‘कालभोज’ ही थे, जिन्होंने बिखरे हुए गुहिल कुल को संगठित कर चित्तौड़ पर अधिकार किया, अरब आक्रांताओं को पराजित कर भारत की रक्षा की और मेवाड़ के गौरवशाली साम्राज्य की नींव रखी।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

नया संदर्भ / संशोधन जोड़ें
इस आलेख पर अभी कोई बाह्य संदर्भ दर्ज नहीं है। यदि आपके पास प्रामाणिक संदर्भ है तो यहाँ क्लिक करके जोड़ें।

विद्यार्थी चर्चा (0)

विद्यार्थी चर्चा में भाग लेने के लिए कृपया लॉगिन करें।