मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक व साहित्यिक तथ्य मेवाड़ का गुहिल (गहलोत) राजवंश संसार के प्राचीनतम एवं निरंतर शासन करने वाले राजवंशों में से एक है। इसकी स्थापना 6वीं शताब्दी के मध्य मानी जाती है। संस्थापक व समय: गुहादित्य (गुहिल) ने 566 ई. में इस वंश की नींव रखी। उत्पत्ति संबंधी विभिन्न मत: ब्राह्मण वंशीय […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक व साहित्यिक तथ्य
मेवाड़ का गुहिल (गहलोत) राजवंश संसार के प्राचीनतम एवं निरंतर शासन करने वाले राजवंशों में से एक है। इसकी स्थापना 6वीं शताब्दी के मध्य मानी जाती है।
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संस्थापक व समय: गुहादित्य (गुहिल) ने 566 ई. में इस वंश की नींव रखी।
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उत्पत्ति संबंधी विभिन्न मत:
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ब्राह्मण वंशीय मत: डॉ. डी. आर. भंडारकर और डॉ. जी. एच. ओझा (प्रारंभिक साक्ष्य) के अनुसार गुहिल ‘आनंदपुर (वडनगर, गुजरात) के नागर ब्राह्मण’ थे। (कुंभलगढ़ प्रशस्ति 1460 ई. व आहाड़ अनुदान पत्र में इन्हें विप्र कुल से संबंधित बताया गया है)।
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सूर्यवंशी मत: कर्नल जेम्स टॉड, मुहणौत नैणसी और कविराजा श्यामलदास के अनुसार गुहिल सूर्यवंशी राजपूत (वल्लभी के राजा शिलादित्य के वंशज) हैं।
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ईरानी मत: अबुल फज़ल ने इन्हें ईरान के बादशाह नौशेरवां आदिल की संतान माना है।
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वास्तविक संस्थापक: बप्पा रावल (कालभोज) — इन्होंने 734 ई. में मौर्य शासक मानमोरी को पराजित कर चित्तौड़ पर अधिकार किया। बप्पा रावल ने हरित ऋषि के आशीर्वाद से राज्य प्राप्त किया और नागदा को अपनी पहली राजधानी बनाया।
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गुहिल वंश की 24 शाखाएँ: मुहणौत नैणसी एवं कर्नल टॉड के अनुसार गुहिलों की कुल 24 शाखाएँ थीं, जिनमें मेवाड़, डूंगरपुर-बांसवाड़ा (वागड़), काठियावाड़ और नेपाल की शाखाएँ प्रमुख थीं।
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प्रमुख प्रारंभिक शासक एवं राजधानियाँ:
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नागदा: बप्पा रावल द्वारा बसाई गई प्रथम राजधानी; यहाँ ‘सास-बहू (सहस्रबाहु) का मंदिर’ प्रसिद्ध है।
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अल्लट (आलू रावल): 10वीं सदी में आहाड़ को दूसरी राजधानी बनाया। हूण राजकुमारी हरियादेवी से विवाह किया और राज्य में सर्वप्रथम नौकरशाही (Bureaucracy) की स्थापना की।
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शक्ति कुमार: इनके समय मालवा के परमार शासक मुंज और बाद में राजा भोज ने चित्तौड़ पर अधिकार कर ‘त्रिभुवन नारायण मंदिर’ बनवाया।
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रावल जैत्रसिंह (1213–1253 ई.): भूताला का युद्ध (1227 ई.) में दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश को पराजित किया। नागदा के तहस-नहस होने पर चित्तौड़गढ़ को मेवाड़ की स्थायी राजधानी बनाया।
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दो मुख्य शाखाओं में विभाजन (रावल रणसिंह / कर्णसिंह के काल में):
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रावल शाखा: ज्येष्ठ पुत्र क्षेमसिंह ने चित्तौड़ पर शासन किया (अंतिम शासक: रावल रतनसिंह – 1303 ई.)।
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राणा शाखा: कनिष्ठ पुत्र राहप ने सिसोदा ग्राम में जागीर स्थापित की (संस्थापक: राणा हम्मीर – 1326 ई.)।
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2. प्रमुख ऐतिहासिक रचनाएँ, साहित्य और रचनाकार
