मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 11वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के शासकों में वाक्पतिराज द्वितीय का शासनकाल मेवाड़ (गुहिल वंश) और मालवा (परमार वंश) के साथ हुए क्षेत्रीय संघर्षों के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। समय काल: लगभग 11वीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध (अनुमानित 1026–1040 ईस्वी)। […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 11वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के शासकों में वाक्पतिराज द्वितीय का शासनकाल मेवाड़ (गुहिल वंश) और मालवा (परमार वंश) के साथ हुए क्षेत्रीय संघर्षों के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
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समय काल: लगभग 11वीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध (अनुमानित 1026–1040 ईस्वी)।
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वंशावलीगत स्थिति:
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हर्षनाथ प्रशस्ति, बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) और पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के अनुसार, ये ‘वेरीघरट’ गोविन्दराज तृतीय के पुत्र एवं उत्तराधिकारी थे।
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वाक्पतिराज द्वितीय के उपरांत इनके पुत्र वीर्यराम गद्दी पर बैठे।
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उपनाम: जैन ग्रंथ प्रबंधकोश (राजशेखर सूरि) में इन्हें ‘वल्लभ’ नाम से भी संबोधित किया गया है।
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मेवाड़ (अहाड़) के गुहिल शासक अम्बाप्रसाद का वध:
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महाकवि जयानक कृत पृथ्वीराज विजय के अनुसार, वाक्पतिराज द्वितीय ने मेवाड़ की तत्कालीन राजधानी आघाटपुर (अहाड़ / उदयपुर) पर आक्रमण किया।
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इस भीषण युद्ध में वाक्पतिराज द्वितीय ने मेवाड़ के गुहिलवंशीय शासक अम्बाप्रसाद (अमरप्रसाद) को युद्धभूमि में पराजित कर उसका वध कर दिया।
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यह विजय चौहानों के मेवाड़ क्षेत्र में बढ़ते राजनीतिक प्रभाव का स्पष्ट प्रमाण है।
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विशेष नोट (परीक्षा भ्रम निवारण — दोनों वाक्पतिराज):
वाक्पतिराज प्रथम (10वीं सदी): ‘महाराज’ की पदवी धारक, 188 युद्धों के विजेता, पुष्कर में शिव मंदिर निर्माता, नाडोल शाखा के संस्थापक राव लक्ष्मण के पिता। वाक्पतिराज द्वितीय (11वीं सदी): गोविन्दराज तृतीय के पुत्र, अहाड़/मेवाड़ के गुहिल शासक अम्बाप्रसाद का वध करने वाले।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
वाक्पतिराज द्वितीय और 11वीं सदी के शाकंभरी चाहमान इतिहास के प्रामाणिक संदर्भ निम्नलिखित स्रोतों में प्राप्त होते हैं:
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक भट्ट (कश्मीरी महाकवि) | संस्कृत (महाकाव्य) | सर्वप्रमुख स्रोत। वाक्पतिराज द्वितीय द्वारा आघाट (अहाड़) पर चढ़ाई करने और गुहिल नरेश अम्बाप्रसाद के वध का प्रामाणिक काव्यात्मक साक्ष्य। |
| बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) | गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव) | संस्कृत (शिलालेख) | गोविन्दराज तृतीय के बाद वाक्पतिराज द्वितीय और उनके उत्तराधिकारियों की क्रमिक वंशावलीय पुष्टि। |
| प्रबंधकोश | राजशेखर सूरि | संस्कृत (प्रबंध साहित्य) | वाक्पतिराज द्वितीय का उल्लेख ‘वल्लभ’ नाम से किया गया है। |
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचंद्र सूरि | संस्कृत (महाकाव्य) | 11वीं सदी के चौहान-परमार-गुहिल त्रिकोणीय संघर्षों का विवरण। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; वाक्पतिराज द्वितीय के कालक्रम, आघाट अभियान और अम्बाप्रसाद वध का प्रामाणिक विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
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मेवाड़ पर चौहान प्रभुत्व का प्रदर्शन: अहाड़ के शासक अम्बाप्रसाद के वध ने यह सिद्ध कर दिया कि चौहान शक्ति अब सांभर और अजमेर क्षेत्र से दक्षिण की ओर मेवाड़ तक विस्तारित हो रही थी।
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परमार-चौहान संघर्ष की पृष्ठभूमि: वाक्पतिराज द्वितीय के समय मालवा के शक्तिशाली परमार राजा भोज के साथ चौहानों के तनावपूर्ण संबंधों की शुरुआत हुई, जिसका परिणाम आगे चलकर इनके पुत्र वीर्यराम के काल में भीषण संघर्ष के रूप में सामने आया।
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शैव एवं शाक्त परंपरा की निरंतरता: कुलदेवता हर्षनाथ एवं कुलदेवी शाकंभरी माता की परंपरा के साथ-साथ तीर्थ क्षेत्रों का संरक्षण इस काल में भी जारी रहा।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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मेवाड़ (आघाट/अहाड़) के गुहिल शासक अम्बाप्रसाद का वध करने वाले चौहान नरेश: वाक्पतिराज द्वितीय।
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जैन ग्रंथ ‘प्रबंधकोश’ में वाक्पतिराज द्वितीय को कहा गया: ‘वल्लभ’।
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पिता: गोविन्दराज तृतीय (‘वेरीघरट’) | पुत्र व उत्तराधिकारी: वीर्यराम।
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वंशावली क्रम: गोविन्दराज तृतीय ➔ वाक्पतिराज द्वितीय ➔ वीर्यराम ➔ चामुण्डराज।