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मेर विद्रोह (1818–1821 ई.)

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सत्यापित: 02 September 2026
मुख्य बिंदु: मेर विद्रोह राजस्थान में ब्रिटिश सत्ता और सामंती व्यवस्था के विरुद्ध प्रारंभिक जनजातीय/सामुदायिक विद्रोहों में से एक है। RPSC और RSMSSB परीक्षाओं के दृष्टिकोण से इसके सभी प्रमुख पहलू नीचे दिए गए हैं: 1. भौगोलिक व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्षेत्र (मेरवाड़ा): यह अरावली पर्वतमाला की तंग घाटियों में स्थित एक विषम पहाड़ी भू-भाग था, जिसका विस्तार […]
मेर विद्रोह राजस्थान में ब्रिटिश सत्ता और सामंती व्यवस्था के विरुद्ध प्रारंभिक जनजातीय/सामुदायिक विद्रोहों में से एक है। RPSC और RSMSSB परीक्षाओं के दृष्टिकोण से इसके सभी प्रमुख पहलू नीचे दिए गए हैं:

1. भौगोलिक व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • क्षेत्र (मेरवाड़ा): यह अरावली पर्वतमाला की तंग घाटियों में स्थित एक विषम पहाड़ी भू-भाग था, जिसका विस्तार अजमेर, मेवाड़ (उदयपुर) और मारवाड़ (जोधपुर) की सीमाओं पर फैला हुआ था।
  • मेर समुदाय की प्रकृति: मेर लड़ाकू और स्वतंत्र स्वभाव के लोग थे। वे किसी केंद्रीय सत्ता के अधीन रहने के आदी नहीं थे। आय के लिए वे समीपवर्ती मैदानी रियासती क्षेत्रों से ‘धाड़’ (छापेमारी/लूटपाट) और ‘राखवाली कर’ (सुरक्षा कर) वसूलते थे।

2. विद्रोह के प्रमुख कारण

  1. अंग्रेज-राजपूत संधियाँ (1818): 1818 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजपूताना की रियासतों के साथ संधियाँ कीं। अजमेर 1818 में दौलतराव सिंधिया से सीधे अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया।
  2. पारंपरिक अधिकारों का हनन: अजमेर के ब्रिटिश सुपरिंटेंडेंट एफ. वाइल्डर (F. Wilder) ने मेरों की लूटपाट रोकने और उन्हें कृषि/स्थाई जीवन में ढालने के लिए दबाव बनाया।
  3. समझौते का उल्लंघन: मार्च 1819 में झाक (Jhak) गाँव में मेरों ने वाइल्डर के साथ एक समझौता किया था, जिसमें उन्होंने उपद्रव न करने की बात मानी थी। लेकिन पुलिस चौकियों की स्थापना और राजस्व दबाव के कारण मेरों में असंतोष भड़क उठा।

3. विद्रोह का घटनाक्रम (Chronology)

  • प्रथम चरण (मार्च 1819):
    • झाक गाँव के मेरों द्वारा ब्रिटिश चौकियों पर आक्रमण।
    • वाइल्डर ने जोधपुर और उदयपुर की सेनाओं की सहायता से इसे दबाने का प्रयास किया।
  • द्वितीय चरण — व्यापक विद्रोह (नवंबर 1820):
    • मेरों ने संगठित होकर झाक, लुलवा (Lulwa) और शामगढ़ (Shamgarh) स्थित ब्रिटिश पुलिस थानों और चौकियों पर हमला कर दिया और सिपाहियों को मार गिराया।
    • यह विद्रोह केवल अजमेर तक सीमित न रहकर मेवाड़ और मारवाड़ के मेरवाड़ा क्षेत्रों में भी फैल गया।
  • दमन (दिसंबर 1820 – जनवरी 1821):
    • अंग्रेजों ने संयुक्त मोर्चा तैयार किया: ब्रिटिश सेना (कर्नल मैक्सवेल व कर्नल गार्डनर) + मेवाड़ सेना + मारवाड़ सेना।
    • मेरों के पहाड़ी ठिकानों पर चौतरफा हमला हुआ, गाँव जला दिए गए और जनवरी 1821 के अंत तक इस विद्रोह का बेरहमी से दमन कर दिया गया।

4. परिणाम एवं प्रभाव

(क) मेरवाड़ा बटालियन का गठन (1822 ई.)

  • उद्देश्य: विद्रोही मेरों को अनुशासित करना, उन्हें रोजगार देना तथा क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाए रखना।
  • मुख्यालय: ब्यावर (Beawar)।
  • संरचना: इस बटालियन के गठन का सुझाव कैप्टन टॉड (James Tod) ने दिया था। इसमें मेर युवाओं को भर्ती किया गया।
  • व्यय विभाजन: इसका खर्च तीनों पक्षों ने साझा किया—ब्रिटिश सरकार (अजमेर), मेवाड़ रियासत और मारवाड़ रियासत।

(ख) प्रशासनिक पुनर्गठन:

  • मेरवाड़ा क्षेत्र तीनों अलग-अलग सत्ताओं (कंपनी, मेवाड़, मारवाड़) में बंटा होने के कारण कानून व्यवस्था संभालना मुश्किल था। अतः 1823–1824 तक मेवाड़ और मारवाड़ के मेरवाड़ा हिस्सों को भी प्रशासनिक दृष्टि से अंग्रेजों ने अपने अधीन (लीज पर) ले लिया, जिसे ‘ब्रिटिश मेरवाड़ा’ कहा गया।

5. अति-महत्वपूर्ण परीक्षा तथ्य (Quick Revision Pointers)

बिंदु विवरण
विद्रोह का समय 1818 से 1821 ई.
प्रभावित क्षेत्र मेरवाड़ा (अजमेर, मेवाड़ व मारवाड़ का सीमावर्ती क्षेत्र)
ब्रिटिश अधिकारी एफ. वाइल्डर (अजमेर सुपरिंटेंडेंट), कर्नल मैक्सवेल, कर्नल गार्डनर
विद्रोह के प्रमुख केंद्र झाक, लुलवा, शामगढ़, भवानीखेड़ा
मेरवाड़ा बटालियन की स्थापना 1822 ई. (मुख्यालय: ब्यावर)
सहायक रियासतें मेवाड़ और मारवाड़ (अंग्रेजों के साथ मिलकर दमन किया)

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