मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष एवं अजमेर के चाहमान (चौहान) राजवंश के 12वीं शताब्दी के अत्यंत महत्वपूर्ण शासकों में सोमेश्वर (शासनकाल: 1169–1177 ईस्वी) का स्थान अत्यधिक प्रतिष्ठित है। ये प्रसिद्ध चौहान सम्राट पृथ्वीराज तृतीय (राय पिथौरा) के पिता थे। समय काल: 1169–1177 ईस्वी (12वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध)। वंशावलीगत स्थिति: बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष एवं अजमेर के चाहमान (चौहान) राजवंश के 12वीं शताब्दी के अत्यंत महत्वपूर्ण शासकों में सोमेश्वर (शासनकाल: 1169–1177 ईस्वी) का स्थान अत्यधिक प्रतिष्ठित है। ये प्रसिद्ध चौहान सम्राट पृथ्वीराज तृतीय (राय पिथौरा) के पिता थे।
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समय काल: 1169–1177 ईस्वी (12वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध)।
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वंशावलीगत स्थिति:
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बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) और महाकवि जयानक कृत पृथ्वीराज विजय के अनुसार, ये अर्णोराज (आनाजी) और गुजरात के चालुक्य नरेश जयसिंह सिद्धराज की पुत्री कांचनदेवी के पुत्र थे।
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विग्रहराज चतुर्थ और जगद्देव इनके सौतेले भाई थे।
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पृथ्वीराज द्वितीय की निःसंतान मृत्यु के बाद, अजमेर के मुख्य सामंतों एवं मंत्रियों (जैसे महामात्य कदमवास/कैमास) ने इन्हें गुजरात से ससम्मान बुलाकर अजमेर की गद्दी पर आसीन किया।
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गुजरात के चालुक्य दरबार में लालन-पालन एवं विवाह:
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सोमेश्वर का बचपन और युवावस्था अपने ननिहाल अणहिलपाटन (गुजरात) में चालुक्य सम्राट जयसिंह सिद्धराज और कुमारपाल के संरक्षण में बीती।
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इन्होंने कुमारपाल के साथ कई युद्धों में भाग लिया, जिनमें कोंकण के शासक मल्लिकार्जुन का युद्धभूमि में सिर काटकर अपनी असाधारण वीरता सिद्ध की थी।
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इनका विवाह त्रिपुरी (चेदि/मध्य प्रदेश) के कलचुरि (हैहय) राजवंश की राजकुमारी कर्पूरी देवी के साथ हुआ।
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कर्पूरी देवी से इनके दो प्रतापी पुत्र हुए:
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पृथ्वीराज तृतीय (राय पिथौरा) (जन्म: 1166 ई., अणहिलपाटन)
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हरिराज
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‘प्रतापलंकेश्वर’ की उपाधि:
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सोमेश्वर एक शूरवीर, साहसी और धर्मनिष्ठ शासक थे। शिलालेखों और साहित्यिक ग्रंथों में इन्हें इनकी असाधारण वीरता और तेज के कारण ‘प्रतापलंकेश्वर’ (लंकापति रावण के समान पराक्रमी/तेजस्वी) की उपाधि से विभूषित किया गया है।
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बिजौलिया शिलालेख (1170 ईस्वी / वि.सं. 1226) का उत्कीर्णन:
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सोमेश्वर के शासनकाल में 1170 ई. में भीलवाड़ा जिले के बिजौलिया स्थित पार्श्वनाथ मंदिर के पास प्रसिद्ध ‘बिजौलिया शिलालेख‘ उत्कीर्ण करवाया गया।
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यह शिलालेख चौहान राजवंश के इतिहास, उनकी उत्पत्ति (वत्सगोत्रीय विप्र) और प्राचीन भौगोलिक नामों को जानने का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है।
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सोमेश्वर ने इस जैन मंदिर के लिए ‘रेवाणा’ गाँव अनुदान (भेंट) में दिया था।
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स्थापत्य कला, वैद्यनाथ मंदिर एवं मूर्तिकला:
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वैद्यनाथ मंदिर (अजमेर): सोमेश्वर ने अजमेर में भगवान शिव के विशाल ‘वैद्यनाथ मंदिर’ का निर्माण करवाया।
