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शारदीय नवरात्र

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सत्यापित: 07 September 2026
मुख्य बिंदु: शारदीय नवरात्र (आश्विन शुक्ल एकम से नवमी) एवं प्रमुख देवी मेले 1. कब और क्यों तिथि: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (एकम) से नवमी तक। समय: सितंबर–अक्टूबर (शरद ऋतु के आगमन पर, इसलिए ‘शारदीय’)। धार्मिक मान्यता: मान्यता है कि महिषासुर से नौ दिनों के भीषण संग्राम के बाद देवी दुर्गा ने दसवें दिन […]

शारदीय नवरात्र (आश्विन शुक्ल एकम से नवमी) एवं प्रमुख देवी मेले

1. कब और क्यों

  • तिथि: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (एकम) से नवमी तक।
  • समय: सितंबर–अक्टूबर (शरद ऋतु के आगमन पर, इसलिए ‘शारदीय’)।
  • धार्मिक मान्यता: मान्यता है कि महिषासुर से नौ दिनों के भीषण संग्राम के बाद देवी दुर्गा ने दसवें दिन (विजयादशमी) उस पर विजय प्राप्त की थी। साथ ही, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका विजय से पूर्व आश्विन नवरात्र में देवी की शक्ति-उपासना की थी।
  • राजस्थान के प्रमुख लक्खी मेले: नवरात्र वर्ष में दो बार मुख्य रूप से (चैत्र व आश्विन) सार्वजनिक स्तर पर मनाए जाते हैं। इस दौरान राजस्थान के शक्तिपीठों पर विशाल मेले भरते हैं।

2. प्रमुख देवी मेले एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

(क) करणी माता मेला : देशनोक (बीकानेर)

  • स्थान: देशनोक, बीकानेर ज़िला (बीकानेर से लगभग 30 किमी दूर)।
  • उपनाम: ‘चूहों वाली देवी’ (Mata of White Rats) तथा ‘दाढ़ी वाली डोकरी’।
  • कुलदेवी / इष्टदेवी:
    • चारण समाज की कुलदेवी।
    • बीकानेर के राठौड़ राजवंश की इष्टदेवी।
  • ऐतिहासिक प्रसंग:
    • करणी माता (रिद्धि बाई) का जन्म सुआप गाँव (जोधपुर) में मेहाजी चारण के घर हुआ था।
    • इन्होंने जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग तथा बीकानेर के संस्थापक राव बीका के समय रियासत की स्थापना में अपना प्रत्यक्ष आशीर्वाद दिया था।
  • काबा (चूहे) और सफेद काबा:
    • मंदिर परिसर में हजारों चूहे निर्भय होकर घूमते हैं, जिन्हें ‘काबा’ (Kaba) कहा जाता है। मान्यता है कि चारण जाति के लोग मृत्यु के बाद काबा बनते हैं और काबा मृत्यु के बाद चारण कुल में जन्म लेते हैं।
    • चूहों में दुर्लभ सफेद चूहे (सफेद काबा) का दर्शन अत्यंत शुभ और साक्षात् करणी माता का आशीर्वाद माना जाता है।
  • मंदिर वास्तुकला: वर्तमान संगमरमर के भव्य मंदिर और नक्काशीदार चांदी के कपाटों का निर्माण बीकानेर महाराजा सूरत सिंह तथा आधुनिक विस्तार महाराजा गंगा सिंह जी ने करवाया था।
  • नेहड़ी जी तीर्थ: देशनोक के पास ही वह स्थल जहाँ माता दही बिलोती थीं और जहाँ उनकी ऐतिहासिक लकड़ी की रई (मथानी) आज भी सुरक्षित है।

(ख) जीण माता मेला : रैवासा (सीकर)

