मुख्य बिंदु: 1818 ई. की ईस्ट इंडिया कंपनी संधियों के बाद दक्षिणी राजस्थान (भोमट, वागड़ क्षेत्र) में ब्रिटिश व सामंती हस्तक्षेप के विरुद्ध हुआ यह पहला संगठित आदिवासी असंतोष था। RPSC और RSMSSB परीक्षाओं के दृष्टिकोण से सूक्ष्म तथ्य नीचे दिए गए हैं: 1. पृष्ठभूमि व विद्रोह के कारण पारंपरिक कर वसूलने के अधिकारों की समाप्ति: बोलाई […]
1818 ई. की ईस्ट इंडिया कंपनी संधियों के बाद दक्षिणी राजस्थान (भोमट, वागड़ क्षेत्र) में ब्रिटिश व सामंती हस्तक्षेप के विरुद्ध हुआ यह पहला संगठित आदिवासी असंतोष था। RPSC और RSMSSB परीक्षाओं के दृष्टिकोण से सूक्ष्म तथ्य नीचे दिए गए हैं:
1. पृष्ठभूमि व विद्रोह के कारण
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पारंपरिक कर वसूलने के अधिकारों की समाप्ति:
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बोलाई कर (Bolai Tax): भील अपनी सीमाओं से गुजरने वाले व्यापारियों, यात्रियों और काफिलों को सुरक्षा देने के बदले यह राहदारी कर वसूलते थे।
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रखवाली कर (Rakhwali Tax): भील अपने अधिकार क्षेत्र के पड़ोसी गाँवों की सुरक्षा के बदले जागीरदारों व ग्रामीणों से यह चौकीदारी कर लेते थे।
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कर्नल जेम्स टॉड (मेवाड़ रेजिडेंट) व ब्रिटिश अधिकारियों ने इन दोनों करों की वसूली पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
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देशी सेनाओं का विखंडन व बेरोजगारी: रियासतों की सेनाओं और जागीरदारों की टुकड़ियों में भील सिपाही व धनुर्धर के रूप में तैनात थे। अंग्रेजों द्वारा संधियों के बाद देशी सेनाओं की छंटनी से भील बेरोजगार हो गए।
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वनों व आजीविका पर प्रतिबंध: अंग्रेजों ने जंगलों से महुआ, इमारती लकड़ी, कंदमूल आदि एकत्र करने पर पाबंदियाँ लगाईं तथा भीलों के पारंपरिक महुआ से शराब बनाने पर रोक लगाकर ठेकेदारों को अधिकार दे दिए।
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जनगणना और सामाजिक हस्तक्षेप: अंग्रेजों द्वारा सामाजिक रूढ़ियों पर रोक (जैसे ‘डाकन प्रथा’ का दमन) और शुरुआती प्रशासनिक हस्तक्षेप को भीलों ने अपने धर्म और स्वायत्तता पर हमला माना।
2. घटनाक्रम व प्रमुख चरण (1818 – 1860 ई.)
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प्रथम चरण (1818 – 1825 ई.):
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1818 के अंत में मेवाड़ के भीलों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर ब्रिटिश व राज्य सत्ता को चेतावनी दी।
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अंग्रेजों और मेवाड़ की संयुक्त सेना ने दिसंबर 1823 तक कई सैन्य अभियानों के माध्यम से दबाव बनाया।
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मेवाड़ के प्रभाव से बांसवाड़ा और डूंगरपुर के भीलों में भी असंतोष फैला, लेकिन मई 1825 में वागड़ क्षेत्र के कई भील मुखियाओं ने ब्रिटिश दबाव में समझौते पर हस्ताक्षर किए।
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दौलतसिंह व गोविंदराम का उपद्रव (1826 – 1828 ई.):
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डूंगरपुर व सीमावर्ती क्षेत्रों में भीलों ने फिर से विद्रोह किया। कैप्टन ब्लैक (Captain Black) व अन्य ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों ने इस क्षेत्र में कड़े दमनकारी अभियान चलाए।
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बांसवाड़ा विद्रोह (1836 ई.):
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बांसवाड़ा रियासत में व्यापक उपद्रव हुआ, जिसे बांसवाड़ा के महारावल और ब्रिटिश सहायता से नियंत्रित किया गया।
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कालीबास का भील विद्रोह (1855 – 1856 ई.):
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दिसंबर 1855 में उदयपुर के पास कालीबास के भीलों ने खुलकर बगावत की।
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नवंबर 1856 में मेवाड़ के महाराणा स्वरूप सिंह ने मेहता सवाई सिंह के नेतृत्व में भारी सेना भेजी, जिसने भील गाँवों को जलाकर इसका निर्मम दमन किया।
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1857 की क्रांति के दौरान स्थिति:
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मुख्य क्रांति से भील अपेक्षाकृत अलग रहे, लेकिन ब्रिटिश शासन के प्रति उनका विरोध स्थानीय स्तर पर 1860 के अंत तक छिटपुट रूप से चलता रहा।
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3. सर्वाधिक महत्वपूर्ण परिणाम: ‘मेवाड़ भील कोर’ (MBC)
विद्रोहों के स्थायी समाधान और मेरों की तर्ज (मेरवाड़ा बटालियन) पर भीलों को अनुशासित करने के लिए एक विशेष सैन्य बल की स्थापना की गई:
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स्थापना वर्ष: अप्रैल 1841 ई.
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मुख्यालय: खेरवाड़ा (उदयपुर)
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प्रमुख छावनियाँ/चौकियाँ: खेरवाड़ा और कोटड़ा
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वित्तीय भार: इसका 50,000 रुपये वार्षिक खर्च मेवाड़ रियासत पर डाला गया।
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प्रशासनिक प्रभाव: इस वाहिनी के कमांडेंट को भील क्षेत्रों (मगरा जिला) के प्रशासनिक और न्यायिक अधिकार भी सौंप दिए गए।
4. परीक्षा उपयोगी सूक्ष्म तथ्य (Quick Revision Table)
| बिंदु | विवरण |
| अवधि | 1818 से 1860 ई. (प्रारंभिक दौर) |
| मुख्य केंद्र | मेवाड़ (भोमट, मगरा), डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सिरोही |
| विद्रोह के दो प्रमुख कर | बोलाई (राहदारी/मार्ग सुरक्षा कर) और रखवाली (गाँव सुरक्षा कर) |
| MBC का गठन | अप्रैल 1841 ई. (मुख्यालय: खेरवाड़ा) |
| कालीबास दमन (1856) | मेवाड़ सेनापति मेहता सवाई सिंह द्वारा दमन |
| तत्कालीन मेवाड़ रेजिडेंट | कर्नल जेम्स टॉड (1818 के समय) |