मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 11वीं शताब्दी के अंत और 12वीं शताब्दी के आरंभ के शासकों में पृथ्वीराज प्रथम का स्थान अत्यंत गौरवशाली है। इन्होंने चौहान साम्राज्य की संप्रभुता को सर्वोच्च राजनीतिक गरिमा प्रदान की तथा विदेशी तुर्क आक्रांताओं के विरुद्ध निर्णायक रक्षात्मक व आक्रामक […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 11वीं शताब्दी के अंत और 12वीं शताब्दी के आरंभ के शासकों में पृथ्वीराज प्रथम का स्थान अत्यंत गौरवशाली है। इन्होंने चौहान साम्राज्य की संप्रभुता को सर्वोच्च राजनीतिक गरिमा प्रदान की तथा विदेशी तुर्क आक्रांताओं के विरुद्ध निर्णायक रक्षात्मक व आक्रामक अभियानों का नेतृत्व किया।
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समय काल: लगभग 11वीं शताब्दी का अंत एवं 12वीं शताब्दी का प्रारंभ (अनुमानित 1090–1110 ईस्वी / वि.सं. 1162 के आसपास)।
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वंशावलीगत स्थिति:
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बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) और पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के अनुसार, ये विग्रहराज तृतीय (बीसलदेव) और मालवा की राजकुमारी राजदेवी (राजमती) के पुत्र एवं उत्तराधिकारी थे।
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पृथ्वीराज प्रथम के उपरांत इनके प्रतापी पुत्र अजयराज द्वितीय (1113 ई.) गद्दी पर बैठे, जिन्होंने अजमेर नगर और तारागढ़ दुर्ग की स्थापना की।
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सार्वभौम उपाधियाँ:
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पृथ्वीराज प्रथम ने ‘परमभट्टारक’, ‘महाराजाधिराज’ और ‘परमेश्वर’ जैसी चक्रवर्ती शासकों द्वारा धारण की जाने वाली सर्वोच्च त्रिविध उपाधियाँ ग्रहण कीं।
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यह उपाधियाँ इस बात का अकाट्य प्रमाण हैं कि चौहान साम्राज्य अब किसी भी बाह्य शक्ति (प्रतिहार या चालुक्य) के प्रभाव से पूर्णतः मुक्त एक स्वतंत्र सार्वभौम सत्ता बन चुका था।
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पुष्कर में ब्राह्मण रक्षा एवं 700 तुर्कों का संहार (सर्वप्रमुख घटना):
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महाकवि जयानक कृत पृथ्वीराज विजय के अनुसार, मुस्लिम तुर्क सेना ने पवित्र तीर्थ पुष्कर पर आक्रमण कर वहाँ के ब्राह्मणों और मंदिरों को लूटने का प्रयास किया।
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पृथ्वीराज प्रथम ने त्वरित सैन्य कार्यवाही करते हुए पुष्कर को चारों ओर से घेर लिया और 700 तुर्क आक्रांताओं का संहार करके पवित्र तीर्थ और ब्राह्मणों के धन व प्राणों की रक्षा की।
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धार्मिक व लोक-कल्याणकारी कार्य:
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इन्होंने यात्रियों, तीर्थयात्रियों और संतों की सुविधा के लिए पुष्कर और सांभर के मुख्य मार्गों पर अन्नसत्र (सदाव्रत/भोजनशालाएँ) स्थापित करवाईं।
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ये भगवान शिव (हर्षनाथ) के अनन्य भक्त थे और इन्होंने सोमनाथ जाने वाले मार्ग पर स्थित मंदिरों के संरक्षण में भी योगदान दिया।
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जैन धर्म के प्रति उदारता:
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यद्यपि वे परम शैव थे, परंतु जैन परंपरा के अनुसार इन्होंने रणथंभौर के निकट जैन मंदिरों के लिए स्वर्ण कलश चढ़ाने तथा सहायता की स्वीकृति प्रदान की।
