मुख्य बिंदु: मारवाड़ चित्रकला शैली राजस्थान की प्रमुख चित्रकला शैलियों में से एक है। इसके अंतर्गत जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, नागौर, जैसलमेर और सिरोही जैसी उप-शैलियाँ आती हैं। मारवाड़ शैली का पूरा विवरण समय-क्रमानुसार (Timeline) नीचे दिया गया है: 1. प्रारंभिक काल और विकास (15वीं से 16वीं शताब्दी) 1488 ईस्वी (राव बीका का काल): बीकानेर राज्य की स्थापना […]
मारवाड़ चित्रकला शैली राजस्थान की प्रमुख चित्रकला शैलियों में से एक है। इसके अंतर्गत जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, नागौर, जैसलमेर और सिरोही जैसी उप-शैलियाँ आती हैं। मारवाड़ शैली का पूरा विवरण समय-क्रमानुसार (Timeline) नीचे दिया गया है:
1. प्रारंभिक काल और विकास (15वीं से 16वीं शताब्दी)
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1488 ईस्वी (राव बीका का काल): बीकानेर राज्य की स्थापना हुई, जिससे मारवाड़ क्षेत्र की उप-शैलियों के रूप में बीकानेर चित्रकला की नींव पड़ी।
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1532 से 1562 ईस्वी (राव मालदेव का काल):
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इस काल को मारवाड़ (जोधपुर) शैली के स्वतंत्र उदय का काल माना जाता है।
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मेड़ता और जोधपुर के क्षेत्रों में चित्रों का निर्माण शुरू हुआ। जोधपुर के चौखेलाव महल में इस काल के प्रसिद्ध भित्ति चित्र (Mural paintings) मिलते हैं, जिनमें रामायण और लोक कथाओं के दृश्य चित्रित हैं।
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2. मध्यकाल और मुग़ल प्रभाव (17वीं शताब्दी)
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1638 से 1678 ईस्वी (महाराजा जसवंत सिंह प्रथम का काल):
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इस समय जोधपुर शैली पर मुग़ल कला का स्पष्ट प्रभाव देखने को मिला, क्योंकि राजाओं के मुग़लों से घनिष्ठ संबंध थे।
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दरबारी जीवन, शिकार के दृश्यों और आचार-विचार से जुड़े चित्रों की प्रधानता रही।
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1669 से 1698 ईस्वी (महाराजा अनूप सिंह का काल – बीकानेर शैली):
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यह समय बीकानेर चित्रकला का स्वर्णकाल कहलाता है।
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यहाँ के चित्रकारों (विशेषकर उस्ता परिवार) ने सोने की नक्काशी और बारीक रेखाओं वाली कला को विकसित किया, जिसे ‘उस्ता कला’ या ‘मनोती कला’ कहा जाता है। इस काल के प्रसिद्ध चित्रकार अली मुहिब् और रामलाल थे।
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3. स्वर्ण युग / पीक काल (18वीं से 19वीं शताब्दी)
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1735 से 1750 ईस्वी (सावंत सिंह / नागरदास का काल – किशनगढ़ शैली):
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किशनगढ़ शैली मारवाड़ शैली की सबसे प्रसिद्ध और सुंदर उप-शैलियों में से एक है।
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महाराजा सावंत सिंह के समय चित्रकार निहाल चंद ने ‘बनी-ठनी’ (जिसे ‘भारत की मोनालिसा’ भी कहा जाता है) का विश्व-प्रसिद्ध चित्र बनाया। इस शैली में लंबी नाक, खंजन पक्षी जैसी आँखें और ठुड्डी पर तिल विशेष रूप से दर्शाए जाते हैं।
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1803 से 1843 ईस्वी (महाराजा मान सिंह का काल – जोधपुर शैली):
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यह जोधपुर शैली का स्वर्णकाल माना जाता है।
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महाराजा मान सिंह नाथ संप्रदाय के अनुयायी थे, इसलिए इस काल के चित्रों में नाथ संप्रदाय, शिव पुराण, दुर्गा सप्तशती, और ढोला-मारू की प्रेम कथाओं का अत्यधिक चित्रण हुआ। इस काल के प्रमुख चित्रकार अमर दास भाटी और शैव दास थे।
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4. पतन का काल (Downfall)
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19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से: ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभाव, आर्थिक बदलावों और संरक्षण के अभाव में पारंपरिक मारवाड़ चित्रकला की मौलिकता कम होने लगी। राजाओं के व्यक्तिगत चित्र (पोर्ट्रेट) और फोटोग्राफी का चलन बढ़ने से पारंपरिक शैलियों का पतन शुरू हो गया।
प्रमुख चित्रकार (Key Painters)
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निहाल चंद (किशनगढ़ शैली – ‘बनी-ठनी’ के रचयिता)
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अमर दास भाटी (जोधपुर शैली – महाराजा मान सिंह के काल के प्रमुख चित्रकार)
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अली मुहिब् और रामलाल (बीकानेर शैली – उस्ता कला से जुड़े चित्रकार)
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धाना, भाणा और छज्जू (जोधपुर शैली के प्रसिद्ध चित्रकार)
प्रमुख चित्र एवं ग्रंथ (Key Paintings)
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चौखेलाव महल के भित्ति चित्र (राव मालदेव के काल के, जोधपुर)
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‘बनी-ठनी’ (नागरी दास की प्रेमिका का चित्र) – निहाल चंद द्वारा रचित (किशनगढ़)
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‘ढोला-मारू’ के प्रेम चित्र (मारवाड़ के विभिन्न रूपों में चित्रित)
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‘पंचतंत्र’ और ‘भागवत पुराण’ पर आधारित चित्र (बीकानेर और जोधपुर शैली में)