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विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव)

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सत्यापित: 01 September 2026
मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष एवं अजमेर के चाहमान (चौहान) राजवंश के इतिहास में विग्रहराज चतुर्थ (लोकप्रिय नाम: ‘बीसलदेव’, शासनकाल: 1153–1163 ईस्वी) का शासनकाल राजनीतिक विजयों, साम्राज्य विस्तार, साहित्य और स्थापत्य कला का ‘स्वर्ण युग’ (Golden Era) माना जाता है। समय काल: 1153–1163 ईस्वी (12वीं शताब्दी का मध्य भाग)। वंशावलीगत स्थिति: बिजौलिया शिलालेख […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष एवं अजमेर के चाहमान (चौहान) राजवंश के इतिहास में विग्रहराज चतुर्थ (लोकप्रिय नाम: ‘बीसलदेव’, शासनकाल: 1153–1163 ईस्वी) का शासनकाल राजनीतिक विजयों, साम्राज्य विस्तार, साहित्य और स्थापत्य कला का ‘स्वर्ण युग’ (Golden Era) माना जाता है।
  • समय काल: 1153–1163 ईस्वी (12वीं शताब्दी का मध्य भाग)।
  • वंशावलीगत स्थिति:
    • बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) के अनुसार, ये अर्णोराज (आनाजी) और रानी सुधवा के पुत्र थे।
    • इन्होंने अपने पितृहंता बड़े भाई जगद्देव को पराजित कर निष्कासित किया और अजमेर की गद्दी संभाली।
  • उपाधियाँ:
    • कविबांधव / कतिबांधव: महाकवि जयानक कृत पृथ्वीराज विजय के अनुसार, कवियों और विद्वानों को भरपूर आश्रय देने तथा स्वयं एक उच्च कोटि के नाटककार होने के कारण इन्हें यह उपाधि मिली।
  • साम्राज्य विस्तार एवं दिल्ली विजय (तोमर पराजय):
    • विग्रहराज चतुर्थ चौहान वंश के प्रथम शासक थे जिन्होंने दिल्ली के तोमर (तंवर) शासकों को पराजित कर दिल्ली (ढिल्लिका) पर अपना राजनीतिक आधिपत्य स्थापित किया।
    • दिल्ली-शिवालिक स्तंभ अभिलेख (1164 ई.): फिरोजशाह कोटला (दिल्ली) में स्थित अशोक स्तंभ पर विग्रहराज चतुर्थ के तीन अभिलेख उत्कीर्ण हैं। इसमें उल्लेख है कि इन्होंने विंध्याचल से लेकर हिमालय तक के क्षेत्र से म्लेच्छों (तुर्कों) को खदेड़कर आर्यभूमि को पुनः ‘आर्यावर्त’ बनाया।
    • गजनी के अमीर हम्मीर (खुसरो शाह/बहराम शाह) की पराजय: गजनी के मुस्लिम आक्रांता अमीर हम्मीर को पराजित कर पंजाब और हांसी सीमांत को सुरक्षित किया।
  • स्थापत्य निर्माण कार्य:
    • सरस्वती कंठाभरण संस्कृत पाठशाला (अजमेर): इन्होंने 1153 ई. में अजमेर में एक भव्य त्रि-तलीय संस्कृत महाविद्यालय बनवाया। कालांतर में 1198–1200 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे तुड़वाकर मस्जिद का रूप दिया, जिसे ‘ढाई दिन का झोंपड़ा’ कहा जाता है।
    • बीसलसर झील एवं बीसलपुर कस्बा (टोंक): टोंक में बनास नदी के किनारे बीसलपुर कस्बा बसाया, बीसलसर (बीसलपुर) बांध/झील बनवाई तथा वहाँ प्रसिद्ध गोकर्णेश्वर (शिव) मंदिर का निर्माण करवाया।
2. प्रमुख ऐतिहासिक ग्रंथ, नाटक एवं साहित्यकार
