मुख्य बिंदु: अलवर रियासत में 1920 के दशक में हुए किसान संघर्षों का यह पहला चरण था, जो मुख्य रूप से रियासत की ‘रौंद’ (शाही शिकारगाह) व्यवस्था और जंगली सूअरों द्वारा फसलों के विनाश के विरुद्ध लड़ा गया था। 1. पृष्ठभूमि व आंदोलन का मूल कारण तत्कालीन अलवर महाराजा: महाराजा जयसिंह। रौंद (शाही शिकारगाह) व्यवस्था: अलवर रियासत […]
अलवर रियासत में 1920 के दशक में हुए किसान संघर्षों का यह पहला चरण था, जो मुख्य रूप से रियासत की ‘रौंद’ (शाही शिकारगाह) व्यवस्था और जंगली सूअरों द्वारा फसलों के विनाश के विरुद्ध लड़ा गया था।
1. पृष्ठभूमि व आंदोलन का मूल कारण
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तत्कालीन अलवर महाराजा: महाराजा जयसिंह।
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रौंद (शाही शिकारगाह) व्यवस्था:
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अलवर रियासत में राजा और सामंतों के शिकार हेतु जंगलों व चरागाहों को आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘रौंद’ कहा जाता था।
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इन रौंदों में जंगली सूअरों को पाला व संरक्षित किया जाता था।
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सूअरों द्वारा फसलों का विनाश:
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ये जंगली सूअर रौंदों से निकलकर खुले खेतों में घुस जाते थे और खड़ी फसलों (बाजरा, गेहूँ, चना आदि) को पूरी तरह नष्ट कर देते थे।
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सख्त कानूनी प्रतिबंध:
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किसानों को अपनी फसलों की रक्षा करने अथवा सूअरों को मारने या भगाने की सख्त मनाही थी।
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यदि कोई किसान किसी सूअर को मार देता या घायल कर देता, तो उस पर कठोर दंडात्मक व आपराधिक मुकदमा चलाया जाता था।
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2. आंदोलन की शुरुआत व नेतृत्व (1921 ई.)
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प्रारंभ वर्ष: 1921 ई.
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प्रभावित क्षेत्र: अलवर, बानसूर, बहरोड़, किशनगढ़बास व थानागाजी क्षेत्र।
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आंदोलन का स्वरूप:
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किसानों ने संगठित होकर रियासत को स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि सूअरों को मारने की अनुमति नहीं दी गई, तो वे सामूहिक रूप से खेती करना बंद कर देंगे और लगान नहीं चुकाएंगे।
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यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक व संगठित था, जिसमें किसानों ने अपनी फसलों की रक्षा को प्राथमिक अधिकार बताया।
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3. रियासती रुख एवं आंदोलन की सफलता
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किसानों का दबाव: किसानों की एकजुटता और खेती ठप होने की चेतावनी के चलते राज्य के राजस्व पर सीधा संकट आ गया।
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महाराजा जयसिंह का फैसला:
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विवश होकर महाराजा जयसिंह ने किसानों की मांग स्वीकार कर ली।
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1921 ई. में ही राज्य सरकार ने आदेश जारी कर किसानों को अपनी फसलों की रक्षा हेतु जंगली सूअरों को मारने की विधिवत अनुमति प्रदान कर दी।
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महत्व: यह राजस्थान के उन दुर्लभ किसान आंदोलनों में से एक था, जिसमें किसानों ने बिना किसी बड़े रक्तपात के अपनी मांग को तुरंत मनवा लिया।
4. परीक्षा हेतु अति-महत्वपूर्ण अंतर (Crucial Clarification)
अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं में छात्र अलवर के दोनों चरणों को आपस में मिला देते हैं। इनमें स्पष्ट अंतर ध्यान रखें:
| बिंदु | प्रथम चरण (सूअर विरोधी आंदोलन) | द्वितीय चरण (नीमूचाणा आंदोलन) |
| वर्ष | 1921 ई. | 1923 – 1925 ई. |
| मूल कारण | जंगली सूअरों द्वारा फसलों की तबाही व मारने पर रोक | नया भू-राजस्व बंदोबस्त (लगान में 40% तक वृद्धि व राजपूतों की रियायतें खत्म करना) |
| परिणाम | सफल (सूअरों को मारने की अनुमति मिली) | नीमूचाणा हत्याकांड (14 मई 1925) |
| रूप | शांतिपूर्ण समझौता | बर्बर नरसंहार (“दोहरी डायरशाही”) |
5. परीक्षा उपयोगी सूक्ष्म तथ्य (Quick Revision Table)
| प्रमुख बिंदु | परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| आंदोलन का वर्ष | 1921 ई. |
| रियासत / शासक | अलवर रियासत / महाराजा जयसिंह |
| मूल समस्या | शाही शिकारगाहों (रौंद) के जंगली सूअरों द्वारा फसलों का विनाश |
| प्रतिबंध | सूअरों को मारने या भगाने पर कानूनी रोक |
| नतीजा | 1921 ई. में राज्य द्वारा किसानों को सूअर मारने की अनुमति दी गई |
| ऐतिहासिक विशिष्टता | राजस्थान का एकमात्र पूर्णतः सफल और त्वरित समाधान वाला ‘सूअर विरोधी’ सत्याग्रह |