  • स्थान: रैवासा गाँव के पास, काजल शिखर/हर्ष की पहाड़ियों की तलहटी, सीकर ज़िला।
  • उपनाम: ‘मधुमक्खियों की देवी’ / ‘भंवरों वाली माता’।
  • कुलदेवी: शेखावाटी के चौहान वंश की कुलदेवी तथा मीणा समाज की प्रमुख आराध्य देवी।
  • पौराणिक कथा (भाई-बहन का प्रेम):
    • जीण माता और उनके भाई हर्ष के बीच अटूट स्नेह था। भाभी द्वारा ताना मारे जाने पर जीण रुष्ट होकर काजल शिखर पर तपस्या करने चली गईं।
    • उन्हें मनाने पहुँचे हर्ष भी बहन के निश्चय को देखकर पास की पहाड़ी पर भैरव स्वरूप में तपस्या में लीन हो गए (जहाँ आज ‘हर्षनाथ भैरव’ का प्राचीन मंदिर है)।
  • मुगल शासक औरंगजेब का प्रसंग:
    • जब मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को खंडित करने का प्रयास किया, तो मंदिर से असंख्य मधुमक्खियों (भंवरों) का झुंड निकला और मुग़ल सेना पर टूट पड़ा। सेना जान बचाकर भागी।
    • पराजित होकर औरंगजेब ने माता से क्षमा मांगी और मंदिर में अखंड ज्योति के लिए दिल्ली के शाही दरबार से प्रतिवर्ष सवा मन तेल/घी भेजने का फरमान जारी किया, जो वर्षों तक जारी रहा।
  • सबसे लंबा लोकगीत (Chirja): राजस्थान के लोक साहित्य में सभी देवी-देवताओं में जीण माता का लोकगीत (चिरजा) सबसे लंबा माना जाता है, जिसे ‘कनफटे जोगी’ केसरिया वस्त्र पहनकर डमरू और सारंगी पर गाते हैं।
  • मंदिर निर्माण: इस मंदिर का निर्माण 1064 ई. (11वीं सदी) में चौहान राजा पृथ्वीराज प्रथम के शासनकाल में हट्टड़ (राजा हट्ट) द्वारा करवाया गया था।

(ग) शीला देवी मेला : आमेर (जयपुर)

  • स्थान: आमेर दुर्ग (जलेब चौक परिसर), जयपुर।
  • कुलदेवी / इष्टदेवी: जयपुर के कछवाहा राजवंश की इष्टदेवी (कछवाहा शासकों की कुलदेवी ‘जमवाय माता’ हैं)।
  • मूर्ति स्थापना का इतिहास:
    • 16वीं शताब्दी (लगभग 1604 ई.) में आमेर के महाराजा मानसिंह प्रथम ने बंगाल के शासक राजा केदार को युद्ध में पराजित किया था।
    • मानसिंह जी जसोर (वर्तमान बांग्लादेश) से इस चमत्कारी काले पाषाण की अष्टभुजा महिषासुरमर्दिनी प्रतिमा को लेकर आए और आमेर दुर्ग में स्थापित करवाया।
  • प्रतिमा की विशेषता:
    • यह काले संगमरमर (कसौटी पत्थर) की एक ही शिला पर उत्कीर्ण है, इसलिए इसे ‘शीला देवी’ कहा जाता है।
    • प्रतिमा की गर्दन थोड़ी सी तिरछी (झुकी हुई) है।
  • मद्य (शराब) का भोग: ऐतिहासिक रूप से यहाँ देवी को ढाई प्याला मद्य (मदिरा) का चरणामृत अर्पित करने की अनूठी परंपरा रही है।
  • वर्तमान भव्य स्वरूप: मंदिर के वर्तमान संगमरमर स्वरूप और चांदी के बारीक नक्काशीदार दरवाजों का निर्माण सवाई मानसिंह द्वितीय ने करवाया था।

3. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)

बिंदु करणी माता (देशनोक) जीण माता (रैवासा) शीला देवी (आमेर)
ज़िला / स्थान देशनोक (बीकानेर) रैवासा (सीकर) आमेर दुर्ग (जयपुर)
संबंधित राजवंश बीकानेर के राठौड़ (इष्टदेवी) व चारण (कुलदेवी) शेखावाटी के चौहान (कुलदेवी) व मीणा आराध्य जयपुर के कछवाहा (इष्टदेवी)
विशिष्ट पहचान सफेद काबा (चूहे), चांदी के भव्य कपाट मधुमक्खियों की देवी, सबसे लंबा लोकगीत तिरछी गर्दन वाली प्रतिमा, ढाई प्याला मदिरा
ऐतिहासिक व्यक्तित्व राव बीका, सूरत सिंह, गंगा सिंह हट्टड़ (निर्माता), औरंगजेब (घी का दीया) महाराजा मानसिंह प्रथम (बंगाल के राजा केदार को हराकर लाए)
वर्ष में मेले की आवृत्ति वर्ष में दो बार (चैत्र व आश्विन नवरात्र) वर्ष में दो बार (चैत्र व आश्विन नवरात्र) वर्ष में दो बार (चैत्र व आश्विन नवरात्र)

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

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