प्रामाणिक अध्ययन नोट्स (Reference Archive)

विग्रहराज द्वितीय

लॉगिन
2 (आज: 0)
शेयर: WA TG FB 𝕏 सुधार सुझाएँ
सत्यापित: 01 September 2026
मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 10वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के शासकों में विग्रहराज द्वितीय (शासनकाल: लगभग 971–998 ईस्वी) का स्थान सर्वाधिक प्रतापी और दिग्विजयी नरेशों में गिना जाता है। इनके समय चौहान साम्राज्य का प्रभाव उत्तर भारत से लेकर पश्चिमी भारत (गुजरात) तक विस्तृत हुआ। […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 10वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के शासकों में विग्रहराज द्वितीय (शासनकाल: लगभग 971–998 ईस्वी) का स्थान सर्वाधिक प्रतापी और दिग्विजयी नरेशों में गिना जाता है। इनके समय चौहान साम्राज्य का प्रभाव उत्तर भारत से लेकर पश्चिमी भारत (गुजरात) तक विस्तृत हुआ।
  • समय काल: लगभग 971–998 ईस्वी (10वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध)।
  • वंशावलीगत स्थिति:
    • हर्षनाथ प्रशस्ति (973 ई.) एवं बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) के अनुसार, ये महाराजाधिराज सिंहराज के ज्येष्ठ पुत्र एवं उत्तराधिकारी थे।
    • इनके छोटे भाई दुर्लभराज द्वितीय (उपाधि: दुर्लंघ्यमेरु) इनके उपरांत शासक बने।
  • गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) शासक मूलराज प्रथम पर विजय:
    • अणहिलपाटन (गुजरात) के चालुक्य वंश के संस्थापक मूलराज प्रथम के विरुद्ध विग्रहराज द्वितीय ने एक विशाल सैन्य अभियान का नेतृत्व किया।
    • विग्रहराज द्वितीय की शक्तिशाली सेना के सम्मुख मूलराज प्रथम युद्धभूमि छोड़कर भाग गया और उसने कच्छ के कंथकोट दुर्ग में शरण ली।
    • विग्रहराज द्वितीय ने लाट (दक्षिणी गुजरात) प्रदेश के शासक बारप (द्वारप) की सहायता से चालुक्य सेना को पूर्णतः परास्त किया तथा गुजरात से भारी कर (दंड) वसूल किया।
  • भड़ौच (भृगुकच्छ, गुजरात) में आशापुरा माता मंदिर का निर्माण:
    • अपनी गुजरात विजय के उपलक्ष्य में विग्रहराज द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर स्थित भड़ौच (गुजरात) में अपनी कुलदेवी आशापुरा माता के एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।
    • यह घटना इस बात का पुरातात्विक व ऐतिहासिक साक्ष्य है कि 10वीं शताब्दी में चौहानों का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव राजस्थान से बाहर गुजरात के तटीय क्षेत्रों तक स्थापित हो चुका था।
  • हर्षनाथ प्रशस्ति का उत्कीर्णन (973 ईस्वी):
    • विग्रहराज द्वितीय के शासनकाल में 973 ईस्वी (वि.सं. 1030) में सीकर स्थित हर्षनाथ मंदिर के परिसर में प्रसिद्ध ‘हर्षनाथ प्रशस्ति’ उत्कीर्ण करवाई गई।
    • यह प्रशस्ति चौहानों के प्रारंभिक इतिहास और वंशावली को जानने का सबसे प्रामाणिक एवं विस्तृत पुरालेखीय स्रोत है।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
विग्रहराज द्वितीय के सैन्य अभियानों, मंदिर निर्माण और प्रशस्ति से संबंधित प्रमुख स्रोत:
स्रोत / ग्रंथ रचनाकार / रचयिता भाषा / विधा मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण
हर्षनाथ प्रशस्ति (973 ई.) कवि धीर (उत्कीर्णक: सूत्रधार रोय) संस्कृत पद्य (शिलालेख) सर्वप्रमुख स्रोत। विग्रहराज द्वितीय के काल में उत्कीर्ण। इसमें गूवक प्रथम से लेकर विग्रहराज द्वितीय तक की वंशावली, हर्षनाथ मंदिर निर्माण (मठाधीश अल्लट) तथा गाँव अनुदान का विशद विवरण है।
पृथ्वीराज विजय जयानक भट्ट (कश्मीरी महाकवि) संस्कृत (महाकाव्य) विग्रहराज द्वितीय द्वारा चालुक्य मूलराज प्रथम को पराजित करने, मूलराज के कंथकोट भागने और भड़ौच में आशापुरा माता मंदिर बनवाने का स्पष्ट काव्यात्मक वर्णन।
प्रबंध चिंतामणि आचार्य मेरुतुंग संस्कृत (प्रबंध साहित्य) गुजरात के चालुक्य नरेश मूलराज प्रथम और सपादलक्ष के चौहान राजा के मध्य हुए भीषण युद्ध और संधि का विवरण।
बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव) संस्कृत (शिलालेख) सिंहराज के बाद विग्रहराज द्वितीय और उनके भाई दुर्लभराज द्वितीय की वंशावली की पुष्टि।
अर्ली चौहान डायनेस्टीज डॉ. दशरथ शर्मा शोध ग्रंथ (इतिहास) राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; विग्रहराज द्वितीय के गुजरात अभियान, लाट विजय और साम्राज्य विस्तार का प्रामाणिक ऐतिहासिक विश्लेषण।
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
  • साम्राज्य विस्तार एवं त्रि-शक्तियों का संतुलन: विग्रहराज द्वितीय ने उत्तर में तोमरों पर नियंत्रण बनाए रखने के साथ-साथ दक्षिण-पश्चिम में गुजरात के चालुक्यों को पराजित कर सपादलक्ष को समकालीन भारत की एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया।
  • शाक्त परंपरा का अंतर्राज्यीय विस्तार: राजस्थान के कुलदेवी मंदिरों (सांभर व नाडोल) के अतिरिक्त गुजरात के भड़ौच में आशापुरा माता का मंदिर स्थापित कर इन्होंने शाक्त उपासना को सुदूर क्षेत्रों तक प्रसारित किया।
  • पाशुपत शैव मत को चरमोत्कर्ष: हर्षनाथ (सीकर) मंदिर के शैव आचार्य अल्लट और उनके शिष्य भावतेज को विग्रहराज द्वितीय ने विपुल भूमि, स्वर्ण व गाँव दान दिए, जिससे हर्षगिरि उत्तर भारत का प्रमुख शैव तीर्थ बना।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
  • गुजरात के चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को पराजित करने वाले चौहान शासक: विग्रहराज द्वितीय।
  • मूलराज प्रथम भागकर किस दुर्ग में छिपा था: कंथकोट दुर्ग (कच्छ)।
  • भड़ौच (गुजरात) में आशापुरा माता मंदिर के निर्माता: विग्रहराज द्वितीय।
  • हर्षनाथ प्रशस्ति (973 ई. / वि.सं. 1030) के समय शासक: विग्रहराज द्वितीय | रचयिता: कवि धीर।
  • पिता: सिंहराज | उत्तराधिकारी / भाई: दुर्लभराज द्वितीय (दुर्लंघ्यमेरु)।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

नया संदर्भ / संशोधन जोड़ें
इस आलेख पर अभी कोई बाह्य संदर्भ दर्ज नहीं है। यदि आपके पास प्रामाणिक संदर्भ है तो यहाँ क्लिक करके जोड़ें।

विद्यार्थी चर्चा (0)

विद्यार्थी चर्चा में भाग लेने के लिए कृपया लॉगिन करें।