प्रामाणिक अध्ययन नोट्स (Reference Archive)

दुर्लभराज द्वितीय

लॉगिन
1 (आज: 0)
शेयर: WA TG FB 𝕏 सुधार सुझाएँ
सत्यापित: 01 September 2026
मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य 10वीं शताब्दी के अंत और 11वीं शताब्दी के आरंभ में सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश में दुर्लभराज द्वितीय और गोविन्दराज तृतीय के शासनकाल अत्यंत महत्वपूर्ण रहे हैं। यह कालखंड उत्तर-पश्चिमी भारत पर गजनवी आक्रांताओं के निरंतर हमलों और क्षेत्रीय शक्तियों (चालुक्यों, परमारों व तोमरों) के साथ […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
10वीं शताब्दी के अंत और 11वीं शताब्दी के आरंभ में सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश में दुर्लभराज द्वितीय और गोविन्दराज तृतीय के शासनकाल अत्यंत महत्वपूर्ण रहे हैं। यह कालखंड उत्तर-पश्चिमी भारत पर गजनवी आक्रांताओं के निरंतर हमलों और क्षेत्रीय शक्तियों (चालुक्यों, परमारों व तोमरों) के साथ सामरिक संतुलन का संधिकाल था।
  • दुर्लभराज द्वितीय (शासनकाल: लगभग 998–1012 ईस्वी):
    • वंशावलीगत स्थिति: महाराजाधिराज सिंहराज के छोटे पुत्र तथा प्रतापी शासक विग्रहराज द्वितीय के अनुज (छोटे भाई) व उत्तराधिकारी।
    • ‘दुर्लंघ्यमेरु’ की उपाधि: शिलालेखों और साहित्यिक ग्रंथों में इन्हें ‘दुर्लंघ्यमेरु’ (जिसकी आज्ञा का कोई उल्लंघन न कर सके अथवा जो सुमेरु पर्वत की भाँति अजेय व दुर्लंघ्य हो) की उपाधि से विभूषित किया गया है।
    • किणसरिया शिलालेख (999 ई. / वि.सं. 1056): परबतसर (डीडवाना-कुचामन / नागौर) के निकट केवाय माता मंदिर से प्राप्त किणसरिया अभिलेख दुर्लभराज द्वितीय के समय का है। इसमें इनके सामंत दहिया राजपूत शासक चच्च (चाचिग) द्वारा केवाय माता मंदिर निर्माण का उल्लेख है।
    • मंत्री माधव: इनके प्रसिद्ध और विद्वान महामात्य (प्रधानमंत्री) माधव थे।
  • गोविन्दराज तृतीय (शासनकाल: लगभग 1012–1026 ईस्वी):
    • वंशावलीगत स्थिति: दुर्लभराज द्वितीय के उत्तराधिकारी। (इनके उपरांत क्रमशः वाक्पतिराज द्वितीय, वीर्यराम और चामुण्डराज शासक बने)।
    • ‘वेरीघरट’ (वैरीघट्ट) की उपाधि: पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के अनुसार, गोविन्दराज तृतीय को ‘वेरीघरट’ (Vairigharatta) कहा गया, जिसका अर्थ होता है— “शत्रुओं को पीसने वाला चक्की का पाट” (शत्रु-संहारक)।
    • कवि व विद्वानों के आश्रयदाता: जयानक के अनुसार, ये ज्ञानियों और कवियों का अत्यधिक सम्मान करते थे।
  • महमूद गजनवी के समकालीन संदर्भ व चौहान प्रतिरोध (1024–1025 ईस्वी):
    • सोमनाथ अभियान और मार्ग परिवर्तन: 1024-1025 ई. में जब गजनी का सुल्तान महमूद गजनवी गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर को लूटने निकला, तब उसने सपादलक्ष (शाकंभरी/अजमेर क्षेत्र) के चौहानों के सैन्य संगठन और प्रतिरोध की पूर्व-तैयारी की सूचना पाकर सीधा रास्ता छोड़ दिया।
    • तारीख-ए-फरिश्ता का साक्ष्य: मुस्लिम इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार, “हाकिम-ए-अजमेर (सपादलक्ष के चौहान राजा) की प्रबल सेना और युद्ध की विशाल तैयारियों के भय से महमूद गजनवी ने अजमेर के मुख्य मार्ग से जाने का साहस नहीं किया और वह थार के रेगिस्तान (मुलतान-जैसलमेर मार्ग) से होकर निकला, जहाँ उसकी सेना को भारी जल संकट व कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।”