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विशेष नोट (परीक्षा भ्रम निवारण — चौहान वंश के तीन पृथ्वीराज):
पृथ्वीराज प्रथम (11वीं-12वीं सदी): विग्रहराज तृतीय के पुत्र; ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ उपाधि; पुष्कर में 700 तुर्कों का संहार किया; अजयराज द्वितीय के पिता। पृथ्वीराज द्वितीय (12वीं सदी – 1165–1169 ई.): जगद्देव के पुत्र; विग्रहराज चतुर्थ के बाद शासक बने; हांसी अभिलेख (1167 ई.) और मेनाल का रूठी रानी मंदिर इनसे संबंधित है। पृथ्वीराज तृतीय (1177–1192 ई.): ‘राय पिथौरा’ / ‘दलपंगुल’; तराइन के युद्ध (1191 व 1192 ई.); चन्दबरदाई के आश्रयदाता।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
पृथ्वीराज प्रथम के शौर्य, उपाधियों और पुष्कर अभियान के प्रामाणिक संदर्भ निम्नलिखित अभिलेखीय व साहित्यिक स्रोतों में मिलते हैं:
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक भट्ट (कश्मीरी महाकवि) | संस्कृत (महाकाव्य) | सर्वप्रमुख स्रोत। पुष्कर तीर्थ की रक्षा, 700 तुर्कों के संहार और सदाव्रत/अन्नसत्र स्थापित करने का विशद काव्यात्मक वर्णन। |
| बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) | गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव) | संस्कृत (शिलालेख) | विग्रहराज तृतीय के बाद पृथ्वीराज प्रथम और उनके पुत्र अजयराज का क्रमिक वंशावलीय उल्लेख। |
| रेवासा (जीण माता) शिलालेख (1105 ई.) | समकालीन स्थानीय अभिलेख | संस्कृत (शिलालेख) | पृथ्वीराज प्रथम के शासनकाल की पुष्टि और उनके द्वारा धारण की गई ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ उपाधि का साक्ष्य। |
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचंद्र सूरि | संस्कृत (महाकाव्य) | चौहानों के सूर्यवंशी गौरव, तुर्क प्रतिरोध और धार्मिक निष्ठा का निरूपण। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा स्वीकृत; पृथ्वीराज प्रथम के कालक्रम, उपाधियों और तुर्क संहार का शोधपरक विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
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तुर्क आक्रांताओं के विरुद्ध आक्रामक सुरक्षा नीति: 11वीं सदी के अंत में उत्तर-पश्चिम से होने वाले मुस्लिम हमलों का मुंहतोड़ जवाब देकर पृथ्वीराज प्रथम ने राजस्थान के तीर्थों और संस्कृति को सुरक्षा कवच प्रदान किया।
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राजसत्ता का केंद्रीकरण: ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि इस बात का प्रतीक बनी कि सपादलक्ष का चौहान राज्य अब केवल सामंती रियासत नहीं, बल्कि उत्तर भारत का एक प्रमुख संप्रभु साम्राज्य था।
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सांस्कृतिक एवं सामाजिक समन्वय: तीर्थयात्रियों के लिए सदाव्रत खुलवाना और ब्राह्मणों की रक्षा करना उनके लोक-कल्याणकारी व धर्मनिष्ठ राजा होने की छवि को पुष्ट करता है।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ उपाधि धारक: पृथ्वीराज प्रथम।
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पुष्कर तीर्थ को लूटने आए 700 तुर्कों का संहार करने वाले चौहान शासक: पृथ्वीराज प्रथम।
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पुष्कर में अन्नसत्र (सदाव्रत) प्रारंभ करने वाले शासक: पृथ्वीराज प्रथम।
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पिता: विग्रहराज तृतीय | पुत्र: अजयराज द्वितीय (अजमेर के संस्थापक)।
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वंशावली क्रम: विग्रहराज तृतीय ➔ पृथ्वीराज प्रथम ➔ अजयराज द्वितीय ➔ अर्णोराज (आनाजी)।