मुख्य बिंदु: संत मीराबाई (1498–1547 ई.) मध्यकालीन भारत और राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध सगुण (कृष्ण) भक्त कवयित्री और संत थीं। उन्हें ‘राजस्थान की राधा’ के रूप में जाना जाता है। उनके जीवन और भक्ति का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है: 1. जीवन परिचय एवं जन्म जन्म: लगभग 1498 ईस्वी में। जन्म स्थान: कुड़की गांव (वर्तमान में […]
संत मीराबाई (1498–1547 ई.) मध्यकालीन भारत और राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध सगुण (कृष्ण) भक्त कवयित्री और संत थीं। उन्हें ‘राजस्थान की राधा’ के रूप में जाना जाता है। उनके जीवन और भक्ति का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:
1. जीवन परिचय एवं जन्म
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जन्म: लगभग 1498 ईस्वी में।
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जन्म स्थान: कुड़की गांव (वर्तमान में पाली जिला, राजस्थान)। बाद में उनका पालन-पोषण मेड़ता में उनके दादा राव जोधा के पोते राव दूदा के संरक्षण में हुआ।
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माता-पिता: इनके पिता का नाम रतन सिंह राठौड़ था। मीराबाई की माता का नाम वीर कुंवरि था, जिनका निधन मीरा के बचपन में ही हो गया था।
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विवाह: उनका विवाह सन 1516 में मेवाड़ के प्रसिद्ध राणा सांगा के बड़े पुत्र कुंवर भोजराज के साथ हुआ था। विवाह के कुछ वर्षों बाद ही उनके पति भोजराज का निधन हो गया, जिसके बाद मीराबाई ने अपना पूरा जीवन भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में समर्पित कर दिया।
2. भक्ति का स्वरूप और विशेषताएं
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सगुण भक्ति: संत मीराबाई ने भगवान श्रीकृष्ण (जिसे वे ‘गिरधर गोपाल’ कहती थीं) की उपासना पति रूप में की। उनकी भक्ति माधुर्य भाव (प्रेमाभक्ति) की सर्वोच्च मिसाल है।
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सामाजिक विरोध का सामना: राजघराने से ताल्लुक रखने के बावजूद, मीराबाई ने महलों के सुख-वैभव को त्याग दिया। उन्होंने उस समय के कठोर सामाजिक बंधनों, पर्दा प्रथा और कुल-मर्यादा की परवाह न करते हुए साधु-संतों की संगति में भजन-कीर्तन करना शुरू किया।
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मीरा के पद (पदावली): उनकी रचनाएँ राजस्थानी, ब्रज और गुजराती भाषाओं के मिश्रित रूप (जिसे ‘मीरा की भाषा’ कहा जाता है) में हैं। उनके भजनों और पदों को ‘पदावली’ कहा जाता है, जो आज भी बड़े चाव से गाए जाते हैं। उनके प्रसिद्ध भजनों में “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई” आदि शामिल हैं।
3. जीवन के अंतिम वर्ष और द्वारका यात्रा
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परिवार और ससुराल पक्ष (मेवाड़ के शासकों) द्वारा उनकी भक्ति और जीवनशैली का विरोध किए जाने के कारण (कहा जाता है कि उन्हें विष देने के भी प्रयास किए गए), मीराबाई ने मेवाड़ छोड़ दिया था।
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वे पहले मेड़ता, फिर वृंदावन गईं और अपने जीवन के अंतिम वर्षों में गुजरात के द्वारका चली गईं, जहाँ रणछोड़ जी के मंदिर में वे भगवान की भक्ति में लीन हो गईं। माना जाता है कि सन 1547 ईस्वी के आसपास वे द्वारका में ही देवलोक को प्राप्त हुईं (कृष्ण की मूर्ति में विलीन हो गईं)।
4. मीराबाई से जुड़े प्रमुख स्थल
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कुड़की (पाली): उनका जन्म स्थान।
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मेड़ता (नागौर): उनका ननिहाल व बचपन का स्थल, जहाँ चारभुजानाथ का प्रसिद्ध मंदिर है जहाँ मीरा जी पूजा करती थीं।
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चित्तौड़गढ़ दुर्ग: उनका ससुराल, जहाँ मीराबाई का मंदिर (जहां वे पूजा करती थीं) आज भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र है।
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द्वारका (गुजरात): उनके जीवन का अंतिम पड़ाव और मुख्य आराध्य स्थल।