मुख्य बिंदु: सलेमाबाद का निंबार्क पीठ मेला (अजमेर) 1. कब और कहाँ तिथि: प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी (राधाष्टमी) को। समय: अगस्त–सितंबर। स्थान: सलेमाबाद (किशनगढ़ के पास, अजमेर ज़िला, राजस्थान)। भौगोलिक संदर्भ: यह पवित्र तीर्थ स्थल रूपनगढ़ नदी (Rupangarh River) के तट पर स्थित है। आधिकारिक नाम: इसे ‘अखिल भारतीय निम्बार्काचार्य पीठ’ या ‘श्री […]
सलेमाबाद का निंबार्क पीठ मेला (अजमेर)
1. कब और कहाँ
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तिथि: प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी (राधाष्टमी) को।
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समय: अगस्त–सितंबर।
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स्थान: सलेमाबाद (किशनगढ़ के पास, अजमेर ज़िला, राजस्थान)।
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भौगोलिक संदर्भ: यह पवित्र तीर्थ स्थल रूपनगढ़ नदी (Rupangarh River) के तट पर स्थित है।
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आधिकारिक नाम: इसे ‘अखिल भारतीय निम्बार्काचार्य पीठ’ या ‘श्री परशुराम धाम’ भी कहा जाता है।
2. ऐतिहासिक व दार्शनिक पृष्ठभूमि
(क) पीठ की स्थापना और आचार्य परशुराम देवाचार्य:
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मूल रूप से निंबार्क संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य निम्बार्क (11वीं-12वीं शताब्दी) थे, जिनका जन्म दक्षिण भारत में हुआ था और उन्होंने ब्रज (वृंदावन) को अपनी तपोभूमि बनाया।
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राजस्थान में इस संप्रदाय की प्रधान पीठ की स्थापना 16वीं शताब्दी में आचार्य श्री परशुराम देवाचार्य जी ने की थी।
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तपोस्थली से पीठ तक: आचार्य परशुराम जी का जन्म सीकर ज़िले के ‘ठिकरिया’ गाँव में हुआ था। उन्होंने पुष्कर के निकट रूपनगढ़ नदी के किनारे घने वनों में कठोर तपस्या की थी। उनके तपोबल और चमत्कारों से प्रभावित होकर तत्कालीन शासकों ने इस क्षेत्र को संरक्षण दिया, जो कालांतर में सलेमाबाद कहलाया।
(ख) संप्रदाय के अन्य नाम एवं दर्शन:
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हंस संप्रदाय / सनकादिक संप्रदाय: मान्यता है कि भगवान विष्णु ने ‘हंस अवतार’ लेकर सनकादिक ऋषियों को जो ज्ञान दिया था, वही परंपरा इस संप्रदाय में प्रवाहित है।
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द्वैताद्वैतवाद (Dualistic Non-Dualism) / भेदाभेद सिद्धांत: इस दर्शन के अनुसार जीव, जगत् और ईश्वर भिन्न भी हैं और अभिन्न भी (जैसे सूर्य और उसकी किरणें)।
3. प्रमुख परंपराएँ एवं मेले का स्वरूप
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राधाष्टमी का महामहोत्सव:
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सलेमाबाद में वर्ष का सबसे विशाल मेला और धार्मिक समागम राधाष्टमी के अवसर पर ही भरता है।
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यहाँ मंदिर के गर्भगृह में स्थित श्री राधा-सर्वेश्वर भगवान की युगल मूर्ति का विशेष पंचामृत अभिषेक, नख-शिख श्रृंगार और बधाई गायन होता है।
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युगल उपासना (राधा-कृष्ण स्वरूप):
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इस संप्रदाय की सर्वोच्च विशेषता यह है कि यहाँ भगवान श्रीकृष्ण के साथ श्री राधा रानी को स्वतंत्र और समान सत्ता (आह्लादिनी शक्ति) के रूप में पूजा जाता है।
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दधिकांदो उत्सव: राधाष्टमी के अगले दिन (भाद्रपद शुक्ल नवमी) ‘दधिकांदो’ का आयोजन होता है, जिसमें संत और श्रद्धालु हल्दी, केसर और दही का परस्पर छिड़काव करते हुए भाव-विभोर होकर नृत्य करते हैं।
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गोपाल सागर कुंड: श्रद्धालु मंदिर परिसर में स्थित ‘गोपाल सागर’ जलाशय और रूपनगढ़ नदी में पवित्र स्नान कर आशीर्वाद लेते हैं।
4. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)
| बिंदु | विवरण |
| सीधा प्रतियोगी प्रश्न (RPSC / RSMSSB) | “राजस्थान में निम्बार्क संप्रदाय की प्रधान पीठ कहाँ स्थित है?” — सलेमाबाद (अजमेर)। |
| मेले की तिथि | भाद्रपद शुक्ल अष्टमी (राधाष्टमी)। |
| संस्थापक (राजस्थान शाखा) | आचार्य परशुराम देवाचार्य जी (जन्म: ठिकरिया, सीकर)। |
| नदी का किनारा | रूपनगढ़ नदी (सांभर झील अपवाह तंत्र की आंतरिक प्रवाह नदी)। |
| संप्रदाय के उपनाम |
• हंस संप्रदाय
• सनकादिक संप्रदाय
• देवर्षि संप्रदाय
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| दार्शनिक मत | द्वैताद्वैतवाद (Bhedabheda / Dvaitadvaita)। |
| राजस्थान की कला पर प्रभाव | किशनगढ़ चित्रकला शैली में राधा-कृष्ण के आलौकिक और श्रृंगारिक चित्रण (जैसे प्रसिद्ध ‘बणी-ठणी’) पर सलेमाबाद के निम्बार्क संप्रदाय का सीधा प्रभाव रहा है (राजा सावंत सिंह / नागरीदास स्वयं इस संप्रदाय से दीक्षित थे)। |