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संत रणाबाई

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सत्यापित: 02 October 2026
मुख्य बिंदु: संत रणाबाई ( जिन्हें “राजस्थान की दूसरी मीरा“ कहा जाता है) मध्यकालीन राजस्थान की एक महान निर्गुण संत और कवयित्री थीं। उनका जीवन सादगी, त्याग और कृष्ण-भक्ति का अनूठा उदाहरण है। संत रणाबाई के जीवन, उनके इतिहास और उनकी शिक्षाओं का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है: 1. जीवन परिचय एवं जन्म जन्म: विक्रम संवत […]
संत रणाबाई ( जिन्हें “राजस्थान की दूसरी मीरा“ कहा जाता है) मध्यकालीन राजस्थान की एक महान निर्गुण संत और कवयित्री थीं। उनका जीवन सादगी, त्याग और कृष्ण-भक्ति का अनूठा उदाहरण है।
संत रणाबाई के जीवन, उनके इतिहास और उनकी शिक्षाओं का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:

1. जीवन परिचय एवं जन्म

  • जन्म: विक्रम संवत 1561 (ईस्वी सन 1504) में भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था।
  • जन्म स्थान: हरनावा (वर्तमान में डीडवाना-कुचामन जिला, राजस्थान)।
  • माता-पिता: इनके पिता का नाम रामदास जी जाट और माता का नाम गंगा बाई था।
  • बचपन और स्वभाव: रणाबाई का बचपन से ही सांसारिक मोह-माया में कोई मन नहीं था। वे एकांत में रहकर ईश्वर की भक्ति और भजन-कीर्तन किया करती थीं।

2. “राजस्थान की दूसरी मीरा” के रूप में ख्याति

  • जिस प्रकार मेवाड़ में मीराबाई ने कृष्ण भक्ति की अलख जगाई और महलों का त्याग किया, उसी प्रकार मारवाड़ के हरनावा क्षेत्र में संत रणाबाई ने आजीवन अविवाहित रहकर और अत्यंत कठोर साधना करते हुए निर्गुण-सगुण समन्वित भक्ति का मार्ग अपनाया।
  • उनकी इसी उच्च कोटि की भक्ति, त्याग और तपस्या के कारण उन्हें “राजस्थान की दूसरी मीरा“ के रूप में जाना और सम्मानित किया जाता है।

3. जीवन की मुख्य विशेषताएँ और साधना

  • निर्गुण व सगुण भक्ति का समन्वय: यद्यपि वे निर्गुण ब्रह्म की उपासक थीं, किंतु उनके भजनों में आराध्य के प्रति माधुर्य भाव और अगाध प्रेम झलकता है।
  • जीवंत समाधि (हठयोग व साधना): संत रणाबाई ने अपने जीवन के अंतिम समय में योग साधना और कठिन तपस्या करते हुए जीवित समाधि (या प्राण त्यागने) का निर्णय लिया था। उन्होंने अपने प्राण त्यागने की तिथि पहले ही घोषित कर दी थी और समाधि स्थल पर हजारों भक्तों की उपस्थिति में ब्रह्मलीन हो गईं।

4. प्रमुख स्थल एवं मेला

  • मुख्य पीठ: हरनावा (डीडवाना-कुचामन) संत रणाबाई की जन्मस्थली और उनकी मुख्य साधना स्थली है। यहाँ उनका एक भव्य मंदिर और समाधि स्थल स्थित है।
  • वार्षिक मेला: हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी के अवसर पर हरनावा गाँव में संत रणाबाई की स्मृति में एक बहुत बड़ा मेला भरता है, जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु आकर उनकी समाधि पर मत्था टेकते हैं और उनके भजनों का गुणगान करते हैं।

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