मुख्य बिंदु: नोह सभ्यता (भरतपुर): संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण मानक स्रोतों (आरबीएसई, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और आरपीएससी पाठ्यक्रम) के अनुसार नोह सभ्यता राजस्थान के उत्तर-पूर्वी छोर पर स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल है। यह स्थल मुख्य रूप से लौह युगीन संस्कृति और क्रमिक सांस्कृतिक विकास के लिए जाना जाता है। नोह से जुड़ी […]
नोह सभ्यता (भरतपुर): संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण
मानक स्रोतों (आरबीएसई, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और आरपीएससी पाठ्यक्रम) के अनुसार नोह सभ्यता राजस्थान के उत्तर-पूर्वी छोर पर स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल है। यह स्थल मुख्य रूप से लौह युगीन संस्कृति और क्रमिक सांस्कृतिक विकास के लिए जाना जाता है।
नोह से जुड़ी छोटी-से-छोटी, भौगोलिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक डिटेल्स नीचे बिंदुवार दी जा रही हैं:
1. सामान्य परिचय एवं भौगोलिक स्थिति
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जिला: भरतपुर (राजस्थान) — यह जिला मुख्यालय से लगभग 5 किलोमीटर दूर भरतपुर-आगरा मार्ग पर स्थित है।
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नदी: यह सभ्यता रूपापेल (रूपांघल) नदी के तट पर विकसित हुई थी।
2. खोज एवं उत्खनन (Discovery & Excavation)
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खोज और उत्खनन: इस पुरास्थल पर सर्वप्रथम वर्ष 1963-64 में राजस्थान सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा तथा प्रसिद्ध पुरातत्वविद् रतन चंद्र अग्रवाल (R.C. Agarwal) के निर्देशन में उत्खनन कार्य शुरू किया गया था, जो कई सत्रों तक (1971-72 तक) चला।
3. पाँच सांस्कृतिक स्तरों (Five Cultural Phases) का अनूठा क्रम
नोह राजस्थान का एकमात्र ऐसा प्रमुख स्थल है जहाँ उत्खनन के दौरान पाँच अलग-अलग सांस्कृतिक युगों (काल) के अवशेष एक के ऊपर एक क्रमिक रूप से प्राप्त हुए हैं:
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प्रथम सांस्कृतिक स्तर (प्रागैतिहासिक काल):
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इस स्तर से गहरे लाल रंग और कपिषवर्णी (ochre-colored) मृदभांड तथा प्रारंभिक अवशेष मिले हैं।
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द्वितीय सांस्कृतिक स्तर (ताम्र-लौह संक्रमण काल):
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इस काल के बर्तनों में काली और लाल सतह के अचित्रित मृदभांड प्रमुख हैं। इसी स्तर से आकृतिविहीन और शुरुआती लौह उपकरण (लोहे के टुकड़े व बाण) मिलने शुरू हो जाते हैं, जो यहाँ लोहे के आगमन का संकेत देते हैं।
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तृतीय सांस्कृतिक स्तर (लौह युगीन / चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति):
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यह काल लोहे के व्यापक प्रयोग और चित्रित धूसर मृदभांड (Painted Grey Ware – PGW) संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है।
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यहाँ से लोहे के बाण, भाले, तश्तरियाँ और कृषि उपकरण प्रचुर मात्रा में मिले हैं। कार्बन-14 पद्धति के अनुसार यह काल लगभग 1100 ईसा पूर्व से 800 ईसा पूर्व (महाभारत काल) से संबंधित माना जाता है।
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चतुर्थ सांस्कृतिक स्तर (मौर्य कालीन संस्कृति):
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इस स्तर पर पहुँचकर पक्की ईंटों के मकान, उत्तर काले पॉलिशदार बर्तन (Northern Black Polished Ware – NBPW), और जल निकास के लिए चक्रकूप (Ring Wells) के अवशेष मिले हैं।
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यहाँ से तांबे के क्षयग्रस्त सिक्के और हाथीदाँत व पाषाण के मनके भी प्राप्त हुए हैं।
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पंचम सांस्कृतिक स्तर (शुंग एवं कुषाण कालीन संस्कृति):
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टीले के सबसे ऊपरी स्तर से शुंग और कुषाण काल के अवशेष मिलते हैं।
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इस काल के चाक पर बने लाल बर्तन, त्रिरत्न व स्वास्तिक के चिह्न वाले मृदभांड और कुषाण शासकों (जैसे हुविष्क और वासुदेव) के सिक्के मिले हैं।
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4. नोह सभ्यता की अन्य मुख्य विशेषताएँ व विशिष्ट अवशेष
A. विशाल यक्ष प्रतिमा (Yaksha Statue)
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नोह से शुंग काल का प्रतिनिधित्व करने वाली एक विशालकाय यक्ष प्रतिमा प्राप्त हुई है, जो लगभग 9 फीट लंबी और 7 फीट चौड़ी है। इस आकर्षक प्राचीन प्रतिमा को वर्ष 1966 में प्रकाश में लाने का श्रेय वासुदेव शरण अग्रवाल को जाता है।
B. उन्नत नगर व्यवस्था और सामग्री
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यहाँ से पक्की ईंटों के भवनों के संरचनात्मक अवशेष, मिट्टी की सुंदर मूर्तियाँ, मोहरें और तांबे-लोहे की वस्तुएँ मिली हैं।
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यहाँ से प्राप्त पुरातात्विक सामग्रियां हस्तिनापुर और वैशाली (गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र) की प्राचीन सभ्यताओं से काफ़ी समानता रखती हैं।
आरपीएससी (RPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से नोह से मुख्य रूप से भरतपुर जिला, रूपापेल नदी, आर.सी. अग्रवाल, पाँच सांस्कृतिक स्तरों का मिलना, और चित्रित धूसर मृदभांड (PGW) संस्कृति के प्रश्न सबसे अधिक पूछे जाते हैं।