मुख्य बिंदु: यह आंदोलन अलवर रियासत में नए भूमि बंदोबस्त, लगान दरों में अत्यधिक वृद्धि और राजपूत किसानों के पारंपरिक विशेषाधिकारों की समाप्ति के विरुद्ध हुआ था। इसका अंत 14 मई 1925 को आधुनिक भारत के सबसे वीभत्स और बर्बर नरसंहारों में से एक के रूप में हुआ। 1. पृष्ठभूमि व आंदोलन के कारण रियासत व तत्कालीन […]
यह आंदोलन अलवर रियासत में नए भूमि बंदोबस्त, लगान दरों में अत्यधिक वृद्धि और राजपूत किसानों के पारंपरिक विशेषाधिकारों की समाप्ति के विरुद्ध हुआ था। इसका अंत 14 मई 1925 को आधुनिक भारत के सबसे वीभत्स और बर्बर नरसंहारों में से एक के रूप में हुआ।
1. पृष्ठभूमि व आंदोलन के कारण
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रियासत व तत्कालीन शासक: अलवर रियासत, महाराजा जयसिंह।
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प्रमुख भागीदार वर्ग: मुख्य रूप से राजपूत किसान (इस आंदोलन की यह विशिष्टता थी कि यहाँ सामंती वर्ग की ही जाति के किसान शासक के विरुद्ध लामबंद हुए)।
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आंदोलन के प्रमुख कारण:
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नया भूमि बंदोबस्त (1923-24 ई.): राज्य में नया भूमि बंदोबस्त लागू किया गया, जिसके तहत भू-राजस्व (लगान) की दरों में 40% तक की भारी वृद्धि कर दी गई।
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पारंपरिक रियायतों की समाप्ति: पूर्व व्यवस्था के अनुसार राजपूत काश्तकारों से सामान्य किसानों की तुलना में कम लगान लिया जाता था। नए बंदोबस्त में उनकी सभी पारंपरिक रियायतें समाप्त कर दी गईं और उन पर भी भारी लगान थोप दिया गया।
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अवैध उपकर व चराई कर: चरागाहों पर नया कर और विविध लाग-बागों की कठोर वसूली।
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2. आंदोलन की शुरुआत व नेतृत्व
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प्रारंभिक विरोध (1923-24): बानसूर और राजगढ़ तहसीलों के राजपूत किसानों ने संगठित होकर बढ़ी हुई दरों पर लगान देने से साफ इनकार कर दिया।
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प्रमुख नेतृत्वकर्ता:
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माधव सिंह
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गोविंद सिंह
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गंगा सिंह
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अमर सिंह
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अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा का सहयोग: किसानों ने दिल्ली में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अधिवेशन (1924-25) में अपनी समस्याएँ उठाईं और समाचार-पत्रों के माध्यम से प्रचार किया।
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पुकार पत्रिका: किसानों ने अपनी दुर्दशा और मांगों को लेकर ‘पुकार’ (Pukar) नामक एक पर्चा/पुस्तिका प्रकाशित कर रियासत भर में वितरित करवाई।
3. नीमूचाणा हत्याकांड (14 मई 1925 ई.)
