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संत जाम्भोजी

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सत्यापित: 02 October 2026
मुख्य बिंदु: संत जाम्भोजी महाराज राजस्थान के महान पर्यावरणविद्, समाज सुधारक और विश्नोई संप्रदाय के संस्थापक थे। उनका संपूर्ण जीवन प्रकृति की रक्षा, जीवदया और नैतिक जीवन मूल्यों को समर्पित था। संत जाम्भोजी, विश्नोई संप्रदाय के इतिहास, उनके 29 नियमों, ‘शब्दवाणी’ और प्रमुख मेलों का विस्तृत विवरण नीचे प्रस्तुत है: 1. संत जाम्भोजी: जीवन परिचय जन्म: संवत […]
संत जाम्भोजी महाराज राजस्थान के महान पर्यावरणविद्, समाज सुधारक और विश्नोई संप्रदाय के संस्थापक थे। उनका संपूर्ण जीवन प्रकृति की रक्षा, जीवदया और नैतिक जीवन मूल्यों को समर्पित था।
संत जाम्भोजी, विश्नोई संप्रदाय के इतिहास, उनके 29 नियमों, ‘शब्दवाणी’ और प्रमुख मेलों का विस्तृत विवरण नीचे प्रस्तुत है:

1. संत जाम्भोजी: जीवन परिचय

  • जन्म: संवत 1508 (ईस्वी सन 1451) की भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (कृष्ण जन्माष्टमी) को एक रोहिड़ा वृक्ष के नीचे हुआ था।
  • जन्म स्थान: पीपासर (जिला नागौर, राजस्थान)।
  • माता-पिता: इनके पिता का नाम लोहट जी पंवार और माता का नाम हंसा देवी था।
  • बचपन: बाल्यावस्था में जाम्भोजी बहुत शांत और गंभीर प्रकृति के थे। वे आरंभ में करीब 34 वर्षों तक गोपालक (गौ-सेवा) रहे। उनके माता-पिता के निधन के बाद उन्होंने संसार का मोह त्यागकर समराथल धोरा (बीकानेर) को अपनी साधना स्थली बनाया।
  • उपनाम: उन्हें पर्यावरण वैज्ञानिक, गूंगा-गहला संत और भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है।

2. विश्नोई संप्रदाय का इतिहास और स्थापना

  • स्थापना: संवत 1542 (ईस्वी सन 1485) की कार्तिक कृष्ण अष्टमी को संत जाम्भोजी ने पश्चिमी राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में ‘समराथल धोरा’ (बीकानेर) पर विश्नोई संप्रदाय की स्थापना की थी।
  • नामकरण (बीस + नोई = विश्नोई): जाम्भोजी ने समाज सुधार और नैतिक जीवन के लिए 29 नियम बनाए। इन 29 नियमों का पालन करने वाले अनुयायी ‘विश्नोई’ कहलाए (बीस + नौ = विश्नोई)।
  • इतिहास का स्वर्ण अध्याय (खेड़ला बलिदान): विश्नोई संप्रदाय का इतिहास वन्यजीवों और पेड़ों की रक्षा के लिए दिए गए अद्वितीय बलिदानों से भरा है। सन 1730 में जोधपुर रियासत के खेजड़ली गांव में अमृता देवी विश्नोई के नेतृत्व में 363 विश्नोई समाज के लोगों ने हरे पेड़ों (खेजड़ी) को बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था। यह विश्व इतिहास की पर्यावरण रक्षा की सबसे बड़ी घटना मानी जाती है।

3. विश्नोई संप्रदाय के 29 नियम (संपूर्ण सूची)

