प्रामाणिक अध्ययन नोट्स (Reference Archive)

संत दादू दयाल जी

लॉगिन
4 (आज: 0)
शेयर: WA TG FB 𝕏 सुधार सुझाएँ
सत्यापित: 02 October 2026
मुख्य बिंदु: संत दादू दयाल जी राजस्थान के महान निर्गुण संत, समाज सुधारक, दार्शनिक और दादू संप्रदाय (परब्रह्मी संप्रदाय) के संस्थापक थे। उन्हें “राजस्थान का कबीर” भी कहा जाता है। संत दादू दयाल जी के जीवन, उनके इतिहास, उपदेशों और दादू संप्रदाय का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है: 1. जीवन परिचय एवं जन्म जन्म: संवत 1601 […]
संत दादू दयाल जी राजस्थान के महान निर्गुण संत, समाज सुधारक, दार्शनिक और दादू संप्रदाय (परब्रह्मी संप्रदाय) के संस्थापक थे। उन्हें “राजस्थान का कबीर” भी कहा जाता है।
संत दादू दयाल जी के जीवन, उनके इतिहास, उपदेशों और दादू संप्रदाय का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:

1. जीवन परिचय एवं जन्म

  • जन्म: संवत 1601 (ईस्वी सन 1544) में फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन हुआ था।
  • जन्म स्थान: उनके जन्म को लेकर दो प्रमुख मान्यताएँ हैं:
    1. कुछ विद्वानों और परंपरा के अनुसार उनका जन्म अहमदाबाद (गुजरात) में हुआ था।
    2. एक अन्य जनश्रुति के अनुसार वे साबरमती नदी के किनारे बहते हुए एक बक्से में लावारिस अवस्था में मिले थे, जिन्हें लोदीराम नामक ब्राह्मण ने पाला-पोसा था।
  • कर्मस्थली (प्रधान पीठ): उन्होंने अपनी अधिकांश साधना और उपदेश स्थली राजस्थान के नरेना (नरैना, जयपुर) को बनाया, जो आज भी दादू संप्रदाय की मुख्य पीठ है।

2. दादू संप्रदाय की स्थापना एवं विशेषताएँ

  • स्थापना: संत दादू दयाल जी ने लगभग 1573 ईस्वी में ‘दादू संप्रदाय’ (या परब्रह्मी संप्रदाय) की नींव रखी।
  • मुख्य उपदेश: उन्होंने जाति-पाती, ऊंच-नीच, छुआछूत और बाहरी धार्मिक आडंबरों (जैसे मूर्तिपूजा, तीर्थ यात्रा, व्रत आदि) का कड़ा विरोध किया। वे निराकार और सर्वव्यापी ईश्वर (निर्गुण ब्रह्म) की भक्ति पर जोर देते थे।
  • सत्संग स्थल (‘अखरा’): उनके अनुयायी जहाँ बैठकर भजन-कीर्तन और आध्यात्मिक चर्चा करते थे, उस पवित्र स्थान को ‘अखरा’ (या दादू द्वारा) कहा जाता है।
  • मृत शरीर के प्रति परंपरा: दादू संप्रदाय में मृत शरीर को दफनाया या जलाया नहीं जाता, बल्कि पक्षियों और जीवों के लिए खुले जंगल में छोड़ दिया जाता है (क्योंकि उनका मानना था कि शरीर समाप्त होने के बाद भी अन्य जीवों के काम आना चाहिए)।

3. प्रमुख शाखाएँ (पंच शाखा)

दादू दयाल जी के निधन के बाद उनके मुख्य शिष्यों ने दादू संप्रदाय को पाँच प्रमुख शाखाओं में विभाजित किया:
  1. खालसा: यह दादू संप्रदाय की मुख्य और सबसे प्रमुख शाखा है, जिसकी प्रधान पीठ नरेना (जयपुर) में स्थित है।
  2. उखाड़े (उत्तराथ): यह शाखा मुख्य रूप से उत्तर भारत और मारवाड़ के क्षेत्रों में फैली।
  3. बिहार: इसके अनुयायी मुख्य रूप से घूम-घूमकर उपदेश देने वाले संत होते हैं।
  4. स्थानधारी: यह शाखा एक ही स्थान पर रहकर साधना करने वाले साधुओं की है।
  5. खाकी: इस शाखा के संत शरीर पर राख (भभूत) मलते हैं और कठिन साधना करते हैं।

4. समकालीन प्रभाव एवं अकबर से भेंट

  • संत दादू दयाल जी की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। कहा जाता है कि मुगल सम्राट अकबर भी उनकी विद्वत्ता और धार्मिक उदारता से प्रभावित होकर सन 1585 में फतेहपुर सीकरी में उनसे मिलने आया था और धार्मिक चर्चा की थी।
  • उनके प्रमुख शिष्यों में संत गरीबदास, सुंदरदास, रज्जब जी, बाकिदास, और संतदास शामिल थे। (विशेषकर रज्जब जी आजीवन दूल्हे के वेश में ही दादू जी के उपदेश सुनते रहे थे)।

5. रचनाएँ एवं वाणी

  • संत दादू दयाल जी की वाणी अत्यंत सरल, सहज और लोक-भाषा में है। उनके उपदेशों और पदों के संग्रह को ‘दादू री वाणी’ और ‘दादू दुहा’ कहा जाता है, जिसमें लगभग 5000 पद और दोहे संकलित हैं।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

नया संदर्भ / संशोधन जोड़ें
इस आलेख पर अभी कोई बाह्य संदर्भ दर्ज नहीं है। यदि आपके पास प्रामाणिक संदर्भ है तो यहाँ क्लिक करके जोड़ें।

विद्यार्थी चर्चा (0)

विद्यार्थी चर्चा में भाग लेने के लिए कृपया लॉगिन करें।