मुख्य बिंदु: बूंदी चित्रकला शैली हाड़ौती शैली की सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन उप-शैलियों में से एक है। इस शैली का विस्तृत और क्रमबद्ध विवरण नीचे दिया गया है: 1. प्रारंभिक काल और विकास (16वीं से 17वीं शताब्दी) 1591 ईस्वी (राव भोज सिंह का काल): बूंदी में चित्रकला की शुरुआत राव भोज सिंह के शासनकाल से मानी जाती […]
बूंदी चित्रकला शैली हाड़ौती शैली की सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन उप-शैलियों में से एक है। इस शैली का विस्तृत और क्रमबद्ध विवरण नीचे दिया गया है:
1. प्रारंभिक काल और विकास (16वीं से 17वीं शताब्दी)
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1591 ईस्वी (राव भोज सिंह का काल): बूंदी में चित्रकला की शुरुआत राव भोज सिंह के शासनकाल से मानी जाती है। इस समय ‘बूंदी रागमाला’ के आरंभिक चित्रों का विकास हुआ, जिन पर मेवाड़ और स्थानीय लोक कला का गहरा प्रभाव था।
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17वीं शताब्दी की शुरुआत: इस काल में प्रकृति, पशु-पक्षियों और मानवीय भावनाओं को बहुत ही बारीकी से दर्शाया जाने लगा।
2. स्वर्ण युग और भित्ति चित्रों का काल (Golden Period & Murals)
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1631 से 1659 ईस्वी (राव छत्रसाल का काल):
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राव छत्रसाल के शासनकाल में बूंदी चित्रकला का तेजी से विकास हुआ और इसे बूंदी शैली का स्वर्ण युग कहा जाता है।
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इस काल में महलों और छतरियों पर भव्य भित्ति चित्रों (Mural paintings) के निर्माण की शुरुआत हुई। बूंदी के गढ़ पैलेस में स्थित प्रसिद्ध ‘चित्रशाला’ (जिसे भित्ति चित्रों का स्वर्ग कहा जाता है) इसी काल की उत्कृष्ट देन है। यहाँ प्राकृतिक दृश्यों, हाथियों की लड़ाई और शिकार के सुंदर दृश्य उकेरे गए हैं।
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3. उत्तर काल और विशेषताएँ
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1750 ईस्वी (राव उम्मेद सिंह का काल):
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राव उम्मेद सिंह के काल में भी कला को बहुत प्रोत्साहन मिला। इस काल के चित्रों में ‘जंगली सुअर का शिकार’ (Boar hunt) और रात के समय की रोशनी (Lighting effects) वाले दृश्य बहुत प्रसिद्ध हैं।
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प्रमुख विशेषताएँ: बूंदी शैली के चित्रों में हरे-भरे पेड़ों (विशेषकर कदली/केले के वृक्ष), आम के बागों, सघन वनस्पतियों, विभिन्न प्रकार के पक्षियों (विशेषकर मोर और बत्तख) तथा सुनहरे आसमान का अत्यधिक सुंदर चित्रण मिलता है।
प्रमुख चित्रकार (Key Painters)
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सुरजन
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अहमद
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रामलाल
प्रमुख चित्र एवं भित्ति श्रेणियाँ
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बूंदी के गढ़ पैलेस की ‘चित्रशाला’ के भित्ति चित्र
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‘जंगली सुअर का शिकार’ करते हुए राव उम्मेद सिंह का चित्र
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‘बूंदी रागमाला’ सेट (आरंभिक और मध्यकालीन चित्र)