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पिता व स्वयं की मूर्ति निर्माण (दुर्लभ मूर्तिकला): इन्होंने इस मंदिर परिसर में अपने पिता अर्णोराज की घोड़े पर सवार मूर्ति तथा अपने स्वयं की मूर्ति (हाथ में तलवार लिए) स्थापित करवाई। मध्यकालीन राजस्थान के राजपूत इतिहास में जीवित शासक और उनके पिता की ऐसी पाषाण मूर्तियां बनवाने का यह अत्यंत अनूठा और पहला उदाहरण है।
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इन्होंने अजमेर में अनेक भव्य देवालयों और जन-कल्याणकारी भवनों का निर्माण कराया।
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सिक्के:
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सोमेश्वर ने अपने नाम के बैल और घुड़सवार (Bull and Horseman) शैली के ताँबे और चाँदी के सिक्के जारी किए, जिन पर ‘श्री सोमेश्वर देव’ और ‘असावरी श्री समंतदेव’ अंकित मिलता है।
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2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
सोमेश्वर के शासनकाल, शिलालेख और विजयों के प्रामाणिक संदर्भ निम्नलिखित स्रोतों में मिलते हैं:
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) | गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव, कायस्थ छीछ) | संस्कृत (शिलालेख) | सर्वप्रमुख स्रोत। सोमेश्वर के काल में श्रावक जैन लोलाक द्वारा उत्कीर्णित। इसमें चाहमानों को वत्सगोत्रीय ब्राह्मण कहा गया है तथा सांभर झील (वासुदेव) व नगरों के प्राचीन नाम मिलते हैं। |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक भट्ट (कश्मीरी महाकवि) | संस्कृत (महाकाव्य) | सोमेश्वर का चालुक्य दरबार में लालन-पालन, कोंकण नरेश मल्लिकार्जुन का वध, कर्पूरी देवी से विवाह, वैद्यनाथ मंदिर निर्माण और पिता-पुत्र की मूर्तियों का विशद वर्णन। |
| कुमारपाल चरित | हेमचन्द्र सूरि / जयसिंह सूरि | संस्कृत (प्रबंध काव्य) | गुजरात चालुक्य दरबार में सोमेश्वर की वीरता और मल्लिकार्जुन वध की ऐतिहासिक पुष्टि। |
| आंवला एवं बड़ली शिलालेख | स्थानीय समकालीन उत्कीर्णक | संस्कृत (शिलालेख) | सोमेश्वर द्वारा धारण की गई उपाधियों (‘महाराजाधिराज’ व ‘प्रतापलंकेश्वर’) और उनके शासन विस्तार का साक्ष्य। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; सोमेश्वर के 1169–1177 ई. कालक्रम, बिजौलिया अभिलेख और मूर्तिकला नवाचार का शोधपरक विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
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चौहान-चालुक्य संबंधों में सौहार्द: सोमेश्वर के ननिहाल गुजरात में होने के कारण इनके 8 वर्ष के शांत और समृद्ध शासनकाल में अजमेर और गुजरात के मध्य कोई बड़ा टकराव नहीं हुआ, जिससे व्यापार और कला का भारी विकास हुआ।
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धार्मिक समन्वय एवं सर्वधर्म सद्भाव: परम शैव होते हुए भी सोमेश्वर ने जैन धर्म को पूर्ण संरक्षण दिया (बिजौलिया जैन मंदिर को रेवाणा गाँव भेंट) और वैष्णव उपासना का भी आदर किया।
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अजमेर की राजनीतिक स्थिरता: पृथ्वीराज द्वितीय के बाद उत्पन्न उत्तराधिकार संकट को दूर कर इन्होंने साम्राज्य को सुदृढ़ किया, जिसके फलस्वरूप इनके पुत्र पृथ्वीराज तृतीय को एक सशक्त साम्राज्य प्राप्त हुआ।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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‘प्रतापलंकेश्वर’ उपाधि धारक चौहान शासक: सोमेश्वर।
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बिजौलिया शिलालेख (1170 ई. / वि.सं. 1226) किस शासक के काल का है: सोमेश्वर (रचयिता: गुणभद्र)।
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बिजौलिया जैन मंदिर हेतु कौन-सा गाँव दान दिया: रेवाणा गाँव।
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अजमेर में वैद्यनाथ (शिव) मंदिर के निर्माता: सोमेश्वर।
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पिता अर्णोराज और स्वयं की पाषाण मूर्ति मंदिर में लगवाने वाले शासक: सोमेश्वर।
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पत्नी: कर्पूरी देवी (कलचुरि/चेदि वंश की राजकुमारी) | पुत्र: पृथ्वीराज तृतीय एवं हरिराज।
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वंशावली क्रम: अर्णोराज ➔ विग्रहराज चतुर्थ ➔ पृथ्वीराज द्वितीय ➔ सोमेश्वर (1169–1177 ई.) ➔ पृथ्वीराज तृतीय (1177–1192 ई.)।