गुहिल राजवंश के इतिहास, वंशावली और सांस्कृतिक परिवेश को प्रमाणित करने वाले प्रमुख साहित्यिक ग्रंथ व शिलालेख:
| रचना (Work) | रचनाकार (Author) | भाषा / प्रकार | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| हम्मीर मदमर्दन | जयसिंह सूरि | संस्कृत (नाटक) | रावल जैत्रसिंह द्वारा भूताला के युद्ध (1227 ई.) में इल्तुतमिश (हम्मीर/अमीर) को पराजित करने का प्रामाणिक विवरण। |
| श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि | चित्रकार: कमलचंद्र (रावल तेजसिंह काल, 1261 ई.) | ताड़पत्र चित्रकला | मेवाड़ चित्रशैली का प्रथम उपलब्ध चित्रित ग्रंथ (आहाड़ में चित्रित)। |
| विविध तीर्थ कल्प | जैन आचार्य जिनप्रभ सूरि | प्राकृत/संस्कृत | 1299 ई. में रावल समरसिंह द्वारा अलाउद्दीन खिलजी की सेना से दंड (टैक्स) वसूलने का उल्लेख। |
| एकलिंग महात्म्य | कान्हा व्यास | संस्कृत | बप्पा रावल से लेकर महाराणा कुंभा तक गुहिल वंशावली और हरित ऋषि के वरदान का विशद वर्णन। |
| अमरकाव्य वंशावली | रणछोड़ भट्ट तैलंग | संस्कृत महाकाव्य | बप्पा रावल और गुहादित्य के ऐतिहासिक मूल और युद्ध विजयों का विस्तृत प्रामाणिक आख्यान। |
| चीरवा का शिलालेख (1273 ई.) | रत्नप्रभ सूरि / भुवनसिंह | संस्कृत (शिलालेख) | रावल पदमसिंह, जैत्रसिंह, तेजसिंह और समरसिंह के काल की राजनीतिक व सामाजिक स्थिति का विवरण। |
| आबू का अचलेश्वर शिलालेख (1285 ई.) | शुभचंद्र / वेदशर्मा | संस्कृत (शिलालेख) | बप्पा रावल को मेदपाट का शासक और हरित ऋषि द्वारा दी गई शक्ति का काव्यात्मक उल्लेख। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं प्रवृत्तियाँ
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दीवान परंपरा (Theocratic Sovereignty): गुहिल शासक स्वयं को राजा न मानकर श्री एकलिंगनाथ जी (लकुलीश-पाशुपत शैव संप्रदाय) को राज्य का वास्तविक स्वामी और स्वयं को उनका ‘दीवान’ मानते थे।
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मातृभूमि की रक्षा व सतत प्रतिरोध: अरब आक्रमणकारियों (बप्पा रावल और खुमाण द्वारा खलीफा की सेनाओं को खदेड़ना) से लेकर सल्तनत काल (इल्तुतमिश, खिलजी) तक गुहिल वंश ने कभी विदेशी आक्रांताओं के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं किया।
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जैन धर्म एवं विद्वानों को राजाश्रय: शैव मतावलंबी होते हुए भी गुहिल शासकों (विशेषकर तेजसिंह, समरसिंह) के दरबार में रत्नप्रभ सूरि, पार्श्वचंद्र, कमलचंद्र जैसे जैन विद्वानों को पूरा संरक्षण प्राप्त था।
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चित्रकला एवं भाषा का उद्भव: 13वीं शताब्दी में मेवाड़ की मरु-गुर्जर (पश्चिमी अपभ्रंश) भाषा से प्राचीन राजस्थानी/मेवाड़ी भाषा और चित्रकला का शास्त्रीय विकास प्रारंभ हुआ।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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संस्थापक: गुहादित्य (566 ई.) | वास्तविक संस्थापक: बप्पा रावल (734 ई.)।
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प्रथम स्वर्णकाल (मध्यकालीन मेवाड़): रावल जैत्रसिंह का काल (डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार)।
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प्रथम चित्रित ग्रंथ: श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (1261 ई., रावल तेजसिंह के समय, चित्रकार: कमलचंद्र)।
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नौकरशाही के जनक: रावल अल्लट (राजधानी: आहाड़)।
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भूताला का युद्ध (1227 ई.): रावल जैत्रसिंह बनाम इल्तुतमिश (उल्लेख: ‘हम्मीर मदमर्दन’ में)।
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रावल शाखा का अंत: 1303 ई. (रावल रतनसिंह, प्रथम साका)।