मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के प्रारंभिक वंशावली क्रम में चन्द्रराज प्रथम 8वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के एक महत्वपूर्ण शासक रहे हैं। वासुदेव चौहान (551 ई.) द्वारा स्थापित इस राजवंश को आगे बढ़ाने वाले प्रारंभिक शासकों में इनका स्थान उल्लिखित है। समय काल: लगभग 8वीं शताब्दी […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के प्रारंभिक वंशावली क्रम में चन्द्रराज प्रथम 8वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के एक महत्वपूर्ण शासक रहे हैं। वासुदेव चौहान (551 ई.) द्वारा स्थापित इस राजवंश को आगे बढ़ाने वाले प्रारंभिक शासकों में इनका स्थान उल्लिखित है।
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समय काल: लगभग 8वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध (अनुमानित 759–771 ईस्वी के आसपास)।
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वंशावलीगत स्थिति:
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बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) तथा महाकवि जयानक कृत पृथ्वीराज विजय के अनुसार, ये विग्रहराज प्रथम के भाई अथवा उत्तराधिकारी थे (जयराज/अजयराज प्रथम के वंशज)।
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चन्द्रराज प्रथम के उपरांत चौहान वंशावली में क्रमशः गोपेंद्रराज (गोपराज), दुर्लभराज प्रथम और गूवक प्रथम शासक बने।
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सामरिक व राजनीतिक पृष्ठभूमि:
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8वीं सदी के इस कालखंड में उत्तर भारत में त्रिकोणीय संघर्ष (गुर्जर-प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट) की प्रारंभिक पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी।
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चन्द्रराज प्रथम ने सपादलक्ष क्षेत्र की राजनीतिक सीमाओं को सुरक्षित रखा और आंतरिक प्रशासन को स्थिरता प्रदान की।
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विशेष नोट (परीक्षा भ्रम निवारण — चौहान वंश के दो चन्द्रराज):
चन्द्रराज प्रथम: 8वीं सदी के प्रारंभिक शाकंभरी शासक (विग्रहराज प्रथम के बाद)। चन्द्रराज द्वितीय: 9वीं सदी के शासक (गूवक प्रथम के पुत्र तथा गूवक द्वितीय के पिता)। रानी रुद्राणी (आत्मप्रभा) प्रसंग: पुष्कर में 1,000 दीपक जलाकर शिव आराधना करने वाली योगिनी रानी ‘रुद्राणी’ चंदनराज (चन्द्रराज) की पत्नी थीं, जो 10वीं सदी के शासक थे (इनसे भिन्न हैं)।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
चन्द्रराज प्रथम और शाकंभरी के प्रारंभिक चाहमान नरेशों के प्रामाणिक संदर्भ निम्नलिखित अभिलेखीय व साहित्यिक स्रोतों में मिलते हैं:
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) | गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव / गोविंद) | संस्कृत (शिलालेख) | विग्रहराज प्रथम के पश्चात चन्द्रराज प्रथम और गोपेंद्रराज का क्रमिक ऐतिहासिक उल्लेख। |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक भट्ट (कश्मीरी राजकवि) | संस्कृत (महाकाव्य) | चन्द्रराज प्रथम के शासन, उनकी नीतियों और शाकंभरी चौहान वंशावली का विशद काव्यात्मक निरूपण। |
| हर्षनाथ प्रशस्ति (973 ई.) | कवि धीर (विग्रहराज द्वितीय के काल की) | संस्कृत (शिलालेख) | चौहानों की कुलपरंपरा, शिव उपासना तथा प्रारंभिक वंशावली की ऐतिहासिक पुष्टि। |
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचंद्र सूरि | संस्कृत (महाकाव्य) | प्रारंभिक चाहमान राजाओं के शौर्य, सूर्यवंशी परंपरा और वंशावली का आख्यान। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; प्रारंभिक चौहान शासकों (चन्द्रराज प्रथम से गूवक प्रथम तक) का कालक्रम। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
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शाकंभरी राज्य का सुदृढ़ीकरण: सामन्तराज, नरदेव, जयराज और विग्रहराज प्रथम के बाद चन्द्रराज प्रथम ने सपादलक्ष क्षेत्र की आर्थिक और प्रशासनिक नींव को मजबूत किया।
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शैव मत व कुलदेवता आराधना: चौहान शासकों की परंपरागत शिव (हर्षनाथ) और कुलदेवी शाकंभरी माता के प्रति आस्था की निरंतरता इस काल में भी अक्षुण्ण रही।
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गुर्जर-प्रतिहार कालीन समकालीनता: इस काल में राजस्थान में गुर्जर-प्रतिहार शक्ति का विस्तार हो रहा था, जिसके समानांतर चौहान शासक अपने स्थानीय प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर रहे थे।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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विग्रहराज प्रथम के उत्तराधिकारी: चन्द्रराज प्रथम।
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चन्द्रराज प्रथम के बाद शासक बने: गोपेंद्रराज (गोपराज) ➔ दुर्लभराज प्रथम ➔ गूवक प्रथम।
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प्रारंभिक कालानुक्रम: सामन्तराज ➔ नरदेव ➔ जयराज ➔ विग्रहराज प्रथम ➔ चन्द्रराज प्रथम ➔ गोपेंद्रराज।
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प्रमुख अभिलेखीय साक्ष्य: बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.)।