मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास और वीरकाव्य परंपरा में चौहान (चाहमान) राजवंश का स्थान सर्वोपरि है। इनका प्रारंभिक मूल स्थान सपादलक्ष (सांभर / शाकंभरी) माना जाता है। उत्पत्ति संबंधी प्रमुख मत: अग्निकुंड मत: चन्दबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो के अनुसार आबू पर्वत पर महर्षि वशिष्ठ द्वारा किए गए यज्ञ के अग्निकुंड […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास और वीरकाव्य परंपरा में चौहान (चाहमान) राजवंश का स्थान सर्वोपरि है। इनका प्रारंभिक मूल स्थान सपादलक्ष (सांभर / शाकंभरी) माना जाता है।
-
उत्पत्ति संबंधी प्रमुख मत:
-
अग्निकुंड मत: चन्दबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो के अनुसार आबू पर्वत पर महर्षि वशिष्ठ द्वारा किए गए यज्ञ के अग्निकुंड से चार राजपूत वंशों की उत्पत्ति हुई (प्रतिहार, परमार, चालुक्य/सोलंकी और चौहान)। इस मत का समर्थन मुहणौत नैणसी और सूर्यमल्ल मीसण ने भी किया।
-
वत्सगोत्रीय ब्राह्मण मत: बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) में चौहानों को ‘विप्र वत्सगोत्र’ (वत्सगोत्रीय ब्राह्मण) बताया गया है। डॉ. दशरथ शर्मा ने भी इस मत का समर्थन किया।
-
सूर्यवंशी मत: पृथ्वीराज विजय (जयानक), हम्मीर महाकाव्य (नयनचंद्र सूरि), तथा गौरीशंकर हीराचंद ओझा (जी.एच. ओझा) के अनुसार चौहान सूर्यवंशी हैं।
-
चंद्रवंशी मत: हाँसी अभिलेख व अचलेश्वर अभिलेख के अनुसार।
-
विदेशी उत्पत्ति का मत: कर्नल जेम्स टॉड, विलियम क्रुक और वी. ए. स्मिथ के अनुसार।
-
-
संस्थापक एवं प्रमुख शाखाएँ:
-
शाकंभरी (सांभर) के चौहान:
-
संस्थापक: वासुदेव चौहान (551 ई.)। इन्होंने सांभर झील का निर्माण करवाया तथा अपनी प्रारंभिक राजधानी अहिच्छत्रपुर (नागौर) बनाई।
-
कुलदेवी: शाकंभरी माता (सांभर) एवं जीण माता (रेवासा, सीकर)।
-
-
अजमेर के चौहान:
-
अजयराज (1113 ई.): अजमेर नगर की स्थापना की, तारागढ़ दुर्ग (अजयमेरु / गढ़ बीठली) बनवाया तथा चांदी के सिक्के (‘श्री अजयदेव’ व रानी सोमलदेवी के नाम पर) चलाए।
-
अर्णोराज (आनाजी): 1137 ई. में तुर्कों के संहार के बाद रक्त रंजित भूमि को शुद्ध करने हेतु आनासागर झील (अजमेर) का निर्माण करवाया। पुष्कर में वराह मंदिर बनवाया।
-
विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव – 1153-1163 ई.): अजमेर चौहानों का स्वर्णकाल। दिल्ली के तोमरों को हराकर दिल्ली पर अधिकार करने वाला प्रथम चौहान शासक। इन्होंने संस्कृत पाठशाला (वर्तमान ढाई दिन का झोंपड़ा) तथा टोंक में बीसलसर झील बनवाई।
-
पृथ्वीराज चौहान तृतीय (राय पिथौरा / दलपंगुल – 1177-1192 ई.): तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई. – विजयी) एवं द्वितीय युद्ध (1192 ई. – पराजित)।
-
-
रणथंभौर के चौहान:
-
संस्थापक: गोविंदराज (1194 ई.) (पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र)।
-
प्रतापी शासक: हम्मीर देव चौहान (1282–1301 ई.) — अपने ‘हठ’ और शरणागत-वत्सलता के लिए प्रसिद्ध। 1301 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध राजस्थान का प्रथम साका (रानी रंगदेवी का जल जौहर)।
-
-
जालौर के सोनगरा चौहान:
-
संस्थापक: कीर्तिपाल चौहान (कीतू – 1181 ई.) — मुहणौत नैणसी ने इन्हें ‘कीतू एक महान राजा’ कहा।
