मुख्य बिंदु: बछ बारस (वत्स द्वादशी / गोवत्स द्वादशी) 1. कब और कहाँ तिथि: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि (जन्माष्टमी के चार दिन बाद)। समय: अगस्त–सितंबर। प्रमुख क्षेत्र: मुख्य रूप से राजस्थान (मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़, हाड़ौती), मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र। (नोट: देश के कुछ हिस्सों, जैसे महाराष्ट्र और गुजरात में, यह पर्व दीपावली […]
बछ बारस (वत्स द्वादशी / गोवत्स द्वादशी)
1. कब और कहाँ
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तिथि: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि (जन्माष्टमी के चार दिन बाद)।
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समय: अगस्त–सितंबर।
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प्रमुख क्षेत्र: मुख्य रूप से राजस्थान (मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़, हाड़ौती), मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र।
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(नोट: देश के कुछ हिस्सों, जैसे महाराष्ट्र और गुजरात में, यह पर्व दीपावली के समय ‘कार्तिक कृष्ण द्वादशी’ को ‘वसुबारस’ के नाम से भी मनाया जाता है, किंतु राजस्थान में मुख्य बछ बारस भाद्रपद कृष्ण द्वादशी को ही होती है।)
2. पौराणिक पृष्ठभूमि एवं लोककथा
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समुद्र मंथन का संदर्भ: भविष्य पुराण के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान कामधेनु गाय और उसकी बछिया ‘नंदिनी’ प्रकट हुई थीं। वत्स द्वादशी के दिन कामधेनु और बछड़े की पूजा कर मातृशक्ति और संतान सुरक्षा की कामना की जाती है।
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राजस्थान की लोककथा (गेहूंला-जौंधुला की कथा):
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एक वृद्ध सास ने अपनी बहू से कहा कि वह ‘गेहूंला’ (गेहूं के दाने) और ‘जौंधुला’ (जौ के दाने) उबालकर रख दे।
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गाय के बछड़ों के नाम भी भूलवश ‘गेहूंला’ और ‘जौंधुला’ थे। नासमझ बहू ने भूल से बछड़ों को ही नुकसान पहुँचा दिया और उन्हें हांडी में डालकर चूल्हे पर चढ़ा दिया।
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जब सास-बहू को अपनी भूल का अहसास हुआ, तो उन्होंने पश्चाताप कर गोमाता और भगवान से प्रार्थना की। संध्या समय जब गाय जंगल से लौटी और उसने पुकारा, तो भगवान की कृपा से दोनों बछड़े जीवित होकर हांडी से बाहर निकल आए।
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इसी प्रायश्चित और संतान-रक्षा की स्मृति में इस दिन गाय और बछड़े की विशेष पूजा तथा गेहूं-चाकू के त्याग का नियम बना।
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3. प्रमुख परंपराएँ एवं कड़े नियम (Exam Traps)
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गाय और बछड़े का पूजन:
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महिलाएं अपने पुत्र की दीर्घायु, स्वास्थ्य और वंशवृद्धि के लिए यह व्रत रखती हैं।
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दूध देने वाली गाय और उसके बछड़े (विशेषकर बछिया या बछड़ा दोनों) को नहलाकर कुमकुम, अक्षत, रोली और फूलों से सजाया जाता है। उन्हें अंकुरित मोठ, मूंग, चना और बाजरे का भोग खिलाया जाता है।
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गाय के दूध का पूर्ण निषेध:
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इस दिन गाय के दूध, दही, छाछ और गाय के घी का सेवन पूर्णतः वर्जित होता है। माना जाता है कि आज गाय के दूध पर केवल उसके बछड़े का अधिकार है।
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भोजन में भैंस के दूध या केवल तिल के तेल का प्रयोग किया जाता है।
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चाकू से कटी हुई वस्तु का निषेध:
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बछ बारस के दिन रसोई में चाकू, दरांती या किसी भी धारदार औजार से काटी गई चीजें खाना मना होता है।
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अन्न निषेध और पारंपरिक आहार:
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गेहूं और चावल (जौ/धान) का सेवन वर्जित माना जाता है।
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इस दिन मक्का, बाजरा, चना, मोठ और मूंग से बने व्यंजन खाए जाते हैं। मक्के या बाजरे की रोटी, बेसन की कढ़ी और अंकुरित अनाज मुख्य भोजन होते हैं।
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4. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)
| बिंदु | विवरण |
| सीधा पंचांग प्रश्न | “राजस्थान में बछ बारस का त्योहार किस तिथि को मनाया जाता है?” — भाद्रपद कृष्ण द्वादशी। |
| व्रत का मुख्य उद्देश्य | पुत्र/संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुरक्षा की कामना। |
| खाद्य निषेध नियम (Unique Restrictions) |
• गाय का दूध/दही/घी पूर्णतः वर्जित (केवल भैंस का दूध मान्य)।
• चाकू से कटी हुई कोई भी सामग्री खाना वर्जित।
• गेहूं और चावल का सेवन वर्जित (मक्का, बाजरा, मोठ खाया जाता है)।
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| भाद्रपद कृष्ण पक्ष की क्रमबद्धता |
• तृतीया: कजली तीज (बूंदी)
• षष्ठी: ऊबछठ / हलषष्ठी
• अष्टमी: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
• नवमी: गोगा नवमी
• द्वादशी: बछ बारस
• अमावस्या: सती अमावस्या (रानी सती मेला, झुंझुनूं)
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