मुख्य बिंदु: कजली तीज / बड़ी तीज / सातुड़ी तीज / बूढ़ी तीज (बूंदी का कजली तीज मेला) 1. कब और कहाँ तिथि: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि (श्रावण पूर्णिमा/रक्षाबंधन के ठीक 3 दिन बाद)। समय: अगस्त या सितंबर। प्रमुख क्षेत्र: संपूर्ण राजस्थान (विशेष रूप से हाड़ौती क्षेत्र), मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश। प्रसिद्ध […]
कजली तीज / बड़ी तीज / सातुड़ी तीज / बूढ़ी तीज (बूंदी का कजली तीज मेला)
1. कब और कहाँ
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तिथि: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि (श्रावण पूर्णिमा/रक्षाबंधन के ठीक 3 दिन बाद)।
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समय: अगस्त या सितंबर।
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प्रमुख क्षेत्र: संपूर्ण राजस्थान (विशेष रूप से हाड़ौती क्षेत्र), मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश।
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प्रसिद्ध मेला स्थल: बूंदी (Bundi, Rajasthan) — बूंदी की कजली तीज की सवारी और मेला पूरे भारत में अद्वितीय है।
2. नामकरण और इसके पीछे का कारण
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कजली तीज: वर्षा ऋतु में आकाश में घने काले-कजरारे (काजल जैसे) बादलों के छाए रहने के कारण इसे ‘कजली तीज’ कहा जाता है।
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सातूड़ी तीज: इस दिन महिलाएं उपवास रखती हैं और शाम को चंद्रोदय के बाद ‘सातू’ (सत्तू—जौ, गेहूं, चने और चावल के भुने आटे में घी, चीनी व मेवे मिलाकर बने लड्डू) का भोग लगाकर व्रत खोलती हैं (सातू पाशना)।
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बड़ी तीज / बूढ़ी तीज: श्रावण शुक्ल तृतीया को ‘छोटी तीज’ कहा जाता है, इसलिए इसके 15 दिन बाद आने वाली इस तृतीया को आदर व विस्तार के रूप में ‘बड़ी तीज’ या ‘बूढ़ी तीज’ कहा जाता है।
3. बूंदी के कजली तीज मेले का इतिहास
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राजा राव छत्रसाल (17वीं शताब्दी): ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, बूंदी के राव राजा छत्रसाल (1631–1658 ई.) आमेर (जयपुर) के शासक के साथ युद्ध में गए थे। वहाँ से वे तीज माता की एक अत्यंत सुंदर व भव्य प्रतिमा बूंदी लेकर आए।
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राजसी सवारी की शुरुआत: उसी समय से बूंदी में भाद्रपद कृष्ण तृतीया को नवल सागर झील और तारागढ़ दुर्ग के मार्ग से तीज माता की राजसी सवारी निकालने की परंपरा शुरू हुई।
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15 दिवसीय भव्य मेला: जहाँ जयपुर में तीज केवल 2 दिन (श्रावण शुक्ल तृतीया और चतुर्थी) मनाई जाती है, वहीं बूंदी में तीज माता की सवारी भाद्रपद कृष्ण तृतीया व चतुर्थी को निकलती है और इसके उपलक्ष्य में कुंभा स्टेडियम में लगभग 15 दिनों तक चलने वाला राज्य-स्तरीय औद्योगिक व सांस्कृतिक मेला आयोजित होता है।
4. प्रमुख परंपराएँ एवं रीति-रिवाज
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नीमड़ी पूजन: शाम के समय सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं घर के आंगन में मिट्टी की पाल बांधकर छोटा तालाब बनाती हैं, उसमें नीम की टहनी (नीमड़ी माता) रोपती हैं और दूध, जल, रोली, चावल व सातू से विधिवत पूजा करती हैं।
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चंद्र दर्शन व अर्घ्य: कजली तीज का व्रत रात्रि में चंद्रमा को कच्चे दूध और जल से अर्घ्य देने तथा छलनी से पति व चंद्रमा का दर्शन करने के बाद ही पूरा माना जाता है।
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सातू धमोली: तीज की पूर्व संध्या (द्वितीया तिथि की रात्रि) को परिवार के साथ विशेष भोजन किया जाता है, जिसे स्थानीय बोली में ‘धमोली’ कहते हैं।
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सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ: बूंदी मेले के दौरान हाड़ौती के पारंपरिक लोकनृत्य जैसे चकरी नृत्य (कंजरी जाति द्वारा), गैर, तेरहताली और कजरी गायन का भव्य मंचन होता है।
5. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)
| बिंदु | विवरण |
| सीधा प्रतियोगी प्रश्न | “राजस्थान में कजली तीज की भव्य सवारी और प्रसिद्ध मेला कहाँ आयोजित होता है?” — बूंदी। |
| तिथि संबंधी तुलना (Teej Matrix) |
• छोटी तीज (हरियाली तीज): श्रावण शुक्ल तृतीया → जयपुर प्रसिद्ध
• कजली / बड़ी / सातुड़ी तीज: भाद्रपद कृष्ण तृतीया → बूंदी प्रसिद्ध
• आखा तीज (अक्षय तृतीया): वैशाख शुक्ल तृतीया → बीकानेर का स्थापना दिवस / अबूझ सावा
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| सांस्कृतिक/पर्यटन महत्व | राजस्थान पर्यटन विकास निगम (RTDC) द्वारा बूंदी कजली तीज मेले को अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक कैलेंडर पर विशेष स्थान दिया गया है। |
| प्रमुख लोकनृत्य जुड़ाव | बूंदी तीज उत्सव में कंजर जाति की युवतियों द्वारा किया जाने वाला चकरी नृत्य (Chakri Dance) मुख्य आकर्षण होता है। |
| खान-पान शब्दावली (Culture Vocabulary) | ‘सातू’ (Sattu) और व्रत से पूर्व रात की दावत को ‘धमोली’ (Dhamoli) कहा जाता है। |