मुख्य बिंदु: उनियारा चित्रकला शैली ढूढ़ाड़ शैली की एक बहुत ही महत्वपूर्ण उप-शैली (ठिकाना शैली) है, जिसका विकास टोंक क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले उनियारा ठिकाने में हुआ था। इस शैली का विस्तृत और क्रमबद्ध विवरण नीचे दिया गया है: 1. प्रारंभिक काल और विकास (18वीं शताब्दी) 18वीं शताब्दी का मध्य (सरदार सिंह का काल): उनियारा ठिकाने […]
उनियारा चित्रकला शैली ढूढ़ाड़ शैली की एक बहुत ही महत्वपूर्ण उप-शैली (ठिकाना शैली) है, जिसका विकास टोंक क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले उनियारा ठिकाने में हुआ था। इस शैली का विस्तृत और क्रमबद्ध विवरण नीचे दिया गया है:
1. प्रारंभिक काल और विकास (18वीं शताब्दी)
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18वीं शताब्दी का मध्य (सरदार सिंह का काल):
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उनियारा ठिकाने में राव सरदार सिंह के संरक्षण में चित्रकला का वास्तविक विकास शुरू हुआ।
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चूँकि उनियारा ठिकाना जयपुर (आमेर) और बूंदी-कोटा रियासतों की सीमाओं के पास स्थित था, इसलिए यहाँ की चित्रकला पर जयपुर शैली और बूंदी शैली दोनों का मिला-जुला (मिश्रित) प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
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2. स्वर्ण युग / पीक काल (Golden Period)
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18वीं शताब्दी का उत्तरार्ध:
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इस काल में उनियारा शैली ने अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाई। यहाँ के कलाकारों ने धार्मिक ग्रंथों, रसिकप्रिया, और रागमाला के चित्रों को बहुत बारीकी से चित्रित किया।
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3. प्रमुख विशेषताएँ
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रंगों का प्रयोग: इस शैली के चित्रों में मुख्य रूप से लाल, पीले, हरे और भूरे रंगों का प्रमुखता से उपयोग किया गया है।
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चेहरे और शरीर की बनावट: पुरुषों और महिलाओं के चेहरे के भाव गंभीर, आँखें बड़ी और शरीर की बनावट जयपुर तथा बूंदी शैली के समन्वय जैसी होती है।
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पृष्ठभूमि: चित्रों की पृष्ठभूमि में पहाड़ियों, महलों, और हरियाली से भरे पेड़ों का अंकन मिलता है, जो हाड़ौती (बूंदी-कोटा) शैली के प्रभाव को दर्शाता है।
4. प्रमुख चित्रकार (Key Painters)
उनियारा शैली के प्रमुख चित्रकारों में निम्नलिखित नाम शामिल हैं:
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धीरा
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मीर बक्श
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काशी
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राम लखन
5. प्रमुख चित्र एवं कलाकृतियाँ (Key Artworks)
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‘रामायण’ और ‘भागवत पुराण’ पर आधारित चित्रित सेट
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‘रसिकप्रिया’ और ‘रागमाला’ से संबंधित लघुचित्र (जिन पर जयपुर और बूंदी दोनों शैलियों की झलक मिलती है)