मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य मेवाड़ के इतिहास और मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य कला में सूत्रधार मंडन (शिल्पी मंडन) का स्थान सर्वोपरि है। वे 15वीं शताब्दी के महान शिल्पशास्त्री, वास्तुकार, मूर्तिकला विशेषज्ञ और संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। संरक्षक शासक: मेवाड़ के प्रतापी शासक महाराणा कुंभा (1433–1468 ई.) के प्रधान शिल्पी (Chief Architect/सूत्रधार)। मूल निवास […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
मेवाड़ के इतिहास और मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य कला में सूत्रधार मंडन (शिल्पी मंडन) का स्थान सर्वोपरि है। वे 15वीं शताब्दी के महान शिल्पशास्त्री, वास्तुकार, मूर्तिकला विशेषज्ञ और संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे।
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संरक्षक शासक: मेवाड़ के प्रतापी शासक महाराणा कुंभा (1433–1468 ई.) के प्रधान शिल्पी (Chief Architect/सूत्रधार)।
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मूल निवास व जाति: मंडन मूलतः गुजरात के खेड़ाब्रह्मा क्षेत्र के निवासी थे तथा जाति से गुजराती श्रीमाली ब्राह्मण (कुछ संदर्भों में सूत्रधार/शिल्पकार जाति) माने जाते हैं।
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पिता: इनके पिता का नाम क्षेत्र (खेता) था।
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पारिवारिक वास्तु परंपरा:
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भाई: नाथा (प्रसिद्ध वास्तु ग्रंथ ‘वास्तुमंजरी’ के रचयिता)।
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पुत्र: गोविंद (प्रसिद्ध ग्रंथ ‘उद्धारधोरिणी’, ‘कलानिधि’, ‘द्वारदीपिका’ के रचयिता)।
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पौत्र (गोविंद का पुत्र): नाना।
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सर्वप्रमुख स्थापत्य कृति: राजस्थान के प्रसिद्ध कुंभलगढ़ दुर्ग (1448–1458 ई.) तथा इसके भीतर स्थित अंतःदुर्ग कटारगढ़ के मुख्य सूत्रधार व योजनाकार मंडन ही थे।
2. प्रमुख रचनाएँ, विषय-वस्तु और रूपरेखा
मंडन ने संस्कृत भाषा में स्थापत्य, मूर्तिकला, नगर-नियोजन और अस्त्र-शस्त्र पर आधारित कई अद्वितीय मानक लक्षण-ग्रंथों की रचना की। परीक्षा के दृष्टिकोण से इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्न हैं:
| प्रमुख ग्रंथ (Work) | अध्याय / खंड | मुख्य विषय-वस्तु (Core Subject Matter) |
| राजवल्लभ (भूपति वल्लभ) | 14 अध्याय | नगर नियोजन, राजप्रासाद, दुर्ग निर्माण, मंत्रियों/नागरिकों के आवास, बाग-बगीचे और जल प्रबंधन का विस्तृत वास्तुशास्त्रीय विवेचन। |
| रूपमंडन (मूर्तिमंडन) | 6 अध्याय | हिंदू व जैन मूर्तिकला के लक्षण; विभिन्न देव प्रतिमाओं (विष्णु के 24 अवतार, शिव, गौरी, जैन तीर्थंकर आदि) के शास्त्रीय निर्माण नियम। |
| देवमूर्ति प्रकरण (रूपावतार) | 8 अध्याय | विभिन्न देव प्रतिमाओं के निर्माण लक्षण, उनके माप-तोल (आयाम), आसन, आभूषण और आयुधों का वर्णन। |
| प्रसाद मंडन | 8 अध्याय | देवालय (मंदिर) स्थापत्य; मंदिर के जगती, गर्भगृह, मंडप, शिखर, कलश आदि के निर्माण और दोष-निवारण के नियम। |
| वास्तुमंडन | 8 अध्याय | सामान्य भवन निर्माण, भूमि चयन, गृह वास्तु, शिलान्यास एवं वास्तु शांति विधि। |
| वास्तुसार | 3 अध्याय | वास्तुशास्त्र के मूलभूत संक्षिप्त नियम एवं गृह निर्माण निर्देश। |
| कोदंड मंडन | 200+ श्लोक | धनुर्विद्या, अस्त्र-शस्त्र निर्माण शास्त्र, धनुष के प्रकार, बाण निर्माण एवं लक्ष्य-भेदन तकनीक। |
| वास्तुशास्त्र | विविध | आवासीय भवनों एवं नगर निर्माण के विविध नियम। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं प्रवृत्तियाँ
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शास्त्रीय सिद्धांतों का मानकीकरण: मंडन ने प्राचीन भारतीय वास्तुशास्त्र (मयमतम्, मानसार, समरांगण सूत्रधार) की परंपरा का अध्ययन कर उसे राजस्थान के भौगोलिक व सामरिक परिवेश के अनुकूल व्यावहारिक रूप में संकलित किया।
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सामरिक व नागरिक स्थापत्य का समन्वय: इन्होंने केवल पूजा स्थलों (मंदिरों) पर ही नहीं, बल्कि सैन्य दुर्गों (जैसे कुंभलगढ़), प्राचीरों, जल संरचनाओं और नागरिक नगर-नियोजन पर भी प्रामाणिक ग्रंथ लिखे।
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पारिवारिक वास्तु पीठिका का निर्माण: मंडन ने मेवाड़ में एक ऐसी सुदृढ़ वास्तु परंपरा स्थापित की जिसे उनके भाई नाथा और पुत्र गोविंद ने आगे बढ़ाया:
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नाथा: वास्तुमंजरी (पारंपरिक आवासीय वास्तु)।
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गोविंद: कलानिधि (मंदिर के शिखरों का वास्तु), द्वारदीपिका (द्वार निर्माण), उद्धारधोरिणी (प्राचीन जीर्ण भवनों/दुर्गों का जीर्णोद्धार)।
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धार्मिक समन्वय की झलक: ‘रूपमंडन’ और ‘देवमूर्ति प्रकरण’ में शैव, वैष्णव, शाक्त के साथ-साथ जैन तीर्थंकरों व यक्ष-यक्षिणियों की मूर्तियों के निर्माण का भी समान आदर के साथ शास्त्रीय उल्लेख मिलता है।