मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित विजय स्तम्भ (विष्णुध्वज / गरुड़ध्वज / कीर्ति स्तम्भ) राजस्थान के स्थापत्य, मूर्तिकला और गौरवशाली इतिहास का अद्वितीय प्रतीक है। इसका निर्माण मेवाड़ के प्रतापी शासक महाराणा कुम्भा द्वारा करवाया गया था। निर्माण का कारण: 1437 ई. में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम पर ‘सारंगपुर […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित विजय स्तम्भ (विष्णुध्वज / गरुड़ध्वज / कीर्ति स्तम्भ) राजस्थान के स्थापत्य, मूर्तिकला और गौरवशाली इतिहास का अद्वितीय प्रतीक है। इसका निर्माण मेवाड़ के प्रतापी शासक महाराणा कुम्भा द्वारा करवाया गया था।
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निर्माण का कारण: 1437 ई. में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम पर ‘सारंगपुर के युद्ध’ में प्राप्त ऐतिहासिक विजय के उपलक्ष्य में।
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निर्माण काल: 1440 ई. से 1448 ई. (लगभग 8 वर्षों में पूर्ण)।
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समर्पण: यह स्तम्भ मूलतः भगवान विष्णु को समर्पित है, इसलिए इसे ‘विष्णुध्वज’ या ‘गरुड़ध्वज’ भी कहा जाता है।
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भौतिक आयाम एवं बनावट:
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ऊँचाई: 122 फीट (लगभग 37.19 मीटर)।
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चौड़ाई (आधार): 30 फीट चौड़ा वर्गाकार चबूतरा।
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मंजिलें: कुल 9 मंजिलें।
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सीढ़ियाँ: ऊपर तक जाने के लिए 157 घुमावदार सीढ़ियाँ हैं।
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तीसरी मंजिल: इसकी तीसरी मंजिल पर 9 बार अरबी भाषा में ‘अल्लाह’ शब्द उत्कीर्ण है।
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आठवीं मंजिल: इस मंजिल पर कोई भी देव-प्रतिमा उत्कीर्ण नहीं है।
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नौवीं मंजिल: नौवीं मंजिल पर आकाशीय बिजली गिरने से क्षतिग्रस्त होने के बाद महाराणा स्वरूपसिंह (1842-1861 ई.) ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था।
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प्रमुख वास्तुकार (शिल्पी): प्रधान सूत्रधार जैता तथा उनके तीन पुत्र—नापा, पोमा और पूंजा।
2. प्रमुख रचनाएँ, प्रशस्तियाँ एवं रचनाकार
विजय स्तम्भ के साथ ही इस पर उत्कीर्ण अभिलेखीय साहित्य और समकालीन साहित्यिक संदर्भ राजस्थान के इतिहास में मील का पत्थर हैं:
| ग्रंथ / स्रोत | रचनाकार / रचयिता | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति (1460 ई.) | कवि अत्रि एवं उनके पुत्र महेश भट्ट | विजय स्तम्भ की नौवीं मंजिल की शिलाओं पर उत्कीर्ण। इसमें बप्पा रावल से लेकर महाराणा कुम्भा तक की वंशावली, उपाधियों और युद्ध विजयों का विशद संस्कृत काव्य में वर्णन है। (अत्रि के निधन के बाद महेश भट्ट ने इसे पूर्ण किया)। |
| राजवल्लभ एवं रूपमंडन | मंडन (कुम्भा का प्रधान शिल्पी) | विजय स्तम्भ की मूर्तिकला, देव प्रतिमाओं के शास्त्रीय लक्षणों और देवालय स्थापत्य का आधार ग्रंथ। |
| एकलिंग महात्म्य | कान्हा व्यास | कुम्भा के काल में विजय स्तम्भ के निर्माण और तत्कालीन धार्मिक परिवेश की पुष्टि। |
| वीर विनोद | कविराजा श्यामलदास | विजय स्तम्भ के ऐतिहासिक निर्माण, शिल्पी जैता-नापा-पोमा-पूंजा और सारंगपुर युद्ध का विस्तृत विवरण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ, उपनाम एवं प्रवृत्तियाँ
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प्रमुख उपनाम एवं विद्वानों के कथन:
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‘भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश’ (Encyclopedia of Indian Iconography): डॉ. गोपीनाथ शर्मा एवं डॉ. डी. सी. सरकार द्वारा प्रदत्त।
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‘पौराणिक हिंदू मूर्तिकला का अनुपम अजायबघर’: डॉ. जी. एच. ओझा (गौरीशंकर हीराचंद ओझा)।
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‘रोम के टार्जन टावर के समान’: इतिहासकार फर्ग्यूसन ने इसकी तुलना रोम के टार्जन टावर से की।
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‘कुतुबमीनार से भी श्रेष्ठ / कुतुबमीनार से सुंदर इमारत’: कर्नल जेम्स टॉड।
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प्रतीक चिह्न (Monogram/Emblem) के रूप में:
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राजस्थान पुलिस का प्रतीक चिह्न।
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राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) का प्रतीक चिह्न।
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अभिनव भारत (वीर सावरकर का क्रांतिकारी संगठन) का प्रतीक।
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डाक टिकट: 15 अगस्त 1949 को राजस्थान की पहली इमारत के रूप में विजय स्तम्भ पर 1 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया था।
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मूर्तिकला की बहुलता: इस स्तम्भ की प्रत्येक मंजिल की भीतरी व बाहरी दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं (विष्णु के विभिन्न अवतार, ब्रह्मा, शिव, दिक्पाल, जनार्दन, सूर्य, नवग्रह, नदियाँ आदि) की प्रतिमाएँ उनके शास्त्रीय नामों के साथ उत्कीर्ण हैं।
विशेष नोट (परीक्षा भ्रम निवारण): चित्तौड़गढ़ दुर्ग में ही स्थित 7 मंजिला (75 फीट ऊँचा) ‘जैन कीर्ति स्तम्भ’ (आदिनाथ स्मारक) अलग स्मारक है, जिसका निर्माण 12वीं शताब्दी में दिगंबर जैन व्यापारी जीजाक कथोड़ (बघेरवाल महाजन) ने प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) को समर्पित करते हुए करवाया था।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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निर्माणकर्ता: महाराणा कुम्भा (1440-1448 ई.)।
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शिल्पी: जैता, नापा, पोमा, पूंजा।
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ऊँचाई व मंजिल: 122 फीट, 9 मंजिलें।
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प्रशस्तिकार: कवि अत्रि (शुरुआत) एवं महेश भट्ट (पूर्ण)।
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आकाशीय बिजली से क्षति के बाद जीर्णोद्धार: महाराणा स्वरूपसिंह।
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प्रथम डाक टिकट: 15 अगस्त 1949 (1 रुपया)।