मुख्य बिंदु: बांसवाड़ा जिले (दक्षिणी वागड़ अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य उपनाम: सौ द्वीपों का शहर (City of Hundred Islands), राजस्थान का चेरापूंजी (झालावाड़ के बाद सर्वाधिक वर्षा), वागड़ का पुष्कर (घोटिया आंबा), लोढ़ी काशी। स्थापना: 1518 ई. में महारावल जगमाल सिंह […]
बांसवाड़ा जिले (दक्षिणी वागड़ अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:
1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य
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उपनाम: सौ द्वीपों का शहर (City of Hundred Islands), राजस्थान का चेरापूंजी (झालावाड़ के बाद सर्वाधिक वर्षा), वागड़ का पुष्कर (घोटिया आंबा), लोढ़ी काशी।
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स्थापना: 1518 ई. में महारावल जगमाल सिंह द्वारा बांसिया भील को पराजित कर स्वतंत्र बांसवाड़ा राज्य स्थापित किया गया (बांस के वनों की प्रचुरता के कारण बांसवाड़ा कहलाया)।
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भौगोलिक स्थिति व अक्षांश:
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कर्क रेखा (23.5° N): बांसवाड़ा जिले के लगभग मध्य (कुशलगढ़ तहसील के छींच गाँव) से होकर गुजरती है (कर्क रेखा की राजस्थान में कुल लंबाई ~26 किमी)।
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नदियाँ एवं जल परियोजनाएं:
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माही नदी: ‘वागड़ व कांठल की गंगा’, ‘आदिवासियों की जीवनरेखा’। मध्य प्रदेश के अमरोरू (मेहद झील) से निकलकर खांदू गाँव (बांसवाड़ा) से राजस्थान में प्रवेश करती है और कर्क रेखा को दो बार काटने वाली विश्व की एकमात्र नदी है।
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माही बजाज सागर बांध (बोरखेड़ा, बांसवाड़ा): राजस्थान का सबसे लंबा बांध (3,109 मीटर); राजस्थान व गुजरात की संयुक्त जल-विद्युत परियोजना।
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कागदी पिक-अप बांध: माही बांध से छोड़ा गया जल सिंचाई नहरों में वितरित करने हेतु निर्मित।
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छप्पन का मैदान: बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के मध्य स्थित 56 नदी-नालों व 56 गाँवों का उपजाऊ मैदानी समूह।
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अनास, चाप, एराव, हरण: माही की प्रमुख सहायक नदियाँ।
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खनिज संपदा:
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सोना (Gold): आनंदपुरा-भूखिया, जगपुरा, तिमारनमाता (राजस्थान में स्वर्ण भंडारों के प्रमुख क्षेत्र)।
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मैंगनीज: लीलवाणी, तलवाड़ा, कालाखूंटा, सागवा।
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हरा संगमरमर व कैल्साइट: बांसवाड़ा क्षेत्र।
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2. राजवंश एवं प्रमुख शासक
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राजवंश: गुहिल/सिसोदिया वंश की वागड़ शाखा (डूंगरपुर से विभाजित होकर स्वतंत्र शाखा बनी)।
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प्रमुख शासक व योगदान:
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महारावल उदयसिंह (वागड़): खानवा के युद्ध (1527 ई.) में राणा सांगा की ओर से लड़ते हुए वीरगति पाई; मृत्यु पूर्व वागड़ को दो भागों में बांटा — डूंगरपुर (पृथ्वीराज) और बांसवाड़ा (जगमाल सिंह)।
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महारावल जगमाल सिंह (1527 ई.): बांसवाड़ा रियासत के प्रथम स्वतंत्र शासक।
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महारावल उम्मेद सिंह: 1818 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ अधीनस्थ पार्थक्य की संधि की।
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महारावल लक्ष्मण सिंह: 1857 की क्रांति के समय शासक; तांत्या टोपे ने 11 दिसंबर 1857 को बांसवाड़ा पर अल्पकालिक अधिकार कर लिया था और लक्ष्मण सिंह को जंगलों में शरण लेनी पड़ी थी।
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महारावल चंद्रवीर सिंह: राजस्थान एकीकरण (25 मार्च 1948) के समय विलय पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए ऐतिहासिक कथन कहा: “मैं अपने डेथ वारंट (Death Warrant) पर हस्ताक्षर कर रहा हूँ।”
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3. प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्विक स्थल
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अर्थूणा (प्राचीन नाम: उत्थूणक):
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11वीं-12वीं शताब्दी में वागड़ के परमारों की राजधानी।
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परमार राजा चामुंडराज व मंडलीक द्वारा निर्मित महा-मारू शैली के 50 से अधिक हिंदू व जैन मंदिरों का समूह (मुख्य मंदिर: मंडलेश्वर महादेव मंदिर, गढ़ी के जैन मंदिर, नीलकंठ महादेव)।
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4. प्रमुख दुर्ग, मंदिर एवं स्थापत्य
| स्मारक / स्थल | निर्माता | प्रमुख विशेषता |
| त्रिपुरा सुंदरी (तुरताई माता) मंदिर | प्राचीन शक्तिपीठ (उमराई गाँव, तलवाड़ा) | अष्टादशभुजा (18 भुजाओं वाली) काले पाषाण की सिंहवाहिनी देवी प्रतिमा; कनिष्ठिका, मध्यमा व अनामिका के बीच स्थित होने से त्रिपुरा सुंदरी नाम पड़ा; पांचाल (लुहार) समाज की कुलदेवी। |
| घोटिया आंबा तीर्थ (बारीगामा) | महाभारत कालीन तीर्थ | मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहाँ शरण ली थी और भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्वासा ऋषि के आगमन पर द्रौपदी को ‘अक्षय पात्र’ दिया था। इसे ‘भीलों का कुंभ / वागड़ का पुष्कर’ कहा जाता है (चैत्र अमावस्या को मेला)। |
