मुख्य बिंदु: ऋषि पंचमी (भाई पंचमी / माहेश्वरी समाज का रक्षाबंधन) 1. कब और कहाँ तिथि: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि (गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन)। समय: अगस्त–सितंबर। प्रमुख क्षेत्र: संपूर्ण भारत (विशेष रूप से राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश)। प्रमुख मेला स्थल (राजस्थान): भोजन थाली मेला — कामां (Bharatpur)। […]
ऋषि पंचमी (भाई पंचमी / माहेश्वरी समाज का रक्षाबंधन)
1. कब और कहाँ
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तिथि: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि (गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन)।
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समय: अगस्त–सितंबर।
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प्रमुख क्षेत्र: संपूर्ण भारत (विशेष रूप से राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश)।
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प्रमुख मेला स्थल (राजस्थान): भोजन थाली मेला — कामां (Bharatpur)।
2. पौराणिक पृष्ठभूमि एवं धार्मिक महत्व
(क) सप्तऋषि पूजन एवं रजस्वला दोष निवारण:
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यह व्रत किसी देवी या देवता की आराधना के लिए नहीं, बल्कि वेदों के रचयिता और मानव सभ्यता के मार्गदर्शक सप्तऋषियों (कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ) तथा माता अरुंधती के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए रखा जाता है।
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शास्त्रों के अनुसार, महिलाओं से अनजाने में मासिक धर्म (रजस्वला अवस्था) के दौरान हुए स्पर्श व शुचिता संबंधी दोषों के प्रायश्चित और आत्मशुद्धि के लिए यह व्रत अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।
(ख) माहेश्वरी समाज में रक्षाबंधन (उत्पत्ति कथा):
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माहेश्वरी समाज के लोग श्रावण पूर्णिमा के स्थान पर ऋषि पंचमी को अपना रक्षाबंधन पर्व मनाते हैं।
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पौराणिक संदर्भ:
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माहेश्वरी समाज का उद्भव क्षत्रिय (चौहान/सोलंकी आदि) राजा सुजान कंवर और उनके 72 उमरावों (सैनिकों) से माना जाता है।
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एक बार शिकार के दौरान ऋषियों के यज्ञ में विघ्न डालने के कारण ऋषियों के शाप से राजा और उनके सैनिक पत्थर बन गए थे।
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बाद में भगवान महेश (शिव) और माता पार्वती की अनुकंपा तथा ऋषियों की कृपा से भाद्रपद शुक्ल पंचमी के दिन उन्हें पुनर्जीवन प्राप्त हुआ। भगवान शिव ने उन्हें हिंसा छोड़कर व्यापार (वैश्य धर्म) अपनाने का उपदेश दिया।
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नया जीवन और गोत्र ऋषियों के आशीर्वाद से मिलने के कारण इस दिन माहेश्वरी समाज में पुराना यज्ञोपवीत बदलकर नया जनेऊ धारण किया जाता है और बहनें भाइयों को राखी बांधती हैं।
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3. प्रमुख परंपराएँ एवं रीति-रिवाज
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अपामार्ग (चिरचिटा) दातुन एवं स्नान: इस दिन महिलाएं नदी, तालाब या घर पर पवित्र जल से स्नान करती हैं। स्नान से पूर्व ‘अपामार्ग’ (ओंगा/लटजीरा) की टहनी से 108 या 36 बार दातुन करने की अनूठी परंपरा है, जो कायिक शुद्धि का प्रतीक है।
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हस्त-निर्मित अन्न का सेवन (पसही/सांवा चावल): हल से जोते गए अनाज का पूर्ण त्याग किया जाता है। महिलाएं केवल जमीन में प्राकृतिक रूप से उगने वाले तिन्नी/पसही के चावल, सांवा और कंदमूल का ही एक समय आहार ग्रहण करती हैं।
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गंगा स्नान: हरिद्वार, पुष्कर, प्रयागराज और सोरों आदि तीर्थों पर इस दिन श्रद्धालु विशेष स्नान करते हैं।
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कामां का भोजन थाली मेला (भरतपुर): कामां (डीग/भरतपुर क्षेत्र) में ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा के तहत ऋषि पंचमी को ‘भोजन थाली मेला’ भरता है। मान्यता है कि यहाँ श्रीकृष्ण और उनके ग्वाल-बालों ने बैठकर एक साथ भोजन किया था।
4. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)
| बिंदु | विवरण |
| सीधा पंचांग प्रश्न | “ऋषि पंचमी का पर्व किस तिथि को मनाया जाता है?” — भाद्रपद शुक्ल पंचमी। |
| समाज विशेष का रक्षाबंधन | राजस्थान का कौन-सा समाज ऋषि पंचमी को रक्षाबंधन मनाता है? — माहेश्वरी समाज। |
| भोजन थाली मेला कहाँ भरता है? | कामां (भरतपुर / डीग) — तिथि: भाद्रपद शुक्ल पंचमी। |
| पूजे जाने वाले सप्तऋषि | कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ (तथा वशिष्ठ पत्नी अरुंधती)। |
| विशिष्ट वनस्पति जुड़ाव | शुद्धि स्नान हेतु प्रयुक्त पौधा: अपामार्ग (चिरचिटा / आंधीझाड़ा)। |
| जनेऊ परिवर्तन (उपाकर्म) | जहाँ अधिकांश द्विज श्रावण पूर्णिमा को श्रावणी उपाकर्म करते हैं, वहीं माहेश्वरी समाज में जनेऊ परिवर्तन ऋषि पंचमी को होता है। |