विग्रहराज चतुर्थ का काल संस्कृत और अपभ्रंश/राजस्थानी साहित्य का चरमोत्कर्ष था:
ग्रंथ / नाटक / स्रोत रचनाकार / रचयिता भाषा / विधा मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण
हरिकेली नाटक स्वयं विग्रहराज चतुर्थ संस्कृत (नाटक) महाकवि भारवि के किरातार्जुनीयम् पर आधारित (भगवान शिव और अर्जुन का युद्ध प्रसंग)। इसकी पंक्तियाँ ढाई दिन के झोंपड़े की दीवारों तथा इंग्लैंड के ब्रिस्टल में राजा राममोहन राय के स्मारक पर उत्कीर्ण हैं।
ललित विग्रहराज महाकवि सोमदेव (दरबारी राजकवि) संस्कृत (नाटक) विग्रहराज चतुर्थ और इन्द्रपुर की राजकुमारी देसलदेवी की प्रेमकथा तथा गजनी के शासक अमीर हम्मीर पर विजय का प्रामाणिक विवरण।
बीसलदेव रासो नरपति नाल्ह प्राचीन राजस्थानी / पिंगल (गेय काव्य) 4 खंडों व 128 छंदों का विरह-प्रधान श्रृंगारिक ग्रंथ। इसमें बीसलदेव (विग्रहराज) और मालवा के परमार राजा भोज की पुत्री राजमती के विवाह, रूठकर उड़ीसा जाने तथा 12 वर्ष बाद पुनर्मिलन की कथा है।
पृथ्वीराज विजय जयानक भट्ट (कश्मीरी महाकवि) संस्कृत (महाकाव्य) विग्रहराज चतुर्थ को ‘कविबांधव’ की उपाधि दिए जाने तथा उनके काल को चौहान साम्राज्य का स्वर्णकाल बताने का साक्ष्य।
दिल्ली-शिवालिक स्तंभ लेख (1164 ई.) उत्कीर्णक: कायस्थ श्रीपति संस्कृत (शिलालेख) दिल्ली पर अधिकार, म्लेच्छों (तुर्कों) के निष्कासन और आर्यावर्त की सीमाओं के विस्तार का आधिकारिक साक्ष्य।
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक टिप्पणियाँ
  • इतिहासकार किलहॉर्न (F. Kielhorn) का कथन:
    “विग्रहराज चतुर्थ उन गिने-चुने हिंदू शासकों में से थे, जो विद्या और शौर्य दोनों में कालिदास और भवभूति की होड़ कर सकते थे।”
  • इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा का मत: विग्रहराज चतुर्थ का काल सपादलक्ष और अजमेर के चौहानों का निर्विवाद रूप से ‘स्वर्ण युग’ (Golden Age) था।
  • धार्मिक नीति एवं अमारि घोषणा: परम शैव होते हुए भी विग्रहराज ने जैन धर्म को अत्यधिक संरक्षण दिया। जैन आचार्य धर्मघोष सूरि के अनुरोध पर इन्होंने एकादशी के दिन संपूर्ण राज्य में पशु-वध पर पूर्ण प्रतिबंध (अमारि घोषणा) लागू किया तथा पार्श्वनाथ मंदिर हेतु अनुदान दिए।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
  • ‘कविबांधव / कतिबांधव’ उपाधि धारक: विग्रहराज चतुर्थ।
  • ‘हरिकेली नाटक’ के रचयिता: स्वयं विग्रहराज चतुर्थ (संस्कृत)।
  • ‘ललित विग्रहराज’ नाटक के रचयिता: सोमदेव (विग्रहराज के राजकवि)।
  • ‘बीसलदेव रासो’ के रचयिता: नरपति नाल्ह (पात्र: बीसलदेव व रानी राजमती)।
  • संस्कृत पाठशाला (ढाई दिन का झोंपड़ा) के निर्माता: विग्रहराज चतुर्थ (1153 ई.)।
  • दिल्ली को जीतकर चौहान साम्राज्य में मिलाने वाले प्रथम शासक: विग्रहराज चतुर्थ।
  • बीसलपुर कस्बा, बीसलसर झील एवं गोकर्णेश्वर मंदिर (टोंक) के निर्माता: विग्रहराज चतुर्थ।

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