मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष एवं अजमेर के चाहमान (चौहान) राजवंश के 12वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के शासकों में पृथ्वीराज द्वितीय का शासनकाल उत्तर-पश्चिमी सीमांत पर तुर्क प्रतिरोध, अभिलेखीय साक्ष्यों और स्थापत्य निर्माण के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है। समय काल: लगभग 1165–1169 ईस्वी (12वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध)। वंशावलीगत स्थिति: बिजौलिया शिलालेख […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष एवं अजमेर के चाहमान (चौहान) राजवंश के 12वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के शासकों में पृथ्वीराज द्वितीय का शासनकाल उत्तर-पश्चिमी सीमांत पर तुर्क प्रतिरोध, अभिलेखीय साक्ष्यों और स्थापत्य निर्माण के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
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समय काल: लगभग 1165–1169 ईस्वी (12वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध)।
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वंशावलीगत स्थिति:
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बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) और पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के अनुसार, ये जगद्देव (पितृहंता) के पुत्र थे।
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इन्होंने अपने चचेरे भाई अपरगांगेय (अमरगांगेय) को पराजित कर अजमेर की गद्दी प्राप्त की थी।
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पृथ्वीराज द्वितीय के निःसंतान देहावसान के बाद, अजमेर के सामंतों व मंत्रियों ने अर्णोराज के कनिष्ठ पुत्र (इनके चाचा) सोमेश्वर को गुजरात के चालुक्य दरबार से बुलाकर सिंहासन पर बैठाया।
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हांसी (हरियाणा) शिलालेख (1167 ई. / वि.सं. 1224) एवं तुर्क प्रतिरोध:
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पृथ्वीराज द्वितीय ने गजनी/लाहौर से होने वाले मुस्लिम/तुर्क आक्रमणों को रोकने के लिए साम्राज्य के उत्तरी-पूर्वी सीमांत को अत्यधिक सुदृढ़ किया।
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इन्होंने अपने मामा गुहिलवंशीय राजा किलहण को हरियाणा स्थित सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हांसी दुर्ग (असीगढ़) का प्रशासक (दुर्गाध्यक्ष) नियुक्त किया।
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1167 ई. के हांसी अभिलेख में उल्लेख है कि किलहण ने यहाँ एक विशाल दुर्ग-प्राचीर (गेटवे/तोरण) बनवाई ताकि तुर्कों (म्लेच्छों) के हमलों से साम्राज्य की रक्षा की जा सके।
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मेनाल (भीलवाड़ा) का रूठी रानी मंदिर (सुहावेश्वर / महानालेश्वर):
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पृथ्वीराज द्वितीय की पटरानी सुहवदेवी (सुहावादेवी) भगवान शिव की अनन्य भक्त थीं।
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रानी सुहवदेवी ने मेनाल (मांडलगढ़, भीलवाड़ा) में एक अत्यंत भव्य एवं नक्काशीदार शिव मंदिर का निर्माण करवाया, जिसे ‘सुहावेश्वर मंदिर’ या ‘महानालेश्वर मंदिर’ कहा जाता है।
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जनश्रुति और स्थानीय इतिहास में इसी स्थापत्य परिसर को ‘रूठी रानी का महल/मंदिर’ (मेनाल) के नाम से जाना जाता है।
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2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
पृथ्वीराज द्वितीय के शासनकाल की पुष्टि करने वाले प्रमुख पुरालेखीय व साहित्यिक स्रोत:
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| हांसी शिलालेख (1167 ई.) | उत्कीर्णक: स्थानीय शिल्पकार | संस्कृत (शिलालेख) | सर्वप्रमुख स्रोत। पृथ्वीराज द्वितीय द्वारा मामा किलहण को हांसी का सूबेदार बनाना, दुर्ग निर्माण और तुर्कों के विरुद्ध सामरिक सुरक्षा का साक्ष्य। |
| मेनाल शिलालेख (1168–1169 ई.) | स्थानीय प्रशस्तिकार | संस्कृत (शिलालेख) | रानी सुहवदेवी द्वारा मेनाल में सुहावेश्वर शिव मंदिर निर्माण और ब्राह्मणों/तपस्वियों को दिए गए दानों का उल्लेख। |
| बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) | गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव) | संस्कृत (शिलालेख) | अपरगांगेय के बाद पृथ्वीराज द्वितीय और उनके उपरांत सोमेश्वर के गद्दी पर बैठने का क्रमिक वंशावलीय साक्ष्य। |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक भट्ट (कश्मीरी महाकवि) | संस्कृत (महाकाव्य) | पृथ्वीराज द्वितीय के पराक्रम, निःसंतान मृत्यु और सामंतों द्वारा सोमेश्वर को अजमेर बुलाने का विशद वर्णन। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; पृथ्वीराज द्वितीय के कालक्रम, हांसी रक्षात्मक नीति और मेनाल स्थापत्य का विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
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उत्तरी सीमांत की किलेबंदी: विग्रहराज चतुर्थ द्वारा जीते गए पंजाब व हांसी क्षेत्र को तुर्कों के पुनः आक्रमण से बचाए रखने में पृथ्वीराज द्वितीय और उनके सेनापति किलहण की कूटनीति सफल रही।
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नागर शैली का उत्कृष्ट स्थापत्य: मेनाल का सुहावेश्वर मंदिर 12वीं सदी की महा-मारु एवं नागर शैली का बेजोड़ नमूना है, जो चौहान काल के उच्च कोटि के शिल्प-कौशल को दर्शाता है।
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निःसंतान मृत्यु एवं सत्ता हस्तांतरण: इनके असामयिक निधन ने अजमेर की राजनीति को एक बार फिर बदला, जहाँ से सोमेश्वर और अंततः पृथ्वीराज तृतीय (राय पिथौरा) का ऐतिहासिक युग प्रारंभ हुआ।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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हांसी शिलालेख (1167 ई.) किस चौहान शासक का है: पृथ्वीराज द्वितीय (हांसी प्रशासक: मामा किलहण)।
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मेनाल (भीलवाड़ा) में सुहावेश्वर (महानालेश्वर) शिव मंदिर की निर्माता: रानी सुहवदेवी (पृथ्वीराज द्वितीय की पत्नी)।
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पिता: जगद्देव | चचेरा भाई (जिसे अपदस्थ किया): अपरगांगेय।
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उत्तराधिकारी (चाचा): सोमेश्वर (जिन्हें गुजरात से बुलाया गया)।
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वंशावली क्रम: अपरगांगेय ➔ पृथ्वीराज द्वितीय ➔ सोमेश्वर ➔ पृथ्वीराज तृतीय।