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भर्तृहरि मेला: अलवर

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सत्यापित: 07 September 2026
मुख्य बिंदु: भर्तृहरि मेला (अलवर) 1. कब और कहाँ तिथि: मुख्य मेला भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी (राधाष्टमी) को भरता है। (यह मेला मुख्य रूप से भाद्रपद शुक्ल सप्तमी से अष्टमी तक आयोजित होता है; वर्ष में वैशाख मास में भी यहाँ एक लघुरूप मेला लगता है)। स्थान: भर्तृहरि धाम, सरिस्का बाघ अभयारण्य (Sariska Tiger […]

भर्तृहरि मेला (अलवर)

1. कब और कहाँ

  • तिथि: मुख्य मेला भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी (राधाष्टमी) को भरता है। (यह मेला मुख्य रूप से भाद्रपद शुक्ल सप्तमी से अष्टमी तक आयोजित होता है; वर्ष में वैशाख मास में भी यहाँ एक लघुरूप मेला लगता है)।
  • स्थान: भर्तृहरि धाम, सरिस्का बाघ अभयारण्य (Sariska Tiger Reserve) के निकट, अरावली पर्वत श्रृंखला की सुरम्य वादियों में, अलवर ज़िला, राजस्थान।
  • उपनाम: इसे ‘मत्स्य प्रदेश का लक्खी मेला’ या ‘मत्स्य का महाकुंभ’ कहा जाता है।

2. ऐतिहासिक व पौराणिक पृष्ठभूमि

  • उज्जैन के चक्रवर्ती राजा से सन्यासी तक:
    • महाराज भर्तृहरि प्राचीन उज्जैन (उज्जयिनी) के परम प्रतापी राजा थे और प्रसिद्ध विक्रमादित्य के बड़े भाई माने जाते हैं।
  • अमर फल और वैराग्य की कथा:
    • एक बार एक तपस्वी ने राजा भर्तृहरि को एक ‘अमर फल’ दिया। राजा ने वह फल अपनी अतिप्रिय रानी पिंगला को दे दिया।
    • रानी पिंगला राज्य के अश्वपाल (सेनापति/अश्वरक्षक) से प्रेम करती थी, अतः उसने वह फल उसे दे दिया। वह अश्वपाल एक वेश्या से प्रेम करता था, तो उसने वह फल उस वेश्या को अर्पित कर दिया।
    • वेश्या ने सोचा कि उसका जीवन तो पापमय है, यदि धर्मात्मा राजा अमर रहेंगे तो प्रजा का भला होगा, इसलिए उसने वह फल पुनः राजा भर्तृहरि को भेंट कर दिया।
    • जब राजा ने वही फल दोबारा अपने हाथ में देखा, तो गहन पड़ताल के बाद उन्हें संसार की असारता और नश्वरता का तीव्र बोध हुआ। इसी विरक्ति से उन्होंने राजपाट त्यागकर संन्यास ग्रहण कर लिया।
  • गुरु गोरखनाथ और नाथ संप्रदाय:
    • राजपाट छोड़कर वे गुरु गोरखनाथ के शिष्य बने और नाथ संप्रदाय में दीक्षित होकर ‘कनफटे योगी’ (कान छिदवाकर कुंडल पहनने वाले साधु) बन गए।
    • संन्यास के बाद वे भ्रमण करते हुए मत्स्य प्रदेश (अलवर) की अरावली पहाड़ियों में आए और यहाँ गुफा में कठिन तपस्या कर जीवित समाधि ली।

3. प्रमुख परंपराएँ एवं अनूठी विशेषताएँ

  • कनफटे जोगियों का महातीर्थ:
    • भर्तृहरि धाम नाथ संप्रदाय के अनुयायियों और ‘कनफटे जोगियों’ का प्रमुख आस्था केंद्र है।
    • मेले के दौरान नाथ पंथ के साधु-संत यहाँ चिमटा, त्रिशूल और भभूत रमाए धूनी के पास बैठते हैं तथा सारंगी व एकतारे पर ‘राजा भर्तृहरि के वैराग्य’ और ‘गोपीचंद भर्तृहरि’ की अमर लोककथा गाते हैं।
  • अखंड धूनी (Dhuni): मंदिर परिसर में बाबा भर्तृहरि द्वारा प्रज्वलित की गई अखंड धूनी आज भी अनवरत जल रही है। श्रद्धालु इस धूनी की भभूत (राख) को माथे पर लगाकर रोग-दोष मुक्ति का आशीर्वाद लेते हैं।
  • पवित्र जलकुंड: मंदिर के पास प्राकृतिक मीठे पानी का स्रोत/कुंड है, जहाँ श्रद्धालु स्नान कर मन्नत मांगते हैं।
  • सामाजिक समरसता: इस मेले में राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से हिंदू, मुस्लिम और मेव (Meo) समुदाय के लाखों श्रद्धालु शीश नवाने आते हैं।

4. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)

बिंदु विवरण
सीधा प्रतियोगी प्रश्न (RPSC / RSMSSB) “राजस्थान में भर्तृहरि का प्रसिद्ध मेला कहाँ आयोजित होता है?” — अलवर।
मेले की तिथि भाद्रपद शुक्ल सप्तमी और अष्टमी (राधाष्टमी के अवसर पर)।
भौगोलिक उपाधि (Nickname) ‘मत्स्य प्रदेश का लक्खी मेला’।
संबंधित संप्रदाय नाथ संप्रदाय (गोरखनाथ परंपरा / कनफटे योगी)।
महाराज भर्तृहरि की प्रसिद्ध साहित्यिक रचनाएं
इन्होंने संस्कृत साहित्य में प्रसिद्ध ‘शतकत्रय’ (तीन शतक) की रचना की थी:
1. नीतिशतकम् (आचार-विचार व राजनीति)
2. शृंगारशतकम् (प्रेम व सौंदर्य)
3. वैराग्यशतकम् (संन्यास व वैराग्य)
(इसके अलावा व्याकरण ग्रंथ ‘वाक्यपदीयम्’ भी इनकी प्रमुख कृति है)।
अलवर क्षेत्र के अन्य संबंधित प्रमुख मेले/स्थल
• पांडुपोल हनुमान जी: (शयनावस्था/लेटे हुए हनुमान जी की प्रतिमा, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी-पंचमी)।
• नारायणी माता मेला: बरवा डूंगरी, राजगढ़ (वैशाख शुक्ल एकादशी — नाई समाज की कुलदेवी)।
• चंद्रप्रभु दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र: तिजारा।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

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