| मंगलेश्वर / मंडलेश्वर महादेव (अर्थूणा) | परमार चामुंडराज (1079 ई.) | परमार स्थापत्य कला का उत्कृष्ट पंचायतन शैली का मंदिर। |
| मदारेश्वर शिव मंदिर | प्राकृतिक गुफा | पहाड़ी की प्राकृतिक गुफा में स्थित सुरम्य प्राचीन शिवालय। |
| छींच का ब्रह्मा मंदिर | 12वीं शताब्दी (महारावल जगमाल काल) | पुष्कर व आसोतरा के अतिरिक्त राजस्थान में स्थित ब्रह्मा जी का प्राचीन चतुर्मुखी मंदिर। |
| अब्दुल्ला पीर की दरगाह (भगवानपुरा) | दाऊदी बोहरा संप्रदाय | दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय का पवित्र धार्मिक स्थल (हजरत अब्दुल रसूल की मजार)। |
| कुशलगढ़ का किला | कुशला भील / राठौड़ शासक | ऐतिहासिक गैर-सलामी ठिकाना (Thikana) रहा। |
5. मानगढ़ धाम हत्याकांड — ‘राजस्थान का जलियांवाला बाग’ (17 नवंबर 1913)
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स्थल: मानगढ़ पहाड़ी (बांसवाड़ा व गुजरात सीमा)।
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पृष्ठभूमि: महान समाज सुधारक गोविंद गुरु द्वारा भीलों में सामाजिक चेतना, नशाबंदी और स्वाभिमान जगाने हेतु 1883 में ‘सम्प सभा’ की स्थापना की गई थी।
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घटना: मार्गशीर्ष पूर्णिमा (17 नवंबर 1913) को सम्प सभा के वार्षिक अधिवेशन में मानगढ़ पहाड़ी पर शांतिपूर्वक एकत्र हजारों भीलों पर कर्नल शटन के आदेश पर मेवाड़ भील कोर (MBC), 104 वेलेस्ली राइफल्स और 7वीं राजपूत रेजिमेंट ने मशीनगनों और तोपों से अंधाधुंध गोलियां चलाईं।
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बलिदान: 1500 से अधिक निर्दोष आदिवासी शहीद हुए।
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परिणाम: गोविंद गुरु को गिरफ्तार कर आजीवन कारावास (बाद में कम कर अहमदाबाद/कंबोई में रिहा) की सजा दी गई। वर्तमान में इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया है।
6. जनजाति, लोक संस्कृति एवं हस्तशिल्प
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भील जनजाति की बहुलता:
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बांसवाड़ा राजस्थान में सर्वाधिक एसटी (जनजाति) प्रतिशत वाला जिला है।
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प्रमुख प्रथाएं: दापा (वधू मूल्य), हाथी-वेड़ो (विवाह पद्धति), मोथरा (विवाद निपटान)।
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लोक नृत्य व संगीत:
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गैर नृत्य: होली के अवसर पर पुरुषों द्वारा डंडों के साथ वृत्ताकार घेरे में किया जाने वाला पारंपरिक वागड़ी नृत्य।
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राई/गवरी नृत्य: भगवान शिव (बूढ़िया) और भस्मासुर की कथा पर आधारित लोकनाट्य।
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पाली नोच नृत्य: विवाह के अवसर पर वागड़ क्षेत्र में महिलाओं व पुरुषों द्वारा किया जाने वाला मांगलिक नृत्य।
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हस्तशिल्प व काष्ठ कला:
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बांस का हस्तशिल्प (Bamboo Craft): टोकनियां, घरेलू सजावटी वस्तुएं व फर्नीचर।
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तीर-कमान निर्माण: चंदूजी का गढ़ा (बांसवाड़ा) और बोड़ीगामा (डूंगरपुर) के पारंपरिक लोहे व बांस के तीर-कमान भारत प्रसिद्ध हैं।
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7. प्रमुख साहित्यकार, विद्वान एवं संस्थान
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संत मावजी (वागड़ के निष्कलंक भगवान):
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यद्यपि साबला (डूंगरपुर) मुख्य पीठ है, किंतु पूरे बांसवाड़ा-वागड़ अंचल में इनके वागड़ी भाषा में रचित भविष्यवाणियों के ग्रंथ ‘चोपड़ा’ पूजे जाते हैं।
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कवि दुर्जन सिंह व स्थानीय चारण कवि: वागड़ के ऐतिहासिक दोहों के रचयिता।
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कृषि अनुसंधान केंद्र (ARS), बोरखेड़ा (बांसवाड़ा):
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महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (MPUAT) का केंद्र; यहाँ विकसित उच्च उपज वाली किस्में:
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मक्का: ‘माही कंचन’ एवं ‘माही धवल’।
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चावल: ‘माही सुगंधा’।
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8. स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रजामंडल आंदोलन
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बांसवाड़ा प्रजामंडल (1943-1945 ई.):
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संस्थापक: भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी, धूलजी भाई भावसार, मणिशंकर नागर और चिमनलाल मालोत।
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समाचार पत्र: भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी ने मुंबई से ‘संग्राम’ साप्ताहिक समाचार पत्र निकाला।
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धूलजी भाई भावसार व विजया बहन भावसार: बांसवाड़ा में प्रजामंडल व खादी ग्रामोद्योग के प्रमुख स्तंभ।
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राजस्थान एकीकरण (25 मार्च 1948):
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एकीकरण के द्वितीय चरण (पूर्व राजस्थान संघ) में बांसवाड़ा रियासत और कुशलगढ़ ठिकाने का राजस्थान में पूर्ण विलय हुआ।
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