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मेवाड़ चित्रकला शैली

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सत्यापित: 02 October 2026
मुख्य बिंदु: मेवाड़ शैली को राजस्थान की चित्रकला की मूल शैली (या जननी) माना जाता है। यहाँ इसका पूरा विवरण समय-क्रमानुसार (Timeline) दिया गया है: 1. प्रारंभिक काल और विकास (10वीं से 15वीं शताब्दी) 1060 ईस्वी (राजा सामंत सिंह का काल): राजस्थान का सबसे प्राचीन चित्रित ग्रंथ ‘ओघ न्युक्ति वृत्ति’ (या दशवैकालिक सूत्र चूर्णी) माना जाता है, […]
मेवाड़ शैली को राजस्थान की चित्रकला की मूल शैली (या जननी) माना जाता है। यहाँ इसका पूरा विवरण समय-क्रमानुसार (Timeline) दिया गया है:

1. प्रारंभिक काल और विकास (10वीं से 15वीं शताब्दी)

  • 1060 ईस्वी (राजा सामंत सिंह का काल): राजस्थान का सबसे प्राचीन चित्रित ग्रंथ ‘ओघ न्युक्ति वृत्ति’ (या दशवैकालिक सूत्र चूर्णी) माना जाता है, जो मेवाड़ भंडार से संबंधित है।
  • 1260 ईस्वी (महाराणा तेज सिंह का काल): आहड़ (उदयपुर) में ‘श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी’ ग्रंथ ताम्रपत्र पर चित्रित किया गया। इसके मुख्य चित्रकार कमल चंद्र थे। यह मेवाड़ शैली का पहला सुव्यवस्थित चित्रित ग्रंथ है।
  • 1423 ईस्वी (महाराणा मोकल का काल): डेलवाड़ा में ‘सुपार्श्वनाथ चरित्र’ नामक ग्रंथ चित्रित किया गया। इसके चित्रकार धरानन्द थे।
  • 15वीं शताब्दी (महाराणा कुंभा का काल): इस समय जैन शैली का प्रभाव कम हुआ और लोकिक (धार्मिक व प्रेम विषयों पर आधारित) चित्रों की शुरुआत हुई। ‘गीत गोविंद’ और ‘रसिकप्रिया’ जैसे ग्रंथों पर आधारित चित्र बनने लगे।

2. मध्यकाल और चावंड शैली (17वीं शताब्दी की शुरुआत)

  • 1605 ईस्वी (महाराणा अमर सिंह प्रथम का काल): चावंड में ‘रागमाला’ का चित्रण हुआ, जिसे चित्रकार निसारदीन (निसारदिन) ने चित्रित किया था। इस शैली में लाल और पीले रंगों का बहुत अधिक प्रयोग हुआ और यह चावंड शैली की प्रमुख विशेषता बनी।

3. स्वर्ण युग / पीक काल (Golden Period)

  • 1628 से 1652 ईस्वी (महाराणा जगत सिंह प्रथम का काल):
    • यह समय मेवाड़ चित्रकला का स्वर्णकाल कहलाता है।
    • महाराणा जगत सिंह ने राजमहल में एक चित्रशाला बनवाई थी, जिसे “चितरों की ओवरी” या “तस्वीरों का कारखानो” कहा जाता था।
    • इस काल के प्रमुख चित्रकार साहिबदीन और मनोहर थे।
    • साहिबदीन ने ‘भागवत पुराण’, ‘रामायण’, और ‘रागमाला’ के अत्यंत सुंदर और भव्य चित्र बनाए।

4. उत्तर काल और उप-शैलियाँ

  • 1652 से 1680 ईस्वी (महाराणा राज सिंह का काल): इस दौरान नाथद्वारा में श्रीनाथजी की मूर्ति स्थापित होने के बाद ‘नाथद्वारा शैली‘ का विकास हुआ, जहाँ कपड़े पर भगवान कृष्ण के पीछे लगाए जाने वाले पर्दों पर चित्रकारी (जिसे ‘पिछवाई कला’ कहते हैं) का अत्यधिक विकास हुआ।
  • 1680 ईस्वी (द्वारिकादास चूंडावत का काल): देवगढ़ ठिकाने पर ‘देवगढ़ शैली‘ का आरंभ हुआ, जो मेवाड़, मारवाड़ और ढूंढाड़ (जयपुर) शैलियों का मिला-जुला रूप थी। इसके प्रमुख चित्रकार चौखा, बक्ता और कमल थे।

5. पतन का काल (Downfall)

  • 18वीं शताब्दी के अंत से 19वीं शताब्दी तक: मराठों के आक्रमण, आर्थिक संकट और आपसी राजनीतिक संघर्षों के कारण मेवाड़ चित्रकला का स्तर नीचे गिरने लगा। चित्रों में मौलिकता समाप्त होने लगी और ब्रिटिश प्रभाव के कारण राजाओं के व्यक्तिगत चित्रों (पोर्ट्रेट) का चलन बढ़ गया, जिससे पारंपरिक चित्रकला का पतन शुरू हो गया।

प्रमुख चित्रकार (Key Painters)

  1. कमल चंद्र (1260 ईस्वी – ‘श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी’ के चित्रकार)
  2. धरानन्द (1423 ईस्वी – ‘सुपार्श्वनाथ चरित्र’)
  3. निसारदीन (1605 ईस्वी – ‘रागमाला’, चावंड)
  4. साहिबदीन (जगत सिंह प्रथम के काल के सर्वोच्च चित्रकार – ‘भागवत पुराण’, ‘रामायण’)
  5. मनोहर (जगत सिंह प्रथम के काल के प्रसिद्ध चित्रकार)

प्रमुख चित्र एवं ग्रंथ (Key Paintings / Granth)

  • ‘ओघ न्युक्ति वृत्ति / दशवैकालिक सूत्र चूर्णी’ (1060 ईस्वी)
  • ‘श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी’ (1260 ईस्वी, आहड़)
  • ‘सुपार्श्वनाथ चरित्र’ (1423 ईस्वी, डेलवाड़ा)
  • ‘रागमाला’ (1605 ईस्वी, चावंड – निसारदीन द्वारा)
  • ‘भागवत पुराण’ और ‘रामायण’ के चित्र (साहिबदीन द्वारा रचित)

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