संत जाम्भोजी द्वारा समाज के नैतिक, शारीरिक, मानसिक और पर्यावरणीय उत्थान के लिए निर्धारित किए गए 29 नियम निम्नलिखित हैं, जिनमें एक भी नियम छोड़ा नहीं गया है:
  1. शौच (सचाच): नित्य प्रति प्रातःकाल उठकर स्नान करना और शरीर की शुद्धि रखना।
  2. संतोष: जीवन में हमेशा संतोषी स्वभाव रखना, लालच न करना।
  3. शीलं (क्षमा): मन में दया, क्षमा और सदाचार का भाव रखना।
  4. शुचि (पवित्रता): तन, मन और विचारों की पवित्रता बनाए रखना।
  5. संध्या (ईश्वर-स्मरण): सुबह और शाम दोनों समय ईश्वर का ध्यान या संध्या-प्रार्थना करना।
  6. आरती (संध्या आरती): संध्या के समय भगवान विष्णु या अपने गुरु के गुणों का गान और आरती करना।
  7. अमृत (चरणामृत): प्रतिदिन सुबह चरणामृत (गुरु/ईश्वर का चरणोदक) ग्रहण करना।
  8. नोरण (सत्य बोलना): हमेशा सत्य बोलना और सत्य का आचरण करना।
  9. शीलं (चोरी न करना): किसी की भी वस्तु या धन की चोरी न करना।
  10. निंदा न करना: किसी की चुगली, पीठ पीछे बुराई या निंदा न करना।
  11. झूठ न बोलना: कभी भी असत्य या झूठ का सहारा न लेना।
  12. वाद-विवाद (वाद न करना): अनावश्यक बहस या झगड़े-तंटे में न पड़ना।
  13. व्रत (अमावस्या का व्रत): हर महीने की अमावस्या के दिन व्रत (उपवास) रखना।
  14. जीव दया: पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव-जंतुओं पर दया करना और उनकी रक्षा करना (विशेषकर काले हिरण और वन्य जीवों की)।
  15. वृक्ष रक्षण: हरे पेड़ों को न काटना और पर्यावरण की रक्षा करना (विशेषकर खेजड़ी वृक्ष को काटना वर्जित है)।
  16. अलूणो (पानी छानकर पीना): जल को छानकर और शुद्ध करके उपयोग में लेना।
  17. काष्ठ शुचि (जलाने से पहले लकड़ी छानना): ईंधन के लिए लकड़ी काटते या जलाते समय यह देखना कि उसमें कोई जीव-कीड़ा न हो।
  18. बछड़ा न दुहना (गाय का): दूध निकालते समय बछड़े के हिस्से का ध्यान रखना, उसे भूखा न रखना।
  19. अमृत पान (अमली/मादक पदार्थों का त्याग): किसी भी प्रकार के नशे, मदिरा, तंबाकू, अफीम या मादक पदार्थों का सेवन न करना।
  20. मांसाहार निषेध: किसी भी जीव की हिंसा न करना और पूरी तरह शाकाहारी (मांस का त्याग) रहना।
  21. नील वस्त्र निषेध: नीले रंग के वस्त्रों का त्याग करना (चूंकि नील की रंगाई में पर्यावरण और जीवों को नुकसान पहुंचता था)।
  22. शील (व्याभिचार निषेध): पराई स्त्री या पुरुष पर बुरी नजर न रखना, पवित्र चरित्र रखना।
  23. रसोई की शुद्धता: अपनी रसोई या भोजन स्थल को पवित्र और स्वच्छ रखना।
  24. प्रसूति नियम (सूतक-पतक): घर में जन्म या मृत्यु के समय निर्धारित नियमों व शुद्धता का पालन करना।
  25. बैल को बधिया न करना: कृषि कार्य में काम आने वाले बैलों को बधिया (नपुंसक) न करना।
  26. शील (राजा/शासन का विरोध न करना): अन्याय का विरोध करना लेकिन अनावश्यक विद्रोह या देशद्रोह न करना।
  27. जिव्हा नियंत्रण (भोजन नियम): खान-पान में संयम रखना और अशुद्ध भोजन न करना।
  28. मांस-त्याग (अमर्यादित भोजन का निषेध): मृत या मारे गए जीवों का मांस बिल्कुल न खाना।
  29. व्रत व दान: दान-पुण्य करना और नियमों का निष्ठापूर्वक आजीवन पालन करना।

4. संत जाम्भोजी की ‘शब्दवाणी’

  • संत जाम्भोजी द्वारा रचित आध्यात्मिक व उपदेशात्मक पदों और साखियों के संग्रह को ‘शब्दवाणी’ कहा जाता है।
  • इसमें कुल 120 शब्द (पद) संकलित हैं।
  • भाषा: उनकी वाणी मुख्य रूप से मारवाड़ की स्थानीय भाषा (राजस्थानी, मेवाती और सदकड़ी भाषा) में है, जो आम लोगों को आसानी से समझ में आ जाती थी।
  • इस ‘शब्दवाणी’ में पर्यावरण संरक्षण, जीव दया, गुरु महिमा, परोपकार, माया-मोह का त्याग और निर्गुण ईश्वर की भक्ति का गहरा संदेश दिया गया है।

5. संत जाम्भोजी से जुड़े प्रमुख मेले

विश्नोई संप्रदाय के लोग वर्ष भर में संत जाम्भोजी की स्मृति में कई बड़े मेलों का आयोजन करते हैं, जिनमें मुख्य निम्नलिखित हैं:
  1. मुकाम मेला (नोखा, बीकानेर):
    • यह विश्नोई संप्रदाय का सबसे बड़ा और मुख्य धार्मिक केंद्र है।
    • यहाँ प्रतिवर्ष फाल्गुन अमावस्या और आश्विन अमावस्या को बहुत बड़ा मेला भरता है, जहाँ देश-विदेश से विश्नोई समाज के लोग और श्रद्धालु पहुंचते हैं।
  2. समराथल धोरा मेला (बीकानेर):
    • यह वह पवित्र स्थान है जहाँ जाम्भोजी ने विश्नोई पंथ की नींव रखी थी। यहाँ भी समय-समय पर विशेष उत्सव और मेले आयोजित होते हैं।
  3. लालसर एवं जांगलू मेले:
    • जाम्भोजी के अन्य प्रमुख स्थलों पर भी वर्षभर विशेष तिथियों (विशेषकर अमावस्या पर) पर मेलों का आयोजन होता है।
  4. खेड़लली मेला (जोधपुर):
    • यद्यपि यह अमृता देवी और शहीदों की स्मृति में लगता है, लेकिन यह विश्नोई संप्रदाय के इतिहास का सबसे पवित्र और प्राणवान मेला है, जो प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल दशमी को भरता है।

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