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स्थान: नीमूचाणा गाँव (बानसूर तहसील, अलवर जिला)।
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आयोजन: 14 मई 1925 को नीमूचाणा गाँव में लगभग 2,500 से अधिक किसान (महिलाएँ और बच्चे भी शामिल) ठाकुरों और राज्य सरकार की दमनात्मक नीतियों के विरुद्ध सभा कर रहे थे।
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कमांडिंग ऑफिसर (दमनकर्ता): राज्य सेना का कमांडर जनरल छज्जू सिंह।
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घटनाक्रम:
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जनरल छज्जू सिंह भारी सशस्त्र सेना, मशीनगनों और तोपों के साथ पहुँचा।
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उसने पूरे गाँव और सभा स्थल को चारों तरफ से घेर लिया।
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बिना किसी पूर्व चेतावनी या तितर-बितर होने का समय दिए, शांतिपूर्ण निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध मशीनगनों से गोलियाँ बरसा दी गईं।
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गाँव के घरों और खलिहानों में आग लगा दी गई, जिससे कई लोग और मवेशी जिंदा जल गए।
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हताहत:
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सरकारी रिपोर्ट में केवल 13-14 लोगों की मृत्यु दिखाई गई, परंतु वास्तविक रूप से 156 से अधिक किसान शहीद हुए और सैकड़ों घायल हुए।
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4. राष्ट्रीय प्रतिक्रिया एवं ऐतिहासिक उपनाम (सर्वाधिक महत्वपूर्ण)
इस क्रूर नरसंहार की गूँज पूरे देश में फैली और राष्ट्रीय समाचार-पत्रों व नेताओं ने इसकी तुलना जालियांवाला बाग से की:
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महात्मा गांधी की टिप्पणी:
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गांधी जी ने अपने समाचार-पत्र ‘यंग इंडिया’ (Young India) में इस हत्याकांड की कठोर निंदा करते हुए इसे:
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“जालियांवाला बाग हत्याकांड से भी अधिक वीभत्स/क्रूर” बताया।
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इसे “दोहरी डायरशाही” (Dyrism Double Distilled) की संज्ञा दी।
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‘रियासत’ समाचार-पत्र:
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दिल्ली से प्रकाशित उर्दू समाचार पत्र ‘रियासत’ (संपादक: दीवान सिंह मफ्तून) ने 31 मई 1925 के अंक में नीमूचाणा कांड की सीधी तुलना ‘जालियांवाला बाग हत्याकांड’ से की और इसे “राजस्थान का जालियांवाला बाग” लिखा।
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‘प्रताप’ समाचार-पत्र (कानपुर):
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गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र ‘प्रताप’ ने सचित्र आलेख छापकर महाराजा जयसिंह के अत्याचारों को उजागर किया।
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महिला नेतृत्व (सीता देवी):
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इस आंदोलन में किसान वीरांगना सीता देवी (थानागाजी/नीमूचाणा क्षेत्र) ने महिलाओं का नेतृत्व किया और लाठियों-बंदूकों के सामने अदम्य साहस का परिचय दिया।
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5. आंदोलन का परिणाम व समझौता
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राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी बदनामी और फजीहत झेलने के बाद महाराजा जयसिंह बैकफुट पर आ गए।
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18 नवंबर 1925 को राज्य सरकार ने एक आदेश जारी किया:
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पुराने भूमि बंदोबस्त के अनुसार लगान की दरों को फिर से बहाल कर दिया गया।
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राजपूत किसानों को पारंपरिक रियायतें पुनः प्रदान की गईं।
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इस प्रकार अत्यधिक रक्तपात के बाद किसानों की मांगें मान ली गईं और आंदोलन समाप्त हुआ।
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6. परीक्षा उपयोगी सूक्ष्म तथ्य (Quick Revision Table)
| प्रमुख बिंदु | परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| अवधि | 1923 – 1925 ई. |
| हत्याकांड की सटीक तिथि | 14 मई 1925 ई. |
| स्थान | नीमूचाणा गाँव (बानसूर तहसील, अलवर) |
| तत्कालीन अलवर महाराजा | महाराजा जयसिंह |
| प्रमुख किसान नेता | माधव सिंह, गोविंद सिंह, गंगा सिंह |
| प्रमुख महिला सत्याग्रही | सीता देवी |
| किसानों द्वारा निकाला गया पर्चा | ‘पुकार’ |
| गोलीबारी करने वाला सैन्य कमांडर | जनरल छज्जू सिंह (इसे राजस्थान का ‘जनरल डायर’ कहा जाता है) |
| गांधीजी द्वारा दी गई संज्ञा | ‘दोहरी डायरशाही’ (Dyrism Double Distilled) (‘यंग इंडिया’ में) |
| जालियांवाला बाग से तुलना करने वाला पत्र | ‘रियासत’ (दिल्ली) |
| समापन समझौता | नवंबर 1925 (पुरानी लगान दरें पुनः लागू) |