प्रामाणिक अध्ययन नोट्स (Reference Archive)

विग्रहराज तृतीय

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सत्यापित: 01 September 2026
मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 11वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के शासकों में विग्रहराज तृतीय (जिन्हें साहित्यिक परंपरा में ‘बीसलदेव’ भी कहा गया है) का स्थान मालवा के परमारों के साथ रणनीतिक संधि और गुजरात के चालुक्यों के विरुद्ध सफल सैन्य प्रतिरोध के लिए प्रसिद्ध है। […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 11वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के शासकों में विग्रहराज तृतीय (जिन्हें साहित्यिक परंपरा में ‘बीसलदेव’ भी कहा गया है) का स्थान मालवा के परमारों के साथ रणनीतिक संधि और गुजरात के चालुक्यों के विरुद्ध सफल सैन्य प्रतिरोध के लिए प्रसिद्ध है।
  • समय काल: लगभग 11वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध (अनुमानित 1070–1090 ईस्वी)।
  • वंशावलीगत स्थिति:
    • बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) और महाकवि जयानक कृत पृथ्वीराज विजय के अनुसार, ये चामुण्डराज के पुत्र तथा दुर्लभराज तृतीय (दुआला) के छोटे भाई व उत्तराधिकारी थे।
    • विग्रहराज तृतीय के उपरांत इनके प्रतापी पुत्र पृथ्वीराज प्रथम गद्दी पर बैठे।
  • मालवा के परमार शासक उदयादित्य की सहायता एवं ‘सारंग’ अश्व प्रसंग:
    • मालवा के परमार राजा भोज की मृत्यु के बाद गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) शासक कर्णदेव प्रथम ने मालवा को रौंद डाला था।
    • परमार वंश के उदयादित्य ने अपने राज्य के पुनरुद्धार हेतु विग्रहराज तृतीय से सहायता माँगी।
    • विग्रहराज तृतीय ने अपने भाई दुर्लभराज तृतीय की मृत्यु का प्रतिशोध लेने हेतु उदयादित्य को एक विशाल सैन्य दल और ‘सारंग’ (Sarang) नामक एक अत्यंत तीव्रगामी एवं चमत्कारी घोड़ा भेंट किया।
    • विग्रहराज तृतीय और उदयादित्य की संयुक्त सेना ने चालुक्य कर्णदेव को बुरी तरह पराजित कर मालवा की स्वाधीनता पुनर्स्थापित की।
  • गुजरात के चालुक्यों से प्रतिशोध:
    • इस संयुक्त विजय के माध्यम से विग्रहराज तृतीय ने अपने बड़े भाई दुर्लभराज तृतीय (‘दुआला’) के वध का ऐतिहासिक प्रतिशोध पूर्ण किया।
  • वैवाहिक संबंध:
    • इन्होंने मालवा के परमार राजघराने की राजकुमारी राजदेवी (राजमती) से विवाह कर चौहान-परमार मैत्री को स्थायी आधार प्रदान किया।
विशेष नोट (परीक्षा भ्रम निवारण — चौहान वंश के चार विग्रहराज):
  • विग्रहराज प्रथम: 8वीं सदी (जयराज के पुत्र)।
  • विग्रहराज द्वितीय: 10वीं सदी (973 ई. की हर्षनाथ प्रशस्ति, मूलराज प्रथम को हराया, भड़ौच में आशापुरा मंदिर)।
  • विग्रहराज तृतीय (बीसलदेव): 11वीं सदी (परमार उदयादित्य की सहायता, ‘सारंग’ घोड़ा भेंट, चालुक्य कर्ण की पराजय)।
  • विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव): 12वीं सदी (1153–1163 ई. — ‘कविबांधव’, हरिकेली नाटक, संस्कृत पाठशाला / ढाई दिन का झोंपड़ा, अजमेर का स्वर्णकाल)।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
विग्रहराज तृतीय, उदयादित्य की सहायता और चालुक्य विजय के प्रामाणिक साक्ष्य निम्नलिखित स्रोतों में प्राप्त होते हैं:
स्रोत / ग्रंथ रचनाकार / रचयिता भाषा / विधा मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण
पृथ्वीराज विजय जयानक भट्ट (कश्मीरी महाकवि) संस्कृत (महाकाव्य) सर्वप्रमुख स्रोत। विग्रहराज तृतीय द्वारा उदयादित्य को ‘सारंग’ अश्व देने, चालुक्य कर्ण को हराने और भाई की मृत्यु का बदला लेने का विशद काव्यात्मक वर्णन।
बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव) संस्कृत (शिलालेख) दुर्लभराज तृतीय के बाद विग्रहराज तृतीय और उनके पुत्र पृथ्वीराज प्रथम की क्रमिक वंशावलीय पुष्टि।
नागपुर प्रशस्ति (1104 ई.) एवं उदयपुर प्रशस्ति परमार दरबारी कवि संस्कृत (शिलालेख) मालवा के परमार उदयादित्य द्वारा चालुक्य कर्ण रूपी समुद्र में डूबती मालवा भूमि के उद्धार में चाहमान सहायता का उल्लेख।
हम्मीर महाकाव्य नयनचंद्र सूरि संस्कृत (महाकाव्य) 11वीं सदी के चौहान-परमार गठबंधन और शौर्य परंपरा का निरूपण।
अर्ली चौहान डायनेस्टीज डॉ. दशरथ शर्मा शोध ग्रंथ (इतिहास) राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; विग्रहराज तृतीय के कालक्रम, ‘सारंग’ अश्व प्रसंग और अंतर्राज्यीय राजनीति का शोधपरक विश्लेषण।
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
  • चौहान-परमार ऐतिहासिक मैत्री: वीर्यराम के काल में परमार भोज से हुए कटु संघर्ष को समाप्त कर विग्रहराज तृतीय ने उदयादित्य के साथ स्थायी सैन्य व वैवाहिक गठबंधन बनाया।
  • चालुक्य प्रभुत्व पर अंकुश: गुजरात के चालुक्य नरेश कर्णदेव को पराजित कर विग्रहराज तृतीय ने पश्चिमी भारत में चौहानों के रणनीतिक प्रभुत्व को पुनः सर्वोच्च स्तर पर पहुँचाया।
  • संक्रमणकालीन सुदृढ़ता: इनके सुदृढ़ शासन का ही परिणाम था कि इनके पुत्र पृथ्वीराज प्रथम ने ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ जैसी सार्वभौम उपाधियाँ धारण कीं।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
  • मालवा के परमार शासक उदयादित्य को ‘सारंग’ घोड़ा भेंट कर चालुक्य कर्ण के विरुद्ध सहायता देने वाले चौहान नरेश: विग्रहराज तृतीय।
  • अपने भाई दुर्लभराज तृतीय (दुआला) के वध का बदला लेने वाले: विग्रहराज तृतीय।
  • पिता: चामुण्डराज | पुत्र एवं उत्तराधिकारी: पृथ्वीराज प्रथम।
  • प्राथमिक साहित्यिक स्रोत: पृथ्वीराज विजय (जयानक)।
  • वंशावली क्रम: चामुण्डराज ➔ दुर्लभराज तृतीय ➔ विग्रहराज तृतीय ➔ पृथ्वीराज प्रथम ➔ अजयराज द्वितीय।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

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