मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य महमूद खिलजी प्रथम (शासनकाल: 1436–1469 ई.) मालवा की खिलजी वंश सल्तनत का सबसे महत्वाकांक्षी और शक्तिशाली सुल्तान था। राजस्थान के 15वीं शताब्दी के इतिहास, विशेषकर मेवाड़, हाड़ौती (गागरोन) और मारवाड़ की सामरिक राजनीति में इसका नाम सर्वाधिक संघर्षों से जुड़ा हुआ है। मेवाड़ के साथ संघर्ष (सारंगपुर का युद्ध […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
महमूद खिलजी प्रथम (शासनकाल: 1436–1469 ई.) मालवा की खिलजी वंश सल्तनत का सबसे महत्वाकांक्षी और शक्तिशाली सुल्तान था। राजस्थान के 15वीं शताब्दी के इतिहास, विशेषकर मेवाड़, हाड़ौती (गागरोन) और मारवाड़ की सामरिक राजनीति में इसका नाम सर्वाधिक संघर्षों से जुड़ा हुआ है।
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मेवाड़ के साथ संघर्ष (सारंगपुर का युद्ध – 1437 ई.):
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कारण: महाराणा मोकल के हत्यारों (महपा पंवार और एका) को महमूद खिलजी द्वारा मालवा में शरण देना।
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परिणाम: महाराणा कुंभा ने सारंगपुर (शाजापुर, म.प्र.) के मैदान में महमूद खिलजी को बुरी तरह पराजित किया।
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बंदी व रिहाई: कुंभा ने महमूद खिलजी को बंदी बनाकर 6 माह तक चित्तौड़ दुर्ग में कैद रखा और बाद में बिना किसी फिरौती/शर्त के उदारतापूर्वक मुक्त कर दिया।
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विजय स्मारक: इस ऐतिहासिक विजय की स्मृति में कुंभा ने चित्तौड़गढ़ में ‘विजय स्तम्भ’ (कीर्ति स्तम्भ) का निर्माण करवाया।
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गागरोन का द्वितीय साका (1444 ई.):
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महमूद खिलजी प्रथम ने 1444 ई. में झालावाड़ स्थित जलदुर्ग गागरोन पर भीषण आक्रमण किया।
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खींची चौहान शासक अचलदास खींची के पुत्र पाल्हणसी ने अद्भुत वीरता से युद्ध किया और वीरगति पाई (केसरिया हुआ) तथा राजपूत वीरांगनाओं ने जौहर किया।
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महमूद खिलजी ने गागरोन दुर्ग जीतकर इसका नाम बदलकर ‘मुस्तफाबाद’ रखा।
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चंपानेर की संधि (1456 ई.):
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महाराणा कुंभा की बढ़ती शक्ति को कुचलने के लिए मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम और गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक शाह के मध्य यह संयुक्त सैन्य संधि हुई थी।
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संधि की शर्त थी कि मेवाड़ को जीतकर आधा-आधा बाँट लिया जाएगा, किंतु कुंभा ने अपनी कूटनीति और पराक्रम से इस संयुक्त मोर्चे को विफल कर दिया।
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बदनौर का युद्ध (1457 ई.):
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संधि के बाद मालवा व गुजरात की संयुक्त सेना ने मेवाड़ पर आक्रमण किया, परंतु कुंभा ने बदनौर (भीलवाड़ा/ब्यावर) के निकट दोनों सेनाओं को पराजित किया।
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इस विजय के उपलक्ष्य में कुंभा ने बदनौर में ‘कुशाल माता का मंदिर’ बनवाया।
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मांडू में सात मंजिला मीनार:
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चित्तौड़ विजय के झूठे दावे के रूप में महमूद खिलजी ने अपनी राजधानी मांडू (मालवा) में 7 मंजिला मीनार (विजय स्मारक) का निर्माण कराया था।
