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रामदेव जयंती (बाबे री बीज)

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सत्यापित: 06 September 2026
मुख्य बिंदु: बाबे री बीज (रामदेव जयंती) एवं रामदेवरा मेला (रूणेचा, जैसलमेर) 1. कब और कहाँ तिथि: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया (बाबे री बीज) से भाद्रपद शुक्ल एकादशी तक। समय: अगस्त–सितंबर। प्रमुख स्थान: रामदेवरा (रूणेचा), तहसील पोकरण, जैसलमेर ज़िला (राजस्थान)। उपनाम: इसे ‘मारवाड़ का कुंभ’ तथा पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा लक्खी मेला कहा […]

बाबे री बीज (रामदेव जयंती) एवं रामदेवरा मेला (रूणेचा, जैसलमेर)

1. कब और कहाँ

  • तिथि: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया (बाबे री बीज) से भाद्रपद शुक्ल एकादशी तक।
  • समय: अगस्त–सितंबर।
  • प्रमुख स्थान: रामदेवरा (रूणेचा), तहसील पोकरण, जैसलमेर ज़िला (राजस्थान)।
  • उपनाम: इसे ‘मारवाड़ का कुंभ’ तथा पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा लक्खी मेला कहा जाता है।

2. ऐतिहासिक व लोक पृष्ठभूमि

  • जन्म एवं कुल:
    • जन्म: बाड़मेर ज़िले की शिव तहसील के उंडू-काश्मीर गाँव में तंवर वंशीय राजपूत ठाकुर अजमाल जी और माता मैणादे के घर हुआ।
    • बड़े भाई का नाम वीरमदेव (बलराम के अवतार माने जाते हैं) और पत्नी का नाम नेतलदे (अमरकोट के दलजी सोढ़ा की पुत्री) था।
  • अवतार मान्यता: हिंदू श्रद्धालु इन्हें भगवान श्रीकृष्ण का अवतार मानते हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय इन्हें ‘रामा पीर’ या ‘रामशाह पीर’ के रूप में पूजता है।
  • मक्का के पीरों की परीक्षा (पीरों के पीर):
    • जब मक्का से पाँच सिद्ध पीर इनकी परीक्षा लेने आए, तो उन्होंने कहा कि वे केवल अपने निजी बर्तनों में ही भोजन करते हैं जो मक्का में छूट गए हैं।
    • रामदेवजी ने अपने चमत्कार (परचे) से उनके कटोरे तुरंत मक्का से वहीं मंगवा दिए। तब उन पीरों ने नतमस्तक होकर कहा था:
    “म्हे तो केवल पीर हाँ, थे तो पीरां का पीर हो।”
  • भैरव राक्षस का दमन: इन्होंने पोकरण क्षेत्र में आतंक फैलाने वाले तांत्रिक/राक्षस भैरव का वध कर प्रजा को भयमुक्त किया। बाद में पोकरण अपनी भतीजी को दहेज में देकर स्वयं रूणेचा गाँव बसाया।
  • जीवित समाधि: इन्होंने मात्र 33 वर्ष की आयु में भाद्रपद शुक्ल एकादशी (विक्रम संवत 1442) को रूणेचा के रामसरोवर तालाब की पाल पर जीवित समाधि ली। इनसे एक दिन पूर्व (भाद्रपद शुक्ल दशमी को) इनकी परम भक्त व धर्मबहन डाली बाई (मेघवाल जाति) ने जल समाधि ली थी।

3. प्रमुख परंपराएँ एवं अनूठी विशेषताएँ

  • सांप्रदायिक सद्भाव का महाकुंभ: यह मेला जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को मिटाने वाला राजस्थान का सबसे बड़ा केंद्र है।
  • कांबड़िया पंथ एवं तेरहताली नृत्य:
    • रामदेवजी ने समाज में छुआछूत मिटाने के लिए ‘कांबड़िया पंथ’ (Kamadiya Panth) की स्थापना की थी।
    • इस मेले का मुख्य सांस्कृतिक आकर्षण कांबड़ जाति की महिलाओं द्वारा बैठकर किया जाने वाला प्रसिद्ध तेरहताली नृत्य (Terah Taali Dance) है, जिसमें शरीर पर 13 मंजीरे बांधकर अद्भुत करतब दिखाए जाते हैं।
  • जम्मा जागरण: मेले की रात्रि में मेघवाल जाति के भक्तों (जिन्हें ‘रिखिया’ कहा जाता है) द्वारा पूरी रात भजन-कीर्तन किया जाता है, जिसे ‘जम्मा’ (Jamma) कहते हैं।
  • ध्वजा (नेजा): रामदेवजी की पाँच रंगों की पंचरंगी पताका को ‘नेजा’ कहा जाता है।
  • प्रतीक व चढ़ावा:
    • इनके मंदिर में संगमरमर के पद-चिह्न (पगल्ये) पूजे जाते हैं।
    • मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु कपड़े का बना घोड़ा (लीलण/रेवंत) और नारियल चढ़ाते हैं।

4. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)

बिंदु विवरण
सीधा प्रतियोगी प्रश्न “राजस्थान में सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा मेला कौन-सा है?” — रामदेवरा मेला (रूणेचा, जैसलमेर)।
मेले की अवधि (तिथि) भाद्रपद शुक्ल द्वितीया (बाबे री बीज) से भाद्रपद शुक्ल एकादशी तक।
एकमात्र कवि लोकदेवता राजस्थान के एकमात्र ऐसे लोकदेवता जो एक कवि भी थे — इनकी रचित पुस्तक ‘चौबीस बाणियां’ (24 Baniyan) कहलाती है।
मंदिर निर्माणकर्ता रामदेवरा के वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह जी ने 1931 में करवाया था।
प्रमुख शब्दावली (Art & Culture Terminology)
• पगल्ये: पूजे जाने वाले चरण-चिह्न
• नेजा: 5 रंगों की ध्वजा
• जम्मा: रात्रि जागरण
• रिखिया: मेघवाल जाति के अनन्य भक्त
• परचा: इनके द्वारा दिखाए गए चमत्कार
डाली बाई की छतरी/समाधि रामसरोवर की पाल पर रामदेवजी की समाधि के पास ही डाली बाई का कंगन व समाधि स्थल है, जिसके नीचे से निकलने पर रोग-दोष मुक्त होने की मान्यता है।
अन्य प्रमुख मंदिर (छोटा रामदेवरा)
• छोटा रामदेवरा: गुजरात में स्थित है।
• राजस्थान में अन्य केंद्र: बिरांठिया (पाली), सुरताखेड़ा (चित्तौड़गढ़), और मसूरिया पहाड़ी (जोधपुर — इनके गुरु बालीनाथ जी का मंदिर)।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

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