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रंगमहल सभ्यता

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सत्यापित: 24 September 2026
मुख्य बिंदु: रंगमहल सभ्यता (हनुमानगढ़): संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण मानक स्रोतों (आरबीएसई, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और आरपीएससी पाठ्यक्रम) के अनुसार रंगमहल सभ्यता राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी मरुस्थलीय भाग की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पुरातात्विक संस्कृति है। यह मुख्य रूप से कुषाण एवं गुप्त कालीन (ऐतिहासिक काल) संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है। रंगमहल से जुड़ी छोटी-से-छोटी, भौगोलिक […]

रंगमहल सभ्यता (हनुमानगढ़): संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण

मानक स्रोतों (आरबीएसई, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और आरपीएससी पाठ्यक्रम) के अनुसार रंगमहल सभ्यता राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी मरुस्थलीय भाग की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पुरातात्विक संस्कृति है। यह मुख्य रूप से कुषाण एवं गुप्त कालीन (ऐतिहासिक काल) संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है।
रंगमहल से जुड़ी छोटी-से-छोटी, भौगोलिक और पुरातात्विक डिटेल्स नीचे बिंदुवार दी जा रही हैं:

1. सामान्य परिचय एवं भौगोलिक स्थिति

  • जिला: हनुमानगढ़ (राजस्थान) — यह स्थल सूरतगढ़ और हनुमानगढ़ के बीच प्राचीन घग्गर नदी (प्राचीन सरस्वती-दृषद्वती नदी घाटी) के मैदान में स्थित है।
  • विशेष पहचान: इस क्षेत्र में प्राचीन काल में कई बस्तियाँ बसी थीं, जिनमें रंगमहल सबसे प्रमुख केंद्र था।

2. खोज एवं उत्खनन (Discovery & Excavation)

  • आरंभिक खोज: इस स्थान का सबसे पहले पता प्रसिद्ध इतिहासकार व पुरातत्वविद् एल.पी. टेस्सीटोरी (L.P. Tessitori) द्वारा वर्ष 1917-19 ता के दौरान लगाया गया था। इसके बाद सर ऑरेल स्टीन ने भी यहाँ सर्वेक्षण किया।
  • व्यापक उत्खनन: वर्ष 1952 से 1954 के दौरान स्वीडन के प्रसिद्ध पुरातत्वविद् डॉ. हन्ना रिड (Dr. Hanna Rydh / श्रीमती हन्नारिड) के निर्देशन में एक स्वीडिश पुरातात्विक दल द्वारा यहाँ बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक उत्खनन कराया गया।

3. रंगमहल सभ्यता की मुख्य विशेषताएँ (बिंदुवार संपूर्ण विवरण)

A. रंगमहल संस्कृति और विशिष्ट मृदभांड (Rang Mahal Pottery)

  • इस स्थल की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ से मिलने वाले विशिष्ट मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) हैं, जिनके नाम पर इस पूरी संस्कृति का नाम ‘रंगमहल संस्कृति’ पड़ा है।
  • यहाँ के बर्तन मुख्य रूप से चाहक पर बने हुए, गहरे लाल, गुलाबी या हल्के पीलेपन लिए हुए होते हैं।
  • इन लाल और गुलाबी बर्तनों की सतह पर काले व गहरे रंगों से ज्यामितीय डिजाइन (Geometric patterns), फूल-पत्तियाँ तथा पशु-पक्षियों की आकृतियाँ बेहद सुंदरता से उकेरी/चित्रित की जाती थीं। इसी कारण इन्हें ‘लाल-काले रंग की चित्रित मृदभांड शैली’ कहा जाता है।

B. प्रमुख पुरातात्विक अवशेष एवं सामग्रियाँ

रंगमहल के उत्खनन से दैनिक जीवन और कला से जुड़ी कई अनूठी वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं:
  • घंटाकार मृत्पात्र एवं बर्तन: यहाँ से घंटाकार पात्र, टोंटीदार घड़े, सुराहीनुमा बर्तन, दीपक, धूपदान, और विभिन्न प्रकार के छोटे-बड़े प्याले व कटोरे मिले हैं।
  • खिलौने: यहाँ से बच्चों के खेलने के लिए पकी हुई मिट्टी की छोटी पहिएदार गाड़ियाँ (Toy carts) और जानवरों की मूर्तियाँ प्रचुर मात्रा में मिली हैं।
  • गुरु-शिष्य की मूर्ति: रंगमहल से पकी हुई मिट्टी (टेराकोटा) की एक अत्यंत प्रसिद्ध ‘गुरु-शिष्य’ को दर्शाती हुई मूर्ति प्राप्त हुई है, जो यहाँ की लोक-कला का उत्कृष्ट नमूना है।
  • गांधार शैली का प्रभाव: यहाँ से मिलने वाली मृण्मूर्तियों (Terracotta figurines) पर गांधार कला शैली का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

C. सिक्के और मुद्राएँ (Coins)

  • उत्खनन के दौरान यहाँ से कुषाण शासकों (जैसे कनिष्क प्रथम, हुविष्क, वासुदेव और कनिष्क तृतीय) के तांबे के सिक्के, मुहरें और कुछ आहत (पंचमार्क) मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि यह स्थल कुषाण साम्राज्य के व्यापारिक व सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र में आता था।

D. वास्तुकला और मकानों के तीन चरण

  • यहाँ के मकान मुख्य रूप से धूप में सुखाई गई ईंटों (Sun-baked bricks) से बनाए जाते थे।
  • पुरातात्विक स्तरों के अध्ययन से पता चलता है कि रंगमहल की यह बस्ती अपने काल में तीन बार बसी और उजड़ी थी, जिसके कारण यहाँ कई स्ट्रक्चरल फेज (निर्माण चरण) देखने को मिलते हैं।
  • यहाँ के निवासी मुख्य रूप से चावल की खेती और कृषि कार्यों से जुड़े हुए थे।
आरपीएससी (RPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से रंगमहल से मुख्य रूप से हनुमानगढ़ जिला, घग्गर नदी, स्वीडिश पुरातत्वविद् डॉ. हन्ना रिड (1952-54), विशिष्ट लाल-गुलाबी चित्रित मृदभांड, और गुरु-शिष्य की मृण्मूर्ति से जुड़े प्रश्न सबसे अधिक पूछे जाते हैं।

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