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दुधवा खारा किसान आंदोलन

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सत्यापित: 03 September 2026
मुख्य बिंदु: बीकानेर रियासत में किसान आंदोलन दो अलग-अलग भौगोलिक व प्रशासनिक व्यवस्थाओं में लड़े गए—एक ओर गंगनहर क्षेत्र (खालसा भूमि) के सिंचित किसान थे, तो दूसरी ओर जागीरी क्षेत्रों (महाजन, दुधवा खारा, कांगड़ आदि) में सामंती शोषण और बेगार के विरुद्ध संघर्षरत किसान थे। 1. आंदोलन की पृष्ठभूमि व कारण भूमि विभाजन: बीकानेर में अधिकांश उपजाऊ […]
बीकानेर रियासत में किसान आंदोलन दो अलग-अलग भौगोलिक व प्रशासनिक व्यवस्थाओं में लड़े गए—एक ओर गंगनहर क्षेत्र (खालसा भूमि) के सिंचित किसान थे, तो दूसरी ओर जागीरी क्षेत्रों (महाजन, दुधवा खारा, कांगड़ आदि) में सामंती शोषण और बेगार के विरुद्ध संघर्षरत किसान थे।

1. आंदोलन की पृष्ठभूमि व कारण

  • भूमि विभाजन: बीकानेर में अधिकांश उपजाऊ व सामान्य भूमि जागीरदारों (सामंतों) के अधीन थी।
  • गंगनहर क्षेत्र का असंतोष (1927 ई. के बाद): महाराजा गंगासिंह द्वारा 1927 में गंगनहर लाने के बाद किसानों पर अत्यधिक आबियाना (जल कर), खुशहैसियत टैक्स और जमीन की ऊंची नीलामी दरें थोपी गईं। इसके विरोध में जमींदार एसोसिएशन (दरबारा सिंह के नेतृत्व में) बनी।
  • जागीरी शोषण: जागीरी क्षेत्रों में किसानों से 40 से अधिक प्रकार की लाग-बाग, भारी भू-राजस्व और जबरन बेगार ली जाती थी। जागीरदार किसानों को उनकी पुश्तैनी भूमि से मनमाने ढंग से बेदखल कर देते थे।
  • राजनीतिक संस्था: बीकानेर राज्य प्रजा परिषद (संस्थापक: रघुवरदयाल गोयल, 1942) और बीकानेर प्रजामंडल (स्थापना: 1936, कलकत्ता में मघाराम वैद्य द्वारा) ने किसानों की माँगों को राजनीतिक मंच प्रदान किया।

2. महाजन ठिकाना किसान आंदोलन (1938 – 1942 ई.)

  • महत्व: महाजन बीकानेर रियासत का प्रथम श्रेणी का सबसे बड़ा जागीरी ठिकाना था।
  • जागीरदार: महाजन के राजा हरि सिंह।
  • कारण:
    • भीषण अकाल और सूखे के बावजूद किसानों पर लगभग 72 प्रकार की अवैध लाग-बाग थोपी गईं।
    • चराई कर और ऊँट-गाड़ियों पर अतिरिक्त कर वसूला गया।
  • घटनाक्रम:
    • किसानों ने बीकानेर राज्य प्रजा परिषद के सहयोग से कर देने से इनकार कर दिया।
    • ठिकाने ने पुलिस भेजकर किसानों की फसलें और मवेशी जब्त कर लिए।
    • किसानों का एक दल महाराजा गंगासिंह से मिलने बीकानेर पहुँचा, जिसके बाद रियासत ने हस्तक्षेप कर जागीरदार को कुछ लागें कम करने का आदेश दिया।

3. दुधवा खारा किसान आंदोलन (1944 – 1946 ई.)

  • स्थान: दुधवा खारा गाँव (तत्कालीन बीकानेर रियासत की राजगढ़/सादुलपुर तहसील; वर्तमान चूरू जिला)।
  • जागीरदार: दुधवा खारा के ठाकुर सूरजमल सिंह।
  • आंदोलन का मूल कारण:
    • ठाकुर सूरजमल ने किसानों को उनकी पुश्तैनी जमीनों से बेदखल कर दिया और खेतों पर कब्जा कर लिया।
    • किसानों पर भारी मात्रा में अवैध लाग-बाग व लाटा-कुंता थोपा गया।

प्रमुख व्यक्तित्व ও घटनाक्रम:

  1. हनुमान सिंह आर्य (चौधरी हनुमान सिंह):
    • दुधवा खारा आंदोलन के मुख्य सूत्रधार व जुझारू नेता।
    • किसानों की बेदखली के विरोध में इन्होंने महाराजा सार्दुल सिंह से न्याय की गुहार लगाई, किंतु कोई सुनवाई नहीं हुई।
    • ठाकुर सूरजमल ने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया। जेल में अमानवीय यातनाओं और भोजन में मिलावट के विरोध में हनुमान सिंह ने 65 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल की।
    • इन्हें रियासत का सबसे विद्रोही किसान नेता मानकर बार-बार कठोर कारावास में डाला गया।
  2. खेतूबाई (महिला नेतृत्व):
    • परिचय: बीकानेर प्रजामंडल के संस्थापक वैद्य मघाराम की बहन।
    • भूमिका: जब पुरुष नेताओं को जेल में डाल दिया गया, तब खेतूबाई ने दुधवा खारा और आसपास के गाँवों की किसान महिलाओं को संगठित किया। उन्होंने पर्दा-प्रथा तोड़कर सामंती प्रतिबंधों के विरुद्ध रैलियाँ निकालीं और धरने दिए।
  3. वैद्य मघाराम:
    • इन्होंने बीकानेर प्रजामंडल के माध्यम से दुधवा खारा के किसानों के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया और कानूनी सहायता जुटाई।

4. कांगड़ कांड (अक्टूबर 1946 ई.)

  • स्थान: कांगड़ गाँव (रतनगढ़ तहसील, वर्तमान चूरू जिला; तत्कालीन बीकानेर रियासत)।
  • कारण:
    • 1946 में पूरे बीकानेर अंचल में भयंकर सूखा और अकाल पड़ा था।
    • खरीफ की फसल पूरी तरह नष्ट हो चुकी थी। इसके बावजूद कांगड़ के जागीरदार ने किसानों से जबरन पूरा लगान वसूलने का फरमान जारी किया।
  • किसानों का विरोध: किसानों ने कर देने से मना किया और बीकानेर जाकर महाराजा से गुहार लगाने का फैसला किया।
  • अमानवीय अत्याचार (कांगड़ कांड):
    • इससे क्रोधित होकर जागीरदार के सशस्त्र लठैतों ने अक्टूबर 1946 में कांगड़ गाँव पर हमला बोल दिया।
    • 35 से अधिक किसान परिवारों के घरों को लूटा गया, पुरुषों को बेरहमी से पीटा गया और महिलाओं व बच्चों को भी अमानवीय यातनाएँ दी गईं।
  • राष्ट्रीय प्रतिक्रिया:
    • कांगड़ कांड की बर्बरता की सूचना मिलते ही पंडित जवाहरलाल नेहरू और अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद ने इसकी तीव्र भर्त्सना की।
    • प्रजामंडल नेताओं ने मौके पर पहुँचकर घायलों को अस्पताल पहुँचाया और घटना की स्वतंत्र जाँच की मांग की।

5. बीकानेर किसान आंदोलन से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • रायसिंहनगर कांड (30 जून – 1 जुलाई 1946 ई.):
    • रायसिंहनगर (गंगानगर) में प्रजा परिषद के कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने गोलियाँ चलाईं, जिसमें किसान व प्रजामंडल कार्यकर्ता बीरबल सिंह ढालिया शहीद हो गए।
    • बीरबल सिंह के सम्मान में 17 जुलाई 1946 को पूरे बीकानेर राज्य में ‘बीरबल दिवस’ मनाया गया।
  • कुंभाराम आर्य की भूमिका:
    • किसान नेता चौधरी कुंभाराम आर्य ने बीकानेर के किसान आंदोलन को वैचारिक और संगठनात्मक दिशा दी।
    • उन्होंने ‘किसान यूनियन क्यों?’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।

6. परीक्षा उपयोगी सूक्ष्म तथ्य (Quick Revision Table)

प्रमुख बिंदु परीक्षा उपयोगी तथ्य
बीकानेर प्रजामंडल की स्थापना 1936 ई. (कलकत्ता में वैद्य मघाराम और लक्ष्मीनारायण सर्राफ द्वारा)
बीकानेर राज्य प्रजा परिषद 1942 ई. (संस्थापक: रघुवरदयाल गोयल)
दुधवा खारा आंदोलन का केंद्र दुधवा खारा गाँव (राजगढ़, वर्तमान चूरू)
दुधवा खारा के जागीरदार ठाकुर सूरजमल सिंह
दुधवा खारा के प्रमुख नेता हनुमान सिंह आर्य (जेल में 65 दिन भूख हड़ताल)
दुधवा खारा की प्रमुख महिला नेत्री खेतूबाई (वैद्य मघाराम की बहन)
कांगड़ कांड का समय व स्थान अक्टूबर 1946, कांगड़ गाँव (रतनगढ़/चूरू)
कांगड़ कांड का कारण अकाल के बावजूद जागीरदार द्वारा जबरन लगान वसूली व किसानों पर अत्याचार
बीरबल दिवस 17 जुलाई 1946 (रायसिंहनगर कांड के शहीद बीरबल सिंह की स्मृति में)
प्रसिद्ध पुस्तक ‘किसान यूनियन क्यों?’ चौधरी कुंभाराम आर्य द्वारा रचित

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

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