    • यह प्रसंग चौहानों की तत्कालीन सामरिक सतर्कता और अदम्य रक्षात्मक शक्ति का परिचायक है।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
दुर्लभराज द्वितीय, गोविन्दराज तृतीय और गजनवी अभियानों के समकालीन प्रामाणिक स्रोत:
स्रोत / ग्रंथ रचनाकार / रचयिता भाषा / विधा मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण
किणसरिया शिलालेख (999 ई.) दहिया शासक चच्च (सामंत) संस्कृत (शिलालेख) परबतसर (नागौर)। दुर्लभराज द्वितीय के शासनकाल की पुष्टि तथा उन्हें ‘दुर्लंघ्यमेरु’ कहे जाने का प्राथमिक अभिलेखीय साक्ष्य।
पृथ्वीराज विजय जयानक भट्ट (कश्मीरी महाकवि) संस्कृत (महाकाव्य) दुर्लभराज द्वितीय के शासन, गोविन्दराज तृतीय को ‘वेरीघरट’ उपाधि दिए जाने तथा चौहान शौर्य का विस्तृत काव्यात्मक वर्णन।
बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव) संस्कृत (शिलालेख) सिंहराज ➔ विग्रहराज द्वितीय ➔ दुर्लभराज द्वितीय ➔ गोविन्दराज तृतीय की क्रमिक वंशावलीय पुष्टि।
तारीख-ए-फरिश्ता मुहम्मद कासिम फरिश्ता फारसी (इतिहास) महमूद गजनवी के 1024-25 ई. सोमनाथ अभियान के समय अजमेर/सपादलक्ष के चौहान शासक की सैन्य तैयारी और सुल्तान द्वारा मार्ग बदले जाने का विवरण।
अर्ली चौहान डायनेस्टीज डॉ. दशरथ शर्मा शोध ग्रंथ (इतिहास) राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; दुर्लभराज द्वितीय (दुर्लंघ्यमेरु) और गोविन्दराज तृतीय के कालक्रम तथा गजनवी समकालीनता का शोधपरक विश्लेषण।
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
  • सामंती स्वामिभक्ति एवं मंदिर स्थापत्य: दुर्लभराज द्वितीय के काल में सामंतों (जैसे दहिया वंश) द्वारा शक्ति-प्रदर्शन के साथ-साथ स्थापत्य को बढ़ावा दिया गया, जिसका श्रेष्ठ उदाहरण परबतसर का केवाय माता मंदिर है।
  • आक्रमणकारियों के विरुद्ध क्षेत्रीय सुरक्षा कवच: 11वीं सदी के पूर्वार्द्ध में जब उत्तर भारत के कई साम्राज्य गजनवी के हमलों से ध्वस्त हो रहे थे, चौहानों ने अपनी सुगठित सैन्य छावनियों द्वारा राजस्थान के मध्यवर्ती भाग को सुरक्षित रखा।
  • उपाधियों में पराक्रम का प्रकटीकरण: ‘दुर्लंघ्यमेरु’ और ‘वेरीघरट’ जैसी उपाधियाँ स्पष्ट करती हैं कि यह काल चौहानों के आक्रामक आत्म-सम्मान और सैन्य प्रभुत्व का युग था।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
  • ‘दुर्लंघ्यमेरु’ उपाधि धारक चौहान शासक: दुर्लभराज द्वितीय।
  • किणसरिया शिलालेख (999 ई. / वि.सं. 1056) किस शासक के समय का है: दुर्लभराज द्वितीय (स्थान: परबतसर, केवाय माता मंदिर)।
  • ‘वेरीघरट’ (वैरीघट्ट – शत्रुओं का संहारक) उपाधि धारक शासक: गोविन्दराज तृतीय।
  • महमूद गजनवी (सोमनाथ अभियान 1024-25 ई.) के समकालीन चौहान शासक: गोविन्दराज तृतीय / चौहान समकालीन शक्ति।
  • वंशावली क्रम: सिंहराज ➔ विग्रहराज द्वितीय ➔ दुर्लभराज द्वितीय ➔ गोविन्दराज तृतीय ➔ वाक्पतिराज द्वितीय ➔ वीर्यराम ➔ चामुण्डराज।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

नया संदर्भ / संशोधन जोड़ें
इस आलेख पर अभी कोई बाह्य संदर्भ दर्ज नहीं है। यदि आपके पास प्रामाणिक संदर्भ है तो यहाँ क्लिक करके जोड़ें।

विद्यार्थी चर्चा (0)

विद्यार्थी चर्चा में भाग लेने के लिए कृपया लॉगिन करें।