मुख्य बिंदु: भरतपुर रियासत में हुआ यह किसान आंदोलन राजस्थान के अन्य रियासती आंदोलनों की तुलना में विशिष्ट था। भरतपुर में अधिकांश भूमि खालसा (सीधे राज्य के नियंत्रण में) थी, इसलिए यहाँ किसानों का सीधा टकराव किसी जागीरदार से न होकर रियासती सरकार और ब्रिटिश प्रशासन से था। 1. पृष्ठभूमि व आंदोलन के कारण भूमि व्यवस्था का […]
भरतपुर रियासत में हुआ यह किसान आंदोलन राजस्थान के अन्य रियासती आंदोलनों की तुलना में विशिष्ट था। भरतपुर में अधिकांश भूमि खालसा (सीधे राज्य के नियंत्रण में) थी, इसलिए यहाँ किसानों का सीधा टकराव किसी जागीरदार से न होकर रियासती सरकार और ब्रिटिश प्रशासन से था।
1. पृष्ठभूमि व आंदोलन के कारण
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भूमि व्यवस्था का स्वरूप: भरतपुर में लगभग 95% भूमि खालसा थी। यहाँ जागीरदारी प्रथा मेवाड़ या मारवाड़ जितनी प्रभावी नहीं थी।
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शासक की स्थिति: तत्कालीन महाराजा किशन सिंह की मृत्यु (1929) के बाद उनके नाबालिग पुत्र बृजेंद्र सिंह गद्दी पर बैठे। राज्य का वास्तविक प्रशासनिक नियंत्रण एक ब्रिटिश रीजेंसी काउंसिल / प्रशासक (मि. डंकन / मि. आर्मस्ट्रांग) के हाथों में था।
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आंदोलन के प्रमुख कारण:
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नया भूमि बंदोबस्त (1930-31 ई.): राज्य में नया बंदोबस्त लागू किया गया, जिसके तहत नकद लगान की दरों में भारी वृद्धि कर दी गई।
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वैश्विक आर्थिक मंदी (Great Depression – 1929-30): कृषि उपजों के भाव 50% से अधिक गिर गए थे, जिसके कारण किसान पुराना लगान देने में भी असमर्थ थे; ऐसे समय में बढ़ी हुई दरें थोप दी गईं।
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लंबरदारों की जवाबदेही: गाँव के मुखिया यानी लंबरदार (पटेल) ही किसानों से लगान वसूल कर राजकोष में जमा कराते थे। लगान न चुका पाने पर प्रशासन लंबरदारों को प्रताड़ित और बेइज्जत करता था।
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2. आंदोलन की शुरुआत व नेतृत्व
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प्रारंभ वर्ष: 1931 ई.
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प्रमुख नेतृत्वकर्ता: भोजी लंबरदार (गाँव: बिथौना)।
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आंदोलन का स्वरूप:
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भोजी लंबरदार ने आसपास के गाँवों के पटेलों और लंबरदारों को संगठित किया।
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किसानों की विशाल सभाएँ आयोजित की गईं, जिनमें खुला ऐलान किया गया कि जब तक लगान की बढ़ी हुई दरें वापस नहीं ली जातीं, कोई भी किसान एक पाई भी लगान नहीं देगा (कर-बंदी / Non-tax movement)।
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किसानों ने लंबरदारों को भी हिदायत दी कि वे सरकारी खजाने में कोई वसूली जमा न कराएं।
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3. सरकारी दमन एवं भोजी लंबरदार की गिरफ्तारी
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गिरफ्तारी (नवंबर 1931):
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आंदोलन को उग्र होता देख भरतपुर प्रशासन घबरा गया।
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23 नवंबर 1931 को भोजी लंबरदार को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।
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किसानों का उग्र प्रदर्शन:
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भोजी लंबरदार की गिरफ्तारी के विरोध में लगभग 500 से अधिक किसानों ने थाने व कचहरी का घेराव किया।
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पुलिस ने भीड़ पर लाठीचार्ज किया और कई प्रमुख किसान नेताओं को बंदी बना लिया।
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4. आंदोलन का परिणाम
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मुख्य नेतृत्वकर्ता के जेल जाने और पुलिसिया दमन के चलते प्रत्यक्ष आंदोलन कुछ समय के लिए धीमा पड़ा।
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परंतु ब्रिटिश प्रशासक समझ गए कि मंदी के दौर में सख्ती से विद्रोह भड़क सकता है। अतः सरकार ने आंतरिक समीक्षा के बाद:
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लगान की दरों में आंशिक छूट दी।
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वसूली में सख्ती कम की।
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बाद में यही किसान असंतोष आगे चलकर भरतपुर राज्य प्रजा परिषद (1938) और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जुड़ गया।
5. परीक्षा उपयोगी सूक्ष्म तथ्य (Quick Revision Table)
| प्रमुख बिंदु | परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| आंदोलन का वर्ष | 1931 ई. |
| भूमि का स्वरूप | मुख्य रूप से खालसा भूमि (लगभग 95%) |
| प्रमुख नेतृत्वकर्ता | भोजी लंबरदार (बिथौना गाँव) |
| मूल कारण | नया भूमि बंदोबस्त (लगान वृद्धि) + 1929-30 की वैश्विक मंदी |
| मुख्य रणनीति | कर-बंदी (No-Tax Movement) |
| भोजी लंबरदार की गिरफ्तारी | 23 नवंबर 1931 ई. |
| विशिष्टता | जागीरदार के खिलाफ न होकर सीधे ब्रिटिश प्रशासक/राज्य के विरुद्ध संघर्ष |