मुख्य बिंदु: संत मावजी (1714–1794 ई.) वागड़ क्षेत्र (डूंगरपुर-बांसवाड़ा) के एक महान संत, भविष्यवक्ता, समाज सुधारक और ‘निष्कलंक संप्रदाय’ के संस्थापक थे। उन्हें भगवान विष्णु का ‘कल्कि अवतार’ भी माना जाता है। संत मावजी के जीवन, उनके कार्यों और संप्रदाय का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है: 1. जीवन परिचय एवं जन्म जन्म: संवत 1771 (ईस्वी सन 1714) की […]
संत मावजी (1714–1794 ई.) वागड़ क्षेत्र (डूंगरपुर-बांसवाड़ा) के एक महान संत, भविष्यवक्ता, समाज सुधारक और ‘निष्कलंक संप्रदाय’ के संस्थापक थे। उन्हें भगवान विष्णु का ‘कल्कि अवतार’ भी माना जाता है।
संत मावजी के जीवन, उनके कार्यों और संप्रदाय का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
1. जीवन परिचय एवं जन्म
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जन्म: संवत 1771 (ईस्वी सन 1714) की माघ शुक्ल एकादशी (माघ पूर्णिमा के आसपास) को हुआ था।
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जन्म स्थान: साबला गाँव (वर्तमान में डूंगरपुर जिला, राजस्थान)।
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कुल / परिवार: वे एक औदिच्य ब्राह्मण परिवार से संबंधित थे। इनके पिता का नाम दलजोशी और माता का नाम केसर बाई था।
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बचपन और ज्ञान प्राप्ति: बाल्यावस्था से ही वे आध्यात्मिक प्रवृति के थे। ऐसा माना जाता है कि मात्र 12 वर्ष की आयु में वे मही नदी के किनारे सोमेश्वर नामक स्थान पर तपस्या करने चले गए थे, जहाँ उन्हें दिव्य ज्ञान (अध्यात्मिक चेतना) की प्राप्ति हुई थी।
2. निष्कलंक संप्रदाय की स्थापना
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संत मावजी ने समाज में फैली कुरीतियों, ऊंच-नीच, छुआछूत और अंधविश्वासों को दूर करने के लिए ‘निष्कलंक संप्रदाय’ की स्थापना की।
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उनके इस संप्रदाय का मुख्य उद्देश्य समाज के सभी वर्गों को समानता का अधिकार देना और निष्कलंक (बिना किसी पाप या भेदभाव के) जीवन जीने का मार्ग दिखाना था।
3. बेणेश्वर धाम की स्थापना एवं माघ पूर्णिमा का मेला
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संत मावजी ने डूंगरपुर जिले की आसपुर तहसील में सोम, माही और जाखम नदियों के पवित्र त्रिवेणी संगम पर ‘बेणेश्वर धाम’ की स्थापना की थी।
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उन्होंने यहाँ भगवान श्रीकृष्ण (निष्कलंक महाराज) का प्रसिद्ध मंदिर बनवाया।
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आज भी हर साल माघ पूर्णिमा के अवसर पर बेणेश्वर धाम पर एक बहुत बड़ा विशाल मेला भरता है, जिसे ‘आदिवासियों का कुंभ’ कहा जाता है, जहाँ लाखों आदिवासी और श्रद्धालु स्नान करने और संत मावजी को नमन करने आते हैं।
4. भविष्यवाणी और ‘चोपड़ ग्रन्थ’ (साहित्य)
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संत मावजी उच्च कोटि के भविष्यवक्ता भी थे। उन्होंने भविष्य में होने वाली घटनाओं, आपदाओं और सामाजिक बदलावों की भविष्यवाणियाँ की थीं।
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उनकी भविष्यवाणियों और आध्यात्मिक वचनों को उनके अनुयायी ‘चोपड़’ कहते हैं। उनके कुल 5 प्रमुख चोपड़े (ग्रंथ) हैं, जो मुख्य रूप से मेवाड़ी और वागड़ भाषा में लिखे गए हैं:
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मेघ प्रकाश चोपड़
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श्याम प्रकाश चोपड़
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रतन प्रकाश चोपड़
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प्रेम प्रकाश चोपड़
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आनंद सागर चोपड़
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इन चोपड़ों में ज्ञान, भक्ति, समाज सुधार और भविष्य के रहस्यों का अद्भुत संकलन मिलता है।
5. सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना
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संत मावजी ने मुगलों और उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच मारवाड़, मेवाड़ और गुजरात के लोगों को एकता के सूत्र में पिरोने का प्रयास किया।
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उन्होंने अपनी कविताओं और भजनों (जिन्हें ‘साध’ या वाणी कहा जाता है) के माध्यम से लोगों को सत्य, अहिंसा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
संत मावजी ने अपना पूरा जीवन लोक-कल्याण में बिताया और वागड़ की पावन धरती पर आध्यात्मिक व सामाजिक क्रांति की ऐसी अलख जगाई, जो आज भी वहाँ के जन-जीवन में रची-बसी है।