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हरिदास निरंजनी

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सत्यापित: 02 October 2026
मुख्य बिंदु: हरिदास निरंजनी (जिन्हें संत हरिदास जी भी कहा जाता है) मध्यकालीन राजस्थान के एक महान निर्गुण संत, योग साधक और निरंजनी पंथ (संप्रदाय) के संस्थापक थे। उनके जीवन, उनके द्वारा स्थापित पंथ और उनकी शिक्षाओं का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है: 1. जीवन परिचय एवं जन्म जन्म: 16वीं शताब्दी के आसपास (लगभग 1455 या […]
हरिदास निरंजनी (जिन्हें संत हरिदास जी भी कहा जाता है) मध्यकालीन राजस्थान के एक महान निर्गुण संत, योग साधक और निरंजनी पंथ (संप्रदाय) के संस्थापक थे। उनके जीवन, उनके द्वारा स्थापित पंथ और उनकी शिक्षाओं का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:

1. जीवन परिचय एवं जन्म

  • जन्म: 16वीं शताब्दी के आसपास (लगभग 1455 या 1550 ई. के मध्य, विभिन्न मान्यताओं के अनुसार)।
  • जन्म स्थान: कपूरड़ (या कापड़ोड, वर्तमान में डीडवाना-कुचामन जिला, राजस्थान)।
  • प्रारंभिक जीवन: किंवदंतियों के अनुसार, अपने शुरुआती जीवन में हरिदास जी एक प्रसिद्ध डाकू (डकैत) थे और उनका नाम हरसिंह सांखला था। एक बार संतों के संपर्क में आने और उनके उपदेश सुनने के बाद उनके जीवन में ऐसा परिवर्तन आया कि उन्होंने हिंसा का मार्ग हमेशा के लिए छोड़ दिया और पूर्ण रूप से अध्यात्म की राह अपना ली।

2. निरंजनी पंथ की स्थापना

  • संत हरिदास जी ने निराकार और अजर-अमर ईश्वर की उपासना पर जोर देते हुए ‘निरंजनी पंथ’ (निरंजनी संप्रदाय) की स्थापना की।
  • प्रधान पीठ: इस पंथ की मुख्य पीठ गाढा (गाढ़ा, वर्तमान डीडवाना-कुचामन जिला) में स्थित है।
  • इस संप्रदाय के अनुयायी भगवान को ‘निरंजन’ (माया रहित, निराकार) मानकर उसकी उपासना करते हैं।

3. प्रमुख उपदेश एवं विशेषताएँ

  • भक्ति और योग का समन्वय: निरंजनी पंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें निर्गुण भक्ति के साथ-साथ हठयोग और राजयोग की साधना पर भी विशेष बल दिया जाता है।
  • आंतरिक शुद्धि: संत हरिदास जी बाहरी दिखावे, पाखंड, जाति-पाती और ऊंच-नीच के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि ईश्वर को पाने के लिए मन और आचरण की पवित्रता सबसे महत्वपूर्ण है।
  • गृहस्थ जीवन में साधना: इस पंथ के संत और अनुयायी गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी ईश्वर की साधना कर सकते हैं।

4. प्रमुख रचनाएँ और साहित्य

संत हरिदास जी उच्च कोटि के कवि और दार्शनिक थे। उन्होंने सरल और सहज लोक-भाषा में कई ग्रंथों की रचना की है, जिनमें उनके आध्यात्मिक विचार संकलित हैं। उनके प्रमुख ग्रंथ निम्नलिखित हैं:
  1. हैरानी बाणी (या हरिपुरुष की वाणी)
  2. संग्राम सार
  3. मंत्र राज प्रकाश
  4. अष्टपदो की वाणी
संत हरिदास जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि आध्यात्मिक चेतना और सच्चे पश्चाताप से किसी भी व्यक्ति का जीवन पूरी तरह बदलकर समाज के लिए मार्गदर्शक बन सकता है।

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