-
प्रतापी शासक: कान्हड़देव सोनगरा (1305–1311 ई.) — 1311 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध साका।
-
-
सिरोही के देवड़ा चौहान:
-
संस्थापक: लुम्भा (1311 ई.)। सहसमल ने 1425 ई. में सिरोही नगर बसाया।
-
-
हाड़ौती (बूंदी व कोटा) के हाड़ा चौहान:
-
संस्थापक: देवा हाड़ा (1241 ई.) ने बूंदी में हाड़ा वंश की नींव रखी।
-
-
2. प्रमुख ऐतिहासिक रचनाएँ, साहित्य और रचनाकार
चौहान राजवंश के इतिहास और शौर्य को अमर करने वाले प्रमुख साहित्यिक ग्रंथ:
| ग्रंथ (Work) | रचनाकार (Author) | भाषा / प्रकार | मुख्य विवरण |
| पृथ्वीराज रासो | चन्दबरदाई (पृथ्वीराज तृतीय के राजकवि) | पिंगल / बृज मिश्रित अपभ्रंश (महाकाव्य) | हिंदी का प्रथम महाकाव्य। अग्निकुंड सिद्धांत तथा पृथ्वीराज-गोरी युद्ध का विस्तृत वर्णन (पूर्णकर्ता: चन्दबरदाई के पुत्र जल्हण)। |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक भट्ट (कश्मीरी कवि) | संस्कृत (महाकाव्य) | पृथ्वीराज तृतीय के समकालीन। चौहानों की प्रामाणिक वंशावली और अजमेर नगर का भौगोलिक वर्णन। |
| हरिकेली (नाटक) | विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) | संस्कृत (नाटक) | भारवि कृत ‘किरातार्जुनीयम्’ पर आधारित। इसकी कुछ पंक्तियाँ ढाई दिन के झोंपड़े और ब्रिस्टल (इंग्लैंड) में राजा राममोहन राय के स्मारक पर अंकित हैं। |
| ललित विग्रहराज | सोमदेव (महाकवि) | संस्कृत (नाटक) | विग्रहराज चतुर्थ के दरबारी कवि। विग्रहराज और इन्द्रपुरी की राजकुमारी देसलदेवी के प्रेम प्रसंग का वर्णन। |
| बीसलदेव रासो | नरपति नाल्ह | पुरानी पश्चिमी राजस्थानी (गेय काव्य) | 4 खंडों में रचित श्रृंगार रस प्रधान रासो काव्य (विग्रहराज व मालवा की राजकुमारी राजमती का विरह-मिलन)। |
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचंद्र सूरि (जैन विद्वान) | संस्कृत (महाकाव्य) | हम्मीर देव चौहान की वंशावली, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध (1301 ई.) और जौहर का प्रामाणिक विवरण। |
| हम्मीर रासो (18वीं सदी) / (13वीं सदी) | जोधराज / शार्ङ्गधर | डिंगल / अहिरवाटी मिश्रित हिंदी | हम्मीर देव के शौर्य, महिमाशाह को शरण देने और खिलजी से टकराव का वर्णन। |
| हम्मीर हठ | चंद्रशेखर | हिंदी / डिंगल | हम्मीर के शरणागत प्रेम और हठ (“तिरिया तेल हमीर हठ, चढ़े न दूजी बार”) का सजीव चित्रण। |
| कान्हड़दे प्रबंध एवं वीरमदे सोनगरा री वात | पद्मनाभ (जालौर दरबार) | पुरानी गुजराती / राजस्थानी (डिंगल) | कान्हड़देव सोनगरा, वीरमदेव और अलाउद्दीन खिलजी की पुत्री फिरोजा के प्रसंग तथा 1311 ई. के जालौर युद्ध का ऐतिहासिक आख्यान। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | अंग्रेजी (इतिहास ग्रंथ) | चौहानों के इतिहास पर सर्वाधिक प्रामाणिक शोधपरक आधुनिक ग्रंथ। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं प्रवृत्तियाँ
-
शौर्य एवं रासो काव्य परंपरा का प्रस्थान बिंदु: हिंदी साहित्य के आदिकाल (वीरगाथा काल) का केंद्र बिंदु चौहान शासकों का शौर्य-साहित्य रहा है। पृथ्वीराज रासो से हिंदी में चरित काव्य और महाकाव्यात्मक शैली का विकास हुआ।
-
सांस्कृतिक एवं स्थापत्य समृद्धि:
-