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2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
महमूद खिलजी प्रथम के सैन्य अभियानों और राजस्थान के राजपूत शासकों के साथ उसके संघर्षों का प्रामाणिक विवरण देने वाले प्रमुख साहित्यिक व पुरालेखीय स्रोत निम्न हैं:
| ग्रंथ / स्रोत | रचनाकार / रचयिता | भाषा / प्रकार | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| अचलदास खींची री वचनिका | चारण शिवदास गाडण | डिंगल (ऐतिहासिक गद्य-पद्य) | यद्यपि यह 1423 ई. के प्रथम साके (होशंगशाह के विरुद्ध) पर केंद्रित है, परंतु इसकी परंपरा में महमूद खिलजी के 1444 ई. के गागरोन आक्रमण (द्वितीय साका) के संदर्भ भी मिलते हैं। |
| कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति (1460 ई.) | कवि अत्रि एवं महेश भट्ट | संस्कृत (शिलालेख) | सारंगपुर युद्ध (1437 ई.) में कुंभा द्वारा महमूद खिलजी को पराजित करने, बंदी बनाने और 6 माह कैद रखने का प्रामाणिक ऐतिहासिक वर्णन। |
| कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.) | कवि कान्हा व्यास / महेश भट्ट | संस्कृत (शिलालेख) | चंपानेर की संधि की विफलता, बदनौर विजय और मालवा सेना के विध्वंस का उल्लेख। |
| तारीख-ए-फ़रिश्ता | मुहम्मद कासिम फ़रिश्ता | फारसी | मालवा के खिलजी सुल्तानों का इतिहास; सारंगपुर युद्ध, चित्तौड़ घेराबंदी और चंपानेर की संधि का मुस्लिम दृष्टिकोण से विवरण। |
| मआसिर-ए-महमूदशाही | अली बिन महमूद अल-किरमानी | फारसी | महमूद खिलजी प्रथम का समकालीन दरबारी इतिहास। |
| वीर विनोद | कविराजा श्यामलदास | डिंगल मिश्रित हिंदी | कुंभा-महमूद खिलजी संघर्ष, गागरोन विजय और चंपानेर संधि का विस्तृत आलोचनात्मक विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं प्रवृत्तियाँ
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मध्यकालीन त्रिकोणीय संघर्ष (मेवाड़-मालवा-गुजरात): 15वीं सदी में राजस्थान की राजनीति का केंद्र मेवाड़, मालवा और गुजरात का त्रिकोणीय शक्ति-संतुलन था, जिसमें महमूद खिलजी केंद्रीय खलनायक व आक्रामक शक्ति के रूप में उभरा।
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राजपूत शरण-परंपरा बनाम कूटनीतिक टकराव: कुंभा द्वारा महमूद के विरोधियों को शरण देना और महमूद द्वारा मोकल के हत्यारों (महपा पंवार) को पनाह देना तत्कालीन सामंती राजनीति की प्रमुख विशेषता थी।
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दुर्गों के नाम परिवर्तन की प्रवृत्ति: मालवा सुल्तानों द्वारा राजपूत दुर्गों को जीतकर उनका इस्लामीकरण करने के क्रम में गागरोन का नाम ‘मुस्तफाबाद’ रखा गया।
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राजस्थानी चारण साहित्य में प्रतिरोध का स्वर: डिंगल काव्य में महमूद खिलजी के विरुद्ध राजपूत शासकों (कुंभा, पाल्हणसी) के संघर्ष को धर्म, स्वाभिमान और मातृभूमि की रक्षा के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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सारंगपुर का युद्ध (1437 ई.): महाराणा कुंभा ने महमूद खिलजी प्रथम को पराजित किया (विजय स्तम्भ का निर्माण)।
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गागरोन का दूसरा साका (1444 ई.): महमूद खिलजी ने पाल्हणसी खींची को हराया और गागरोन का नाम ‘मुस्तफाबाद’ रखा।
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चंपानेर की संधि (1456 ई.): महमूद खिलजी प्रथम (मालवा) और कुतुबुद्दीन (गुजरात) के मध्य कुंभा के विरुद्ध।
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बदनौर का युद्ध (1457 ई.): कुंभा ने संयुक्त सेना को हराया और ‘कुशाल माता मंदिर’ का निर्माण करवाया।