मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के प्रारंभिक वंशावली क्रम में चन्द्रराज द्वितीय 9वीं शताब्दी के मध्य के एक महत्वपूर्ण शासक रहे हैं। समय काल: लगभग 9वीं शताब्दी का मध्य भाग (अनुमानित 836–863 ईस्वी के आसपास)। वंशावलीगत स्थिति: हर्षनाथ प्रशस्ति (973 ई.) तथा बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के प्रारंभिक वंशावली क्रम में चन्द्रराज द्वितीय 9वीं शताब्दी के मध्य के एक महत्वपूर्ण शासक रहे हैं।
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समय काल: लगभग 9वीं शताब्दी का मध्य भाग (अनुमानित 836–863 ईस्वी के आसपास)।
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वंशावलीगत स्थिति:
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हर्षनाथ प्रशस्ति (973 ई.) तथा बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) के अनुसार, ये गूवक प्रथम (गोविंदराज) के पुत्र एवं उत्तराधिकारी थे।
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इनके बाद इनके पुत्र गूवक द्वितीय गद्दी पर बैठे, जिनके उपरांत क्रमशः चंदनराज (रानी रुद्राणी के पति) और वाक्पतिराज प्रथम शासक बने।
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प्रतिहार समकालीनता:
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चन्द्रराज द्वितीय का शासनकाल प्रसिद्ध गुर्जर-प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज प्रथम (836–885 ई.) के समकालीन था।
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इस काल में सपादलक्ष के चौहानों ने अपने आंतरिक प्रशासन को स्थिरता प्रदान की तथा प्रतिहार साम्राज्य के एक महत्वपूर्ण शक्ति-स्तंभ के रूप में अपनी स्थिति को बनाए रखा।
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धार्मिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि:
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अपने पिता गूवक प्रथम द्वारा प्रारंभ किए गए सीकर स्थित हर्षनाथ (महादेव) मंदिर की व्यवस्था और धार्मिक परंपराओं को इन्होंने आगे बढ़ाया।
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विशेष नोट (परीक्षा भ्रम निवारण — चन्द्रराज / चंदनराज):
चन्द्रराज प्रथम: 8वीं सदी (विग्रहराज प्रथम के बाद)। चन्द्रराज द्वितीय: 9वीं सदी (गूवक प्रथम के पुत्र व गूवक द्वितीय के पिता)। चंदनराज (10वीं सदी): गूवक द्वितीय के पुत्र, जिनकी रानी रुद्राणी (आत्मप्रभा) पुष्कर में प्रतिदिन 1,000 दीपक जलाकर भगवान शिव की आराधना करती थीं।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
चन्द्रराज द्वितीय और 9वीं शताब्दी के चाहमान इतिहास के प्रामाणिक संदर्भ निम्नलिखित पुरालेखीय व साहित्यिक स्रोतों में प्राप्त होते हैं:
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| हर्षनाथ प्रशस्ति (973 ई.) | कवि धीर (विग्रहराज द्वितीय के काल की) | संस्कृत (शिलालेख) | सर्वप्रमुख स्रोत। इसमें गूवक प्रथम के पुत्र के रूप में चन्द्रराज द्वितीय और उनके उत्तराधिकारी गूवक द्वितीय का स्पष्ट वंशावलीय उल्लेख है। |
| बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) | गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव) | संस्कृत (शिलालेख) | गूवक प्रथम, चन्द्रराज द्वितीय और गूवक द्वितीय की वंशावली का क्रमिक अभिलेखीय साक्ष्य। |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक भट्ट (कश्मीरी राजकवि) | संस्कृत (महाकाव्य) | चन्द्रराज द्वितीय के शासन, धार्मिक निष्ठा और सपादलक्ष राज्य की वंशावली का काव्यात्मक विवरण। |
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचंद्र सूरि | संस्कृत (महाकाव्य) | प्रारंभिक चाहमान नरेशों के शौर्य एवं सूर्यवंशी कुलपरंपरा का आख्यान। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; 9वीं सदी के चौहान-प्रतिहार संबंधों और चन्द्रराज द्वितीय के कालक्रम का विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
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वंशावलीगत निरंतरता: गूवक प्रथम द्वारा अर्जित ‘वीर’ प्रतिष्ठा और स्वायत्तता को चन्द्रराज द्वितीय ने शांतिपूर्ण प्रशासनिक सुदृढ़ता में बदला।
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सामरिक संतुलन का काल: मिहिर भोज प्रथम के उत्कर्ष काल में उत्तर भारत में प्रतिहार शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर थी; इस दौरान चन्द्रराज द्वितीय ने पश्चिमी सीमांत की रक्षा करते हुए प्रतिहारों के साथ सामंजस्य बनाए रखा।
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शैव मत का संरक्षण: कुलदेवता हर्षनाथ (सीकर) और कुलदेवी शाकंभरी माता के प्रति परंपरागत निष्ठा को अक्षुण्ण रखा गया।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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पिता: गूवक प्रथम | पुत्र: गूवक द्वितीय।
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समकालीन गुर्जर-प्रतिहार सम्राट: मिहिर भोज प्रथम।
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प्राथमिक पुरालेखीय साक्ष्य: हर्षनाथ प्रशस्ति (973 ई.) एवं बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.)।
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वंशावली क्रम: गूवक प्रथम ➔ चन्द्रराज द्वितीय ➔ गूवक द्वितीय ➔ चंदनराज।