मुख्य बिंदु: जोधपुरा सभ्यता: संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण मानक स्रोतों (आरबीएसई, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और आरपीएससी पाठ्यक्रम) के अनुसार जोधपुरा सभ्यता राजस्थान की प्रमुख लौह युगीन संस्कृतियों में से एक है। जोधपुरा से जुड़ी छोटी-से-छोटी, भौगोलिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक डिटेल्स नीचे बिंदुवार दी जा रही हैं: 1. सामान्य परिचय एवं भौगोलिक स्थिति जिला: कोटपूतली-बहरोड़ (राजस्थान) — […]
जोधपुरा सभ्यता: संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण
मानक स्रोतों (आरबीएसई, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और आरपीएससी पाठ्यक्रम) के अनुसार जोधपुरा सभ्यता राजस्थान की प्रमुख लौह युगीन संस्कृतियों में से एक है।
जोधपुरा से जुड़ी छोटी-से-छोटी, भौगोलिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक डिटेल्स नीचे बिंदुवार दी जा रही हैं:
1. सामान्य परिचय एवं भौगोलिक स्थिति
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जिला: कोटपूतली-बहरोड़ (राजस्थान) — (प्रशासनिक पुनर्गठन से पहले यह प्राचीन स्थल जयपुर जिले की पावटा/विराटनगर तहसील के अंतर्गत आता था)।
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नदी: यह सभ्यता साबी (साहिबी) नदी के तट पर विकसित हुई थी।
2. खोज एवं उत्खनन (Discovery & Excavation)
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खोज व उत्खनन: इस पुरास्थल का व्यापक उत्खनन वर्ष 1972-73 से 1975 के दौरान प्रसिद्ध पुरातत्वविदों आर.सी. अग्रवाल (रतन चंद्र अग्रवाल) और विजय कुमार के निर्देशन में संपन्न हुआ था।
3. काल निर्धारण एवं सांस्कृतिक स्तर (Time Period & Strata)
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उत्खनन के दौरान यहाँ पाँच अलग-अलग सांस्कृतिक अवधियों (Phases) का निरंतर क्रम पाया गया है, जो ताम्रपाषाण काल (गेरूए रंग के मृदभांड – OCP संस्कृति) से लेकर शुंग-कुषाण काल तक फैला हुआ है।
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इसका मुख्य काल लगभग 2500 ईसा पूर्व से लेकर प्रारंभिक ईस्वी सन् तक माना जाता है।
4. जोधपुरा सभ्यता की मुख्य विशेषताएँ (बिंदुवार संपूर्ण विवरण)
A. लोहे को गलाने की प्राचीन भट्ठियाँ (Iron Smelting Furnaces) — सबसे महत्वपूर्ण
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जोधपुरा की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक विशेषता यह है कि यहाँ से लोह अयस्क से शुद्ध लोहा निकालने और गलाने की प्राचीन भट्ठियाँ प्राप्त हुई हैं।
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इसे भारत में प्राचीन लौह प्रौद्योगिकी और धातु कर्म (Iron Technology) के सबसे शुरुआती और पुख्ता प्रमाणों में गिना जाता है। यहाँ से बड़ी संख्या में लोहे के बाण, कुल्हाड़ियाँ, भाले और अन्य अस्त्र-शस्त्र मिले हैं।
B. चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति (Painted Grey Ware – PGW)
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यह स्थल सलेटी रंग की चित्रित मृदभांड संस्कृति (PGW) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र था।
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यहाँ से मिलने वाले बर्तनों और पुरावशेषों पर सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के बाद की उत्तर-वैदिक और लौह युगीन संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इसके अलावा यहाँ से तांबे के आभूषण और कपिषवर्णी मृदभांड (OCP) की परतें भी मिली हैं।
C. वास्तुकला और जीवनशैली
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मकानों की बनावट: यहाँ के निवासी घास-फूस के छप्पर और मिट्टी के घरों के साथ-साथ छतों पर टाइल्स (Tiles) का प्रयोग करना भी जानते थे।
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खानपान: पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार यहाँ के लोगों के मुख्य आहार में चावल और मांस शामिल था।
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परिवहन: यहाँ से ऐसे साक्ष्य मिले हैं जिनसे यह संकेत मिलता है कि इस काल तक घोड़ों का उपयोग रथ खींचने या यातायात के लिए किया जाने लगा था।
D. मौर्य, शुंग और कुषाण कालीन अवशेष
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जोधपुरा से केवल लौह युग ही नहीं, बल्कि बाद के काल के भी समृद्ध अवशेष मिले हैं। यहाँ से मौर्य, शुंग और कुषाण कालीन वस्तुएँ, पक्की ईंटें, टेराकोटा की मूर्तियाँ तथा तत्कालीन सिक्के प्राप्त हुए हैं जो इसके निरंतर ऐतिहासिक बने रहने की पुष्टि करते हैं।
आरपीएससी (RPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से जोधपुरा से मुख्य रूप से कोटपूतली-बहरोड़ जिला, साबी नदी, आर.सी. अग्रवाल व विजय कुमार, और लोहे गलाने की भट्टियों से जुड़े प्रश्न सबसे अधिक पूछे जाते हैं।