प्रामाणिक अध्ययन नोट्स (Reference Archive)

ढूढ़ाड़ चित्रकला शैली

लॉगिन
6 (आज: 0)
शेयर: WA TG FB 𝕏 सुधार सुझाएँ
सत्यापित: 02 October 2026
मुख्य बिंदु: ढूढ़ाड़ चित्रकला शैली (जिसे आमेर या जयपुर शैली भी कहा जाता है) राजस्थान की प्रमुख चित्रकला शैलियों में से एक है। इसके अंतर्गत जयपुर (आमेर), अलवर, उनियारा (टोंक), और शेखावाटी जैसी उप-शैलियाँ आती हैं। ढूढ़ाड़ शैली का पूरा विवरण समय-क्रमानुसार (Timeline) नीचे दिया गया है: 1. प्रारंभिक काल और विकास (16वीं शताब्दी) 16वीं शताब्दी (राजा […]
ढूढ़ाड़ चित्रकला शैली (जिसे आमेर या जयपुर शैली भी कहा जाता है) राजस्थान की प्रमुख चित्रकला शैलियों में से एक है। इसके अंतर्गत जयपुर (आमेर), अलवर, उनियारा (टोंक), और शेखावाटी जैसी उप-शैलियाँ आती हैं। ढूढ़ाड़ शैली का पूरा विवरण समय-क्रमानुसार (Timeline) नीचे दिया गया है:

1. प्रारंभिक काल और विकास (16वीं शताब्दी)

  • 16वीं शताब्दी (राजा मान सिंह प्रथम का काल – आमेर शैली):
    • ढूढ़ाड़ क्षेत्र में चित्रकला की शुरुआत आमेर के कछवाहा शासकों के समय हुई।
    • राजा मान सिंह के काल में ‘रचनामा’ (महाभारत का फारसी अनुवाद) और अन्य ग्रंथों के चित्र तैयार करवाए गए, जिन पर मुग़ल शैली और आमेर की स्थानीय लोक शैली का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
  • मिर्जा राजा जय सिंह और सवाई जय सिंह द्वितीय का काल:
    • 1699 से 1743 ईस्वी: सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा जयपुर शहर की स्थापना (1727 ईस्वी) के बाद, चित्रकला का केंद्र आमेर से बदलकर जयपुर आ गया। इस प्रकार ‘जयपुर शैली’ का वास्तविक रूप से उदय हुआ।

2. स्वर्ण युग / पीक काल (Golden Period)

  • 1778 से 1803 ईस्वी (महाराजा सवाई प्रताप सिंह का काल):
    • यह समय जयपुर (ढूढ़ाड़) चित्रकला का स्वर्णकाल कहलाता है।
    • महाराजा सवाई प्रताप सिंह खुद एक कवि और कलाप्रेमी थे। उनके दरबार में विद्वानों और कलाकारों का एक समूह रहता था जिसे ‘गंधर्व बाईसी’ (22 कलाकारों और विद्वानों की मंडली) कहा जाता था।
    • इस काल के प्रमुख चित्रकार लाल चं (जिन्होंने हवामहल और अन्य जगहों पर काम किया) और सालिग्राम थे। इस शैली के चित्रों में पशुओं की लड़ाई, संगीत सभाओं, कृष्णलीला और रसिकप्रिया के विषयों को बड़े पैमाने पर चित्रित किया गया।

3. उप-शैलियों का विकास (अलवर और उनियारा)

  • 1775 ईस्वी (प्रताप सिंह के काल – अलवर शैली):
    • अलवर रियासत ने जयपुर से अलग होकर एक स्वतंत्र ‘अलवर शैली‘ की नींव रखी।
    • महाराजा विनय सिंह (1815–1857 ईस्वी) के काल को अलवर शैली का स्वर्णकाल कहा जाता है। इस काल के चित्रों में वेश्याओं के चित्र, कामसूत्र के दृश्य और कागजों पर सोने की नक्काशी का बेहतरीन काम देखने को मिलता है। इसके प्रसिद्ध चित्रकार बलदेव और सालम सिंह थे।
  • 18वीं शताब्दी (उनियारा शैली – टोंक):
    • यह जयपुर और बूंदी शैली का मिला-जुला रूप (मिश्रित शैली) थी, जिसके प्रमुख चित्रकार धीरा, मीर बक्श और काशी थे।

4. आधुनिक काल और पतन

  • 1857 ईस्वी (महाराजा राम सिंह द्वितीय का काल):
    • जयपुर के महाराजा राम सिंह द्वितीय ने कला को बढ़ावा देने के लिए 1857 ईस्वी में जयपुर में ‘महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स’ की स्थापना की।
    • इसके बाद पारंपरिक शैली पर यूरोपीय और ब्रिटिश कला का प्रभाव बढ़ने लगा, जिससे पुरानी मौलिक शैलियों का पतन शुरू हो गया।

प्रमुख चित्रकार (Key Painters)

  1. लाल चंद (सवाई प्रताप सिंह के काल के प्रसिद्ध चित्रकार – पशुओं की लड़ाई के चित्र)
  2. सालिग्राम (जयपुर शैली के प्रमुख चित्रकार)
  3. बलदेव और सालम सिंह (अलवर शैली के प्रसिद्ध चित्रकार)
  4. धीरा और मीर बक्श (उनियारा शैली)

प्रमुख चित्र एवं ग्रंथ (Key Paintings / Granth)

  • ‘रचनामा / महाभारत के चित्र’ (आमेर काल के शुरुआती चित्र)
  • ‘गंधर्व बाईसी’ के कलाकारों द्वारा चित्रित ग्रंथ और रागमाला चित्र (जयपुर)
  • ‘गुलिस्तां’ (सादी की रचना) – जिसे अलवर शैली में महाराजा विनय सिंह के समय चित्रित किया गया था।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

नया संदर्भ / संशोधन जोड़ें
इस आलेख पर अभी कोई बाह्य संदर्भ दर्ज नहीं है। यदि आपके पास प्रामाणिक संदर्भ है तो यहाँ क्लिक करके जोड़ें।

विद्यार्थी चर्चा (0)

विद्यार्थी चर्चा में भाग लेने के लिए कृपया लॉगिन करें।