अजमेर का अढ़ाई दिन का झोंपड़ा (मूलतः संस्कृत पाठशाला) उस युग के उच्च कोटि के नाट्य व व्याकरण अध्ययन का केंद्र था।
-
किलहॉर्न (Kielhorn) का कथन: विग्रहराज चतुर्थ के संदर्भ में विद्वान किलहॉर्न ने लिखा— “वह उन हिंदू शासकों में से एक था जो कालिदास और भवभूति की होड़ कर सकता था।”
-
-
शरणागत-वत्सलता और हठ की पराकाष्ठा: हम्मीर देव चौहान ने मुग़ल विद्रोही मंगोल सेनापति मीर मुहम्मद शाह (महिमाशाह) और केहब्रू को शरण देकर अपने प्राणों और राज्य की आहुति दे दी।
-
धार्मिक सहिष्णुता: चौहान शासक मुख्य रूप से शैव और शाक्त होते हुए भी जैन धर्म के बड़े संरक्षक थे। बिजौलिया अभिलेख पार्श्वनाथ जैन मंदिर के लिए भूमि अनुदान का साक्ष्य देता है; पृथ्वीराज तृतीय के दरबार में जैन विद्वान जिनपति सूरि और पद्मप्रभ सम्मानित थे।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
-
चौहान वंश के मूल संस्थापक: वासुदेव चौहान (551 ई.)।
-
अजमेर नगर व तारागढ़ के संस्थापक: अजयराज (1113 ई.)।
-
‘कविबांधव / कटीबांधव’ उपाधि: विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव)।
-
रणथंभौर चौहान वंश के संस्थापक: गोविंदराज (1194 ई.)।
-
राजस्थान का प्रथम साका: 1301 ई. (रणथंभौर दुर्ग – हम्मीर देव चौहान)।
-
जालौर के सोनगरा चौहानों के संस्थापक: कीर्तिपाल (कीतू)।
-
‘अर्ली चौहान डायनेस्टीज’ पुस्तक के लेखक: डॉ. दशरथ शर्मा।
5. शाकंभरी एवं अजमेर के चौहान शासक
| क्र. सं. | शासक का नाम | पिता का नाम | अनुमानित समय / शासनकाल | प्रमुख ऐतिहासिक तथ्य / विवरण |
| 1 | वासुदेव चौहान | — | ~551 ई. | चौहान वंश के आदिपुरुष/संस्थापक; सांभर झील का निर्माण कराया |
| 2 | सामंतराज | वासुदेव चौहान | छठी शताब्दी (उत्तरार्ध) | शाकंभरी में शासन सुदृढ़ किया |
| 3 | जयराज (नरदेव) | सामंतराज | 7वीं शताब्दी | — |
| 4 | विग्रहराज प्रथम | जयराज | 7वीं शताब्दी | — |
| 5 | चंद्रराज प्रथम | विग्रहराज प्रथम | 8वीं शताब्दी | — |
| 6 | गोपेंद्रराज | चंद्रराज प्रथम | 8वीं शताब्दी | — |
| 7 | दुर्लभराज प्रथम | गोपेंद्रराज | ~784–809 ई. | प्रतिहार शासक वत्सराज का सामंत; बंगाल अभियान में भाग लिया |
| 8 | गूवक प्रथम | दुर्लभराज प्रथम | ~809–836 ई. | प्रतिहार नागभट्ट द्वितीय का सामंत; सीकर में हर्षनाथ मंदिर की नींव रखी |
| 9 | चंद्रराज द्वितीय | गूवक प्रथम | ~836–863 ई. | — |
| 10 | गूवक द्वितीय | चंद्रराज द्वितीय | ~863–890 ई. | हर्षनाथ मंदिर का निर्माण आगे बढ़ाया |
| 11 | चंदनराज | गूवक द्वितीय | ~890–917 ई. | इनकी पत्नी रुद्राणी (आत्मप्रभा) पुष्कर में 1000 दीपक जलाती थीं |
| 12 | वाक्पतिराज प्रथम | चंदनराज | ~917–944 ई. | ‘महाराजाधिराज’ की पदवी धारण की; नाडोल शाखा के जनक लक्ष्मण चौहान इन्हीं के पुत्र थे |
| 13 | सिंहराज | वाक्पतिराज प्रथम | ~944–971 ई. | प्रतिहारों की अधीनता तोड़कर चौहानों को पूर्ण स्वतंत्र किया |
| 14 | विग्रहराज द्वितीय | सिंहराज | ~971–998 ई. | चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को हराया; भड़ौच में आशापुरा माता का मंदिर बनवाया |
| 15 | दुर्लभराज द्वितीय | सिंहराज (विग्रहराज II के भाई) | ~998–1012 ई. | महमूद गजनवी के समकालीन |
| 16 | गोविंदराज तृतीय | दुर्लभराज द्वितीय | ~1012–1026 ई. | — |
| 17 | वाक्पतिराज द्वितीय | गोविंदराज तृतीय | ~1026–1040 ई. | — |
| 18 | वीर्यराम | वाक्पतिराज द्वितीय | ~1040 ई. | मालवा के परमार भोज के खिलाफ युद्ध में वीरगति पाई |
| 19 | चामुंडराज | वाक्पतिराज द्वितीय (वीर्यराम के भाई) | ~1040–1065 ई. | मालवा के प्रभाव को सीमित किया |
| 20 | दुर्लभराज तृतीय | चामुंडराज | ~1065–1070 ई. | मतंगों/तुर्कों के खिलाफ संघर्ष किया |
| 21 | विग्रहराज तृतीय | चामुंडराज (दुर्लभराज III के भाई) | ~1070–1090 ई. | मालवा के राजा उदयादित्य की सहायता की |
| 22 | पृथ्वीराज प्रथम | विग्रहराज तृतीय | ~1090–1110 ई. | ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज’ की उपाधि; तुर्क आक्रमणकारियों को पराजित किया |
| 23 | अजयराज द्वितीय | पृथ्वीराज प्रथम | ~1110–1135 ई. | 1113 ई. में ‘अजयमेरु’ (अजमेर) नगर बसाया; चांदी के ‘अजयप्रिय द्रम्म’ सिक्के चलाए |
| 24 | अर्णोराज (आनाजी) | अजयराज द्वितीय | ~1135–1150 ई. | अजमेर में आना सागर झील तथा पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण कराया |
| 25 | जगद्देव | अर्णोराज | ~1150 ई. | पितृहंता (पिता अर्णोराज की हत्या कर गद्दी हथियाई) |
| 26 | विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) | अर्णोराज (जगद्देव के भाई) | 1153–1163 ई. | चौहानों का स्वर्णकाल; दिल्ली पर अधिकार किया; ‘हरकेलि’ नाटक लिखा और संस्कृत पाठशाला बनवाई |
| 27 | अपरगांगेय / अमरगांगेय | विग्रहराज चतुर्थ | 1163–1165 ई. | अल्पायु में शासन; पृथ्वीराज द्वितीय द्वारा अपदस्थ |
| 28 | पृथ्वीराज द्वितीय | जगद्देव | 1165–1169 ई. | हांसी का किला सुदृढ़ किया |
| 29 | सोमेश्वर | अर्णोराज (विग्रहराज IV के भाई) | 1169–1177 ई. | गुजरात के चालुक्यों के संरक्षण में रहे; कल्पवृक्ष दान किया |
| 30 | पृथ्वीराज तृतीय (राय पिथौरा) | सोमेश्वर | 1178–1192 ई. | तराइन का प्रथम युद्ध (1191) जीता, द्वितीय युद्ध (1192) में गोरी से पराजित; दिल्ली-अजमेर के अंतिम महान हिंदू सम्राट |
| 31 | गोविंदराज चतुर्थ | पृथ्वीराज तृतीय | 1192–1194 ई. | अजमेर छोड़कर रणथंभौर में चौहान वंश की नई शाखा स्थापित की |
| 32 | हरिराज | सोमेश्वर (पृथ्वीराज III के भाई) | 1194–1195 ई. | अजमेर के अंतिम चौहान शासक; कुतुबुद्दीन ऐबक से घिरने पर जौहर/आत्मबलिदान किया |
6. रणथंभौर शाखा (प्रमुख शासक)
| क्र. सं. | शासक का नाम | पिता का नाम | शासनकाल | प्रमुख ऐतिहासिक तथ्य |
| 1 | गोविंदराज चतुर्थ | पृथ्वीराज तृतीय | 1194 ई. से | रणथंभौर चौहान शाखा के संस्थापक |
| 2 | वाल्हण | गोविंदराज चतुर्थ | 13वीं शताब्दी | इल्तुतमिश के आक्रमण का सामना किया |
| 3 | प्रहलादन | वाल्हण | 13वीं शताब्दी | — |
| 4 | वीरनारायण | प्रहलादन | 13वीं शताब्दी | इल्तुतमिश से युद्ध किया |
| 5 | वाग्भट्ट | प्रहलादन के भाई | ~1236–1253 ई. | रणथंभौर को पुनः स्वतंत्र कराया |
| 6 | जैत्रसिंह (जयसिंह) | वाग्भट्ट | ~1253–1282 ई. | 32 वर्षों तक शासन किया (इनकी याद में 32 खंभों की छतरी बनी है) |
| 7 | हम्मीर देव चौहान | जैत्रसिंह | 1282–1301 ई. | अपने हठ (शरणागत रक्षा) के लिए प्रसिद्ध; 1301 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के खिलाफ ऐतिहासिक शाका हुआ |