मुख्य बिंदु: यहाँ संत रामचरण जी और उनके द्वारा स्थापित रामस्नेही संप्रदाय का विस्तृत विवरण दिया गया है: 1. जीवन परिचय एवं जन्म जन्म: संवत 1776 (ईस्वी सन 1919) की वैशाख शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था। जन्म स्थान: सोडा ग्राम (वर्तमान टोंक जिला, राजस्थान)। माता-पिता: इनके पिता का नाम रामसिंह और माता का नाम देवू था। इनका […]
यहाँ संत रामचरण जी और उनके द्वारा स्थापित रामस्नेही संप्रदाय का विस्तृत विवरण दिया गया है:
1. जीवन परिचय एवं जन्म
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जन्म: संवत 1776 (ईस्वी सन 1919) की वैशाख शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था।
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जन्म स्थान: सोडा ग्राम (वर्तमान टोंक जिला, राजस्थान)।
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माता-पिता: इनके पिता का नाम रामसिंह और माता का नाम देवू था। इनका बचपन का नाम रामकृष्ण था।
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प्रारंभिक जीवन: वे बाल्यावस्था से ही अत्यंत शांत, परोपकारी और ईश्वर-भक्ति में लीन रहने वाले स्वभाव के थे।
2. रामस्नेही संप्रदाय की स्थापना
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संत रामचरण जी ने समाज में व्याप्त धार्मिक पाखंडों, जाति-पाती के भेदभाव, ऊंच-नीच और बाहरी आडंबरों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने ईश्वरीय भक्ति का एक सरल और शुद्ध मार्ग दिखाने के लिए ‘रामस्नेही संप्रदाय’ की स्थापना की थी।
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प्रधान पीठ: इस संप्रदाय की मुख्य पीठ (प्रधान पीठ) शाहपुरा (भीलवाड़ा) में स्थित है, जहाँ वे अपने जीवन के अंतिम वर्षों में रहे और उपदेश दिए।
3. रामस्नेही संप्रदाय के मुख्य नियम और विशेषताएँ
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निर्गुण राम की उपासना: रामस्नेही संप्रदाय में किसी मूर्ति की पूजा नहीं की जाती है। यहाँ ‘राम’ शब्द किसी राजा दशरथ के पुत्र का नाम न होकर कण-कण में व्याप्त निराकार, अजर-अमर परब्रह्म (निर्गुण राम) का प्रतीक है।
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गुरु महिमा और संयम: इस संप्रदाय के साधु और अनुयायी गुलाबी या लाल रंग के वस्त्र पहनते हैं (जो वैराग्य और प्रेम का प्रतीक है), सादा जीवन जीते हैं, और पूरी तरह से नशा मुक्त व शाकाहारी होते हैं।
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भूलकर भी हिंसा न करना: यह संप्रदाय जीव-दया और अहिंसा पर अत्यधिक बल देता है।
4. संप्रदाय की अन्य प्रमुख पीठें (शाखाएँ)
रामस्नेही संप्रदाय की राजस्थान में चार प्रमुख पीठें हैं, जिनके संस्थापक संत निम्नलिखित हैं:
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शाहपुरा (भीलवाड़ा): मुख्य पीठ (संत रामचरण जी)
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रेण (मेड़ता, नागौर): संत दरियाव जी
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सिंहथल (बीकानेर): संत हरिदास जी
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खेड़ा (बांसवाड़ा): संत रामदास जी
5. प्रमुख रचनाएँ एवं साहित्य
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संत रामचरण जी उच्च कोटि के संत-कवि थे। उन्होंने अपने उपदेशों, भजनों और आध्यात्मिक विचारों को ‘अवाणी’ नामक ग्रंथ में संकलित किया है।
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उनके इस महान ग्रंथ में कुल वाणी के हजारों पद दर्ज हैं, जो आज भी समाज को नैतिकता, प्रेम और भक्ति का